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नीतीश कुमार ने ऐसे ही नहीं चला यादव-मुस्लिम का दांव, जानें बिहार में M-Y की सियासत

आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने जिस यादव-मुस्लिम M-Y समीकरण के जरिए 15 साल तक राज किया है, उस पर नीतीश कुमार की नजर है. नीतीश कुमार ने जेडीयू के टिकट बंटवारे में यादव और मुस्लिम समुदाय से ढाई दर्जन कैंडिडेट मैदान में उतराकर लालू के 'एमवाई' समीकरण में सेंधमारी करने की कवायद की है.

नीतीश कुमार (PTI) नीतीश कुमार (PTI)
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली ,
  • 09 अक्टूबर 2020,
  • अपडेटेड 9:32 AM IST
  • नीतीश ने 19 यादव-11 मुस्लिम को टिकट दिया
  • यादव-मुस्लिम बिहार में किंगमेकर माने जाते हैं
  • लालू यादव का यादव-मुस्लिम कोर वोटबैंक है

बिहार विधानसभा चुनाव की सियासत जाति के इर्द-गिर्द सिमटती नजर आ रही है. आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने जिस यादव-मुस्लिम (M-Y) समीकरण के जरिए 15 साल तक राज किया था, उस पर नीतीश कुमार की नजर है. नीतीश कुमार ने जेडीयू के टिकट बंटवारे में यादव और मुस्लिम समुदाय से ढाई दर्जन कैंडिडेट मैदान में उतारकर लालू के 'एमवाई' समीकरण में सेंधमारी करने की कवायद की है. हालांकि, इसमें नीतीश कुमार कितना कामयाब होंगे यह तो 10 नवंबर को चुनावी नतीजे के दिन ही पता चल सकेगा? 

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बिहार में 16 फीसदी मुस्लिम और 15 फीसदी यादव मतदाता हैं. यादव और मुस्लिम मिलकर सूबे के करीब 100 सीटों पर राजनीतिक असर डालते हैं. यही वजह है कि जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार ने 115 प्रत्याशियों के नाम का ऐलान कर दिया है, जिसमें उन्होंने 11 सीटों पर मुस्लिम और 19 सीटों पर यादव समुदाय से उम्मीदवार बनाया है. इस तरह से कुल 30 सीटों पर उन्होंने यादव-मुस्लिम को टिकट दिया है. 

जेडीयू के यादव प्रत्याशी

जेडीयू ने बिहार की 19 सीटों पर यादव प्रत्याशी उतारा है, जिनमें गायघाट से महेश्वर प्रसाद यादव, निर्मली से अनिरुद्ध प्रसाद यादव, सुपौल से विजेंद्र प्रसाद यादव, आलमनगर से नरेंद्न नारायण यादव, सुरसंड से दिलीप राय, पालीगंज से बच्चा यादव, बेलहर से मनोज यादव, खगड़िया से पूनम यादव, परसा से चंद्रिका राय, हसनपुर से राजकुमार राय, गोविंदपुर से पूर्णिमा यादव, नवादा से कौशल यादव, अतरी से मनोरमा देवी, शेरघाटी से विनोद प्रसाद यादव, संदेश से विजेंद्र यादव,  लौकहा से लक्ष्मेश्वर राय, कदवा से सूरज प्रसाद राय और बाजपट्टी से रंजू गीता शामिल हैं. 

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बिहार में यादव राजनीति

बिहार की सियासत में 15 फीसदी यादव मतदाता किंगमेकर माना जाता है. यही वजह है कि लालू यादव ही नहीं बल्कि नीतीश की जेडीयू और बीजेपी भी यादव समुदाय पर दांव खेलने से पीछे नहीं रहती है. 2015 में 61 यादव विधायक जीतने में कामयाब रहे थे. आरजेडी ने 48 सीटों पर यादवों को टिकट दिए थे, जिनमें से से 42 जीतने में सफल रहे थे. नीतीश कुमार की जेडीयू ने 12 टिकट यादवों को दिए थे, जिनमें से 11 ने जीत दर्ज की थी. 

