
महाराष्ट्र में कांग्रेस, एनएनसी और शिवसेना ने एक साथ आकर बीजेपी को सत्ता में आने से रोक दिया था, लेकिन बंगाल में यह तिकड़ी बिखर गई है. बंगाल विधानसभा चुनाव में शिवसेना और एनसीपी ने कांग्रेस की बजाय ममता बनर्जी की टीएमसी के साथ खड़े होने का फैसला किया है. इतना ही नहीं कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए की सहयोगी दल आरजेडी ने भी ममता को बिना शर्त समर्थन दे दिया और सपा भी टीएमसी के साथ है. इसे कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन के लिए बंगाल में सियासी तौर पर बड़ा झटका माना जा रहा है, जिसके लिए कांग्रेस ने अपना दर्द भी बयां किया है.
शिवसेना ने बंगाल में चुनाव लड़ने की बजाय टीएमसी को समर्थन करने का फैसला किया है. शिवसेना नेता संजय राउत ने ट्वीट कर कहा है, 'बहुत सारे लोग यह जानने के इच्छुक हैं कि शिवसेना पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ेगी या नहीं?' इसलिए पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे से चर्चा करने के बाद यह तय हुआ है कि हम अपने प्रत्याशी नहीं उतारेंगे. मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए ऐसा लगता है कि यह 'दीदी vs ऑल' फाइट है. ऑल M's का अर्थ-मनी, मसल और मीडिया का उपयोगी ममता दीदी के खिलाफ किया जा रहा है. ऐसे में शिवसेना ने पश्चिम बंगाल चुनाव लड़ने की बजाय ममता बनर्जी के साथ खड़े रहने का फैसला किया है.'
शिवसेना ने पश्चिम बंगाल में चुनाव नहीं लड़ने का फैसला पर तृणमूल कांग्रेस ने कहा है कि शिवसेना ने हमारा समर्थन करने का फैसला किया है. वो हमारे खिलाफ अपने उम्मीदवार नहीं उतार रहे हैं. हम उनके इस फैसले का स्वागत करते हैं. इससे ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल और ज्यादा मजबूत होंगी.
वहीं, कांग्रेस की दूसरी सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) अध्यक्ष शरद पवार ने भी बंगाल में ममता को समर्थन देनी की घोषणा की है. वो जल्द ही बंगाल भी जाने वाले हैं. बताया गया है कि शरद पवार और ममता बनर्जी एक साथ रैली को भी संबोधित कर सकते हैं. इससे पहले भी पवार ने ममता से बंगाल जाकर मुलाकात की थी और चुनाव में हर तरह से साथ देने का ऐलान किया है.
कांग्रेस के महाराष्ट्र के सहयोगी ही नहीं बल्कि बिहार के साथी आरजेडी ने भी कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन के बजाय ममता बनर्जी की टीएमसी के साथ खड़ी है. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा था कि उनकी पार्टी की पहली प्राथमिकता पश्चिम बंगाल में बीजेपी के उभार को रोकना है, जहां भी जरूरत पड़े हम ममताजी के साथ खड़े हैं. उन्हें जिताने के लिए हम पूरी ताकत लगाएंगे. ऐसे ही सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी ममता बनर्जी के टीएमसी को समर्थन किया है. उन्होंने कहा कि सपा के एक-एक कार्यकर्ता बंगाल में टीएमसी के उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार करेंगे.
दरअसल, शिवसेना, एनसीपी, आरजेडी सहित सपा के बयानों से साफ तौर पर स्पष्ट होता है कि वे नहीं मानते हैं कि बंगाल में बीजेपी को सत्ता में आने रोकने के मामले में कांग्रेस-वाम गठबंधन सक्षम है. ऐसे में उन्हें लगता है कि सियासी लड़ाई बीजेपी और टीएमसी के बीच है. ऐसे में विपक्ष के तमाम दलों ने कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन में दिलचस्पी नहीं ली और टीएमसी को बिना शर्त समर्थन देने का फैसला किया. वहीं, कांग्रेस नेता कहते हैं कि इन सभी दलों का पश्चिम बंगाल में कोई सियासी आधार नहीं है और न ही उन्होंने बंगाल में ममता सरकार के अत्याचारों को झेला है.
पश्चिम बंगाल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और लोकसभा में पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी ने एक अंग्रेजी अखबार से कहा कि देश के अन्य राज्यों के तमाम क्षेत्रीय दलों का ममता बनर्जी को समर्थन करने के लिए हम उन्हें दोष नहीं देंगे. क्षेत्रीय दलों की अलग-अलग अपनी धारणाएं हैं. उन्होंने कहा कि एक बात जरूर है कि बंगाल में हमारे जैसे दल टीएमसी के अत्याचारों और आतंक के शिकार हैं. हमारा अपना अलग दर्द अलग है. हमारे जैसे दलों के लिए बंगाल में जीवित रहना मुश्किल है, जिस तरह के टीएमसी का आतंक है.
अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि शिवसेना, एनसीपी, सपा या आरजेडी जैसी पार्टियों ने टीएमसी के अत्याचारों का सामना नहीं किया है. इसलिए इन दलों की धारणाएं ममता और टीएमसी को लेकर अलग हैं. मैं उन्हें दोष नहीं दूंगा. उनके लिए बीजेपी वास्तविक खतरा है जबकि बंगाल में हमारे लिए दोनों टीएमसी की तानाशाही और बीजेपी की सांप्रदायिकता के खतरों का सामना कर रहे हैं.
वह कहते हैं कि बंगाल के पंचायत चुनाव के दिन साठ लोग मारे गए थे, जिसके चलते वो हजारों सीटों पर टीएमसी निर्विरोध जीते थे. अगर ऐसी स्थिति यूपी, बिहार या महाराष्ट्र में पैदा होती तो इन क्षेत्रीय दलों को पता होता. साथ ही, उन्होंने कहा, इन दलों के द्वारा ममता बनर्जी को दिए जा रहे समर्थन से बंगाल की सियासत में असर नहीं पड़ेगा. हालांकि, कांग्रेस के बयान से साफ होता है कि क्षेत्रीय दलों के टीएमसी के साथ जाने से सियासी बेचैनी झलक रही है.