
बिहार की सियायत में यादव सबसे अहम माने जाते हैं, जिसके चलते आरजेडी से लेकर नीतीश कुमार और बीजेपी तक यादवों को अपने-अपने हिसाब से साधने की कवायद करते हैं. बिहार में हर चौथा विधायक यादव समुदाय से है, जिससे उनकी राजनीतिक ताकत का आकलन किया जा सकता है. सूबे का 16 फीसदी यादव समुदाय आरजेडी का कोर वोटबैंक माना जाता है, लेकिन इस पर एनडीए से लेकर पप्पू यादव तक की नजर है. ऐसे में देखना है कि यादव समुदाय इस बार किसकी चुनावी नैया पार लगाता है?
जेपी आंदोलन से निकले लालू प्रसाद यादव बिहार के करिश्माई नेता बनकर उभरे थे. वे 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए और 1997 तक इस पद पर रहे और उनके बाद उनकी पत्नी राबड़ी देवी 2005 तक सीएम रहीं. सामाजिक न्याय के नाम पर लालू यादव ने पिछड़ों, दलितों-शोषितों को समाज की पहली पंक्ति में बिठाने का काम किया. लालू यादव ने अपने अनूठे अंदाज से कई ऐसे लोक-लुभावन काम किए जिससे वे पिछड़ों में खासकर यादव समुदाय का मसीहा बन गए. हालांकि, लालू से पहले भी बिहार में कई यादव समुदाय के नेताओं ने सत्ता की कमान संभाली, लेकिन यादव समुदाय के दिल में अपनी जगह नहीं बना सके.
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लालू प्रसाद ने तकरीबन पांच साल पहले अपने परिवार के अन्य सदस्यों की दावेदारी को दरकिनार करते हुए बड़ी हसरत से अपने छोटे पुत्र तेजस्वी यादव को राजनीतिक उत्तराधिकार सौंपा था. तेजस्वी के नेतृत्व में आरजेडी सत्ता में वापसी के लिए बेताब है. महागठबंधन के लिए यादव सबसे महत्वपूर्ण जाति के तौर पर हैं और यादवों को लेकर सबसे बड़ा संशय इसी बात को लेकर है कि जितना खुलकर वे लालू प्रसाद यादव के साथ खड़े रहा करते थे क्या उसी तरह तेजस्वी यादव के साथ भी उसी मजबूती के साथ देंगे?
बिहार में यादव समीकरण
बिहार में यादव मतदाता 16 फीसदी के करीब है और आरजेडी का परंपरागत वोटर माना जाता है. लालू के इस मूल वोट बैंक यादव समुदाय पर बीजेपी से लेकर जेडीयू तक की नजर है. बता दें कि 2000 में बिहार में यादव विधायकों की संख्या 64 थी जो 2005 में 54 हो गई थी और फिर 2010 में संख्या घटकर 39 पर आ गई थी, लेकिन 2015 में बढ़कर 61 पहुंच गई.
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2015 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव की पार्टी ने 101 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें उसने 48 सीटों पर यादवों को टिकट दिए थे. इनमें से 42 जीतने में सफल रहे थे. अतिपिछड़ों को गोलबंद कर नीतीश कुमार सत्ता तक पहुंचने में कामयाब हुए थे. यादव राजनीति को बैलेंस करने के लिए 101 सीटों पर लड़ी जेडीयू ने भी 12 टिकट यादवों को दिए थे, जिनमें से 11 ने जीत दर्ज की थी. कांग्रेस ने 41 सीटों में से 4 पर यादव प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से दो जीतकर विधानसभा पहुंचे थे.
वहीं, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने भी 2015 के चुनाव में यादव राजनीति को साधने की कोशिश की थी. एनडीए ने कुल 26 यादव प्रत्याशियों को उतारा था जिनमें 22 बीजेपी, दो एलजेपी और दो मांझी की पार्टी हम की ओर से थे. बीजेपी से 6 यादव विधायक जीतकर आए थे. ऐसे में बीजेपी से लेकर नीतीश तक अपने यादव नेताओं को आगे कर आरजेडी के परंपरागत वोट में सेंधमारी करने की जुगत लगा रहे हैं.
नीतीश ने लालू के यादव प्रेम का उठाया था फायदा
आरजेडी के 15 सालों तक सत्ता में रहने के चलते यादव पिछड़ों से एक अलग समूह के रूप में विकसित हुए हैं. यादवों के खिलाफ गोलबंदी होने के कारण ही सभी दूसरे पिछड़ों और अतिपिछड़ों को गोलबंद कर नीतीश कुमार सत्ता तक पहुंचने में कामयाब हुए थे. हालांकि, लालू यादव की गैर मौजदूगी में यादव वोटों का बिहार की राजनीति में इस बार खास महत्व है और हाल ही में नीतीश कुमार कई यादव नेताओं को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रहे हैं. ऐसे में यादव वोटर में एनडीए सेंधमारी करने में कामयाब रही तो महागठबंधन का पूरा का पूरा गणित ही गड़बड़ा सकता है.
बिहार की सियासत में यादवों पर इतनी बात इसलिए हो रही है कि एनडीए को पता है यदि मुस्लिम और यादव समूह में सेंधमारी हो गई या वह बिखर गया तो फिर उनके लिए जीत की राह आसान होगी. दूसरी ओर तेजस्वी यादव भी जानते हैं कि अगर वे यादव मतदाताओं को नहीं संभाल सके तो फिर पिता की विरासत बिखर जाएगी, क्योंकि लालू इसी कोर जनाधार को अपने पाले में लाकर बिहार के बेताज बादशाह बने थे, जिसे संभालने की चुनौती उनके कंधों पर है.