कांग्रेस ने 4 पर यादव प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से दो जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. ऐसे ही बीजेपी ने भी 22 टिकट यादव को दिए थे, जिनमें से 6 जीते थे. हालांकि, इस बार नीतीश कुमार ने पिछली बार से सात टिकट ज्यादा दिए हैं जबकि बीजेपी की अभी पूरी लिस्ट नहीं है, लेकिन पहले चरण की 29 सीट में से 6 यादव उतारे हैं जबकि आरजेडी ने पहले चरण की 42 सीटों में से 20 यादव पर दांव खेला है. बता दें कि 2000 में बिहार में यादव विधायकों की संख्या 64 थी जो 2005 में 54 हो गई थी और फिर 2010 में संख्या घटकर 39 पर आ गई थी, लेकिन 2015 में बढ़कर फिर 61 पहुंच गई. ऐसे में इस बार देखना है कि कितने यादव चुनकर आते हैं. 

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नीतीश के मुस्लिम कैंडिडेट 

जेडीयू ने बिहार की 11 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम समुदाय को टिकट दिया है, जिनमें पूर्वी चंपारण के सिकटा से खुर्शीद, अमौर से सवा जफर, दरभंगा ग्रामीण से फराज फातमी, कांटी से मो. जमाल, मढ़ौरा से अलताफ राजू, महुआ से आस्मा परवीन, शिवहर से शरफुद्दीन, अररिया से शगुफ्ता अजीम, ठाकुरगंज से नौशाद आलम, कोचाधामन से मो. मुजाहिद आलम और डुमरांव से अंजुम आरा शामिल हैं. 

बिहार में मुस्लिम सियासत 

दरअसल, बिहार में करीब 16 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं. वहीं,  बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से 47 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक स्थिति में हैं. इन इलाकों में मुस्लिम आबादी 20 से 40 प्रतिशत या इससे भी अधिक है. बिहार की 11 सीटें हैं, जहां 40 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं और 7 सीटों पर 30 फीसदी से ज्यादा हैं. इसके अलावा 29 विधानसभा सीटों पर 20 से 30 फीसदी के बीच मुस्लिम मतदाता हैं. 

लालू यादव का मुस्लिम-यादव फॉर्मूला

मौजूदा समय में बिहार में 24 मुस्लिम विधायक हैं. इनमें से 11 विधायक आरजेडी, 6 कांग्रेस, 5 जेडीयू, 1 बीजेपी और 1 सीपीआई (एमएल) से जीत दर्ज किए थे. बीजेपी ने दो मुस्लिम कैंडिडेट को उतारा था, जिनमें से एक जीत दर्ज की थी. साल 2000 के बाद सबसे ज्यादा मुस्लिम विधायक जीते थे.

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बता दें कि बिहार की राजनीति में यादव और मुस्लिम काफी निर्णयक भूमिका में हैं. मुस्लिम-यादव सूबे में करीब 16-16 फीसदी हैं, जो 1990 के बाद से लालू यादव के साथ मजबूती के साथ खड़ा हुआ है.1989 के भागलपुर दंगों के बाद मुसलमानों ने कांग्रेस के खिलाफ मतदान किया, जिसके कारण लालू प्रसाद के नेतृत्व में बिहार में जनता दल की सरकार बनी. इसके बाद लालू ने 15 सालों तक बिहार पर शासन किया, जिसमें मुस्लिम-यादव फॉर्मूले की अहम भूमिका रही थी.

नीतीश कुमार ने 2005 में मुस्लिमों के पसमांदा तबके को अपने साथ मिलाया था और ऐसे ही लालू से नाराज यादव समुदाय के गुट को अपने साथ जोड़कर, बिहार की सत्ता हासिल की थी. 2010 में नीतीश ने इस फॉर्मूले को और भी मजबूत किया और 2015 में बीजेपी के खिलाफ आरजेडी के साथ मिलकर यादव-मुस्लिम को बड़ा सियासी संदेश दिया. हालांकि, नीतीश के दोबारा से बीजेपी के साथ जाना मुस्लिमों को रास नहीं आ रहा है. वहीं, लालू यादव इन दिनों जेल में सजा काट रहे हैं और आरजेडी की कमान तेजस्वी यादव के हाथों में है. ऐसे में मौके की नजाकत को समझते हुए नीतीश आरजेडी के समीकरण को तोड़कर अपने साथ लाने की कवायद में हैं. हालांकि, नीतीश कुमार इसमें कितना कामयाब होंगे यह तो चुनाव नतीजे के दिन ही पता चल सकेगा. 

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