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सीएम का फैसला 10 को, लेकिन इस चुनाव ने तेजस्वी को नेता बना दिया

राजनीतिक जानकार एक बात पर एकमत हैं कि तेजस्वी यादव अपनी छवि बदलने में सफल रहे हैं. एक दिन में दर्जन भर से ज्यादा रैलियां करना, पढ़ाई-कमाई-सिंचाई जैसे मुद्दों को बिहार का मुख्य चुनावी मुद्दा बना देना तेजस्वी की उपलब्धियां कही जाएंगी. 

क्या तेजस्वी यादव का बढ़ गया है कद? क्या तेजस्वी यादव का बढ़ गया है कद?
दीपक सिंह स्वरोची
  • नई दिल्ली,
  • 07 नवंबर 2020,
  • अपडेटेड 6:14 PM IST
  • बिहार की राजनीति में तेजस्वी का उभार
  • परिस्थितियों के हिसाब से कर रहे राजनीति
  • राष्ट्रीय मुद्दों पर बोलने से किया परहेज

बिहार चुनाव में वोटिंग का अंतिम चरण भी समाप्त हो चुका है. जनता ने फिर से नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री चुना या तेजस्वी यादव के वायदों पर भरोसा जताते हुए उन्हें मौका दिया, इसका पता 10 नवंबर को ईवीएम खुलने के बाद ही चलेगा. लेकिन जिस तरह से ये चुनाव लड़ा गया उसे देखते हुए राजनीतिक जानकार एक बात पर एकमत हैं कि तेजस्वी यादव अपनी छवि बदलने में सफल रहे हैं. एक दिन में दर्जन भर से ज्यादा रैलियां करना, पढ़ाई-कमाई-सिंचाई जैसे मुद्दों को बिहार का मुख्य चुनावी मुद्दा बना देना तेजस्वी की उपलब्धियां कही जाएंगी. 

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चुनाव में उन्हें जीत मिलती है या हार इसका पता कुछ दिन बाद चलेगा लेकिन तेजस्वी के रूप में बिहार या यूं कहें देश को नई पीढ़ी का एक नेता मिल गया है. राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर अजय कुमार झा कहते हैं कि अगर तेजस्वी चुनाव नहीं भी जीतते हैं तो यह तय है कि बिहार में उनका उभार एक मजबूत विकल्प के तौर पर हो चुका है. वो विकल्प जो लोगों की नजर में लालू-राबड़ी की राजनीति की तमाम गड़बड़ियों को भुलाकर आगे देखने पर मजबूर करता है. तेजस्वी 2020 की राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से राजनीति कर रहे हैं. उनके पिता लालू यादव ने सामाजिक न्याय का  नारा बुलंद करते हुए 15 साल बिहार पर राज किया, तेजस्वी आर्थिक न्याय की बात कर रहे हैं जो मौजूदा परिस्थितियों में जनता की मांग है. 

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प्रोफेसर झा कहते हैं कि तेजस्वी ने सिर्फ लालू के सामाजिक न्याय को आर्थिक न्याय में ही नहीं बदला बल्कि इस चुनावी के दौरान उनकी रणनीति उन्हें नौसिखिया की बजाय माहिर खिलाड़ी का तमगा देती है. उन्होंने नीतीश सरकार के प्रति लोगों के असंतोष को जमकर हवा दी. बीजेपी या पीएम नरेंद्र मोदी से सीधे टकराने से बचे. राष्ट्रीय मुद्दों पर बोलने से परहेज किया और बिहार के लोगों को ये संदेश दिया कि ये चुनाव पाक, कश्मीर, अयोध्या पर नहीं बल्कि बिहार के लोगों का स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए हो रहा है. झा कहते हैं कि ये ऐसा चुनाव है जब सत्ता पक्ष नहीं बल्कि विपक्ष चुनावी एजेंडा तय कर रहा है.

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राजनीतिक जानकार दीपक झा मानते हैं कि इस चुनाव ने तेजस्वी यादव को एक नई पहचान दी है. वो लालू यादव की छाया से बाहर निकलकर नई किस्म की राजनीति कर पा रहे हैं. तेजस्वी यादव ने बार बार रोजगार का मुद्दा उठाया है, जो बिहार के लोगों को सीधे कनेक्ट कर रहा है. खासकर सरकारी नौकरी की बात ऐसी है जो किसी भी बिहार में रहने वाले लोगों के दिल को छूता है. लोग तेजस्वी में एक युवा चेहरा के साथ नई सोच देख रहे हैं. इसलिए लगता है कि आने वाले समय में तेजस्वी और मजबूती से उभरेंगे. 

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राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार कहते हैं कि तेजस्वी यादव को कम आंका जा रहा था. लेकिन चुनाव जैसे जैसे आगे बढ़ा उनकी स्वीकार्यता लोगों को बीच में बढ़ती गई. अगर एनडीए गठबंधन से तुलना करें तो तेजस्वी लेफ्ट को महागठबंधन में शामिल करने में कामयाब रहे. इतना ही नहीं सभी जगहों पर पोस्टर में तेजस्वी को ही प्रमुखता दी गई. वहीं अगर एनडीए की बात करें तो नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने के बाद भी उन्हें पोस्टर में जगह नहीं मिली. इतना ही नहीं एनडीए गठबंधन में अपने मुद्दों को लेकर ही अंतर्विरोध देखने को मिला. जेडीयू बीजेपी की घोषणा को खारिज कर रही थी तो बीजेपी जेडीयू की घोषणा को खारिज कर रही थी. तेजस्वी इन मायनों में महागठबंधन को बहुत अच्छे से खींच ले गए.


 

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