
तत्कालीन पूर्णिया जिले की फारबिसगंज विधानसभा सीट से देश के प्रख्यात साहित्यकार फणीश्वर नाथ रेणु ने 1972 में जब निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो सबको आश्चर्य हुआ. सब यही सोच रहे थे कि जब चुनाव लड़ना था तो लड़े नहीं और अब ऐसा क्या हो गया कि चुनाव लड़ने की सोच रहे हैं. हर कोई यही कह रहा था कि निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला क्यों. हालांकि कुछ ऐसे हालात बने कि फणीश्वर नाथ रेणु ने फैसला कर लिया कि अब चुनाव लड़ना है.
कह दो गांव- गांव में वोट देंगे नाव पर
फणीश्वर नाथ रेणु चुनावी वैतरणी पार करने के लिए अपनी 'नाव' लेकर उतर चुके थे. फणीश्वर नाथ रेणु के सामने कांग्रेस के सरयू मिश्र और सोशलिस्ट पार्टी से लखन लाल कपूर उम्मीदवार थे. इस चुनाव में एक और मजेदार बात थी जहां पहले सबको फणीश्वर नाथ रेणु के चुनाव लड़ने पर आश्चर्य हो रहा था तो वहीं दूसरी ओर इस बात की भी चर्चा थी कि तीनों मित्र एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे. 1942 के आंदोलन में तीनों एक साथ जेल में बंद थे.
फणीश्वर नाथ रेणु का चुनाव चिन्ह नाव और उनके पक्ष में साहित्यकारों की टोली घूमकर प्रचार कर रही थी. पूरे चुनाव के दौरान फणीश्वर नाथ रेणु के पक्ष में नारा लग रहा था कि कह दो गांव- गांव में अबकी बार इस चुनाव में वोट देंगे नाव में. उनके प्रचार का एक खास अंदाज था. वह जिस गांव भी चुनाव प्रचार के लिए जाते थे शाम होने पर वह उसी गांव में ठहर जाते थे. हालांकि जब नतीजे आए तो फणीश्वर नाथ रेणु की चुनावी नाव वैतरणी पार नहीं कर सकी. उनको इस चुनाव में 6498 वोट मिले. वहीं कांग्रेस के सरयू मिश्रा को 29,750 वोट मिले और वह चुनाव जीत गए. लखनलाल कपूर को इस चुनाव में 16,666 वोट मिले.
मैं खुद पहनकर देखूं जूता कहां काटता है
फणीश्वर नाथ रेणु ने चुनाव लड़ने के कुछ कारण बताए थे. उन कारणों में एक यह भी था कि एक प्रतिभाशाली युवक को कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी. उस युवक ने फणीश्वर रेणु से कहा कि उससे कम प्रतिभाशाली युवकों को नौकरी मिल जा रही है. उसके पास कोई पैरवी न होने कारण उसको नौकरी नहीं मिल पा रही है. साथ ही फणीश्वर नाथ रेणु का कहना था कि काफी हद तक उनके क्षेत्र में राजनीति हिंदू मुसलमानों को बांटने में सफल रही थी.
फणीश्वर नाथ रेणु ने चुनाव के बाद एक साक्षात्कार के दौरान कहा था कि चुनाव लड़ने से पहले मेरे मन में कई सवाल थे. मेरे सामने बुलेट या बैलेट का सवाल भी था. पिछले कुछ वर्षों में चुनाव के जो तरीके बदले और बुराइयां बढ़ती गई. पैसा, जाति और लाठी का बोल बाला बढ़ता गया. ऐसे में खुद ही तय किया कि जूता पहन कर देखूं कहां काटता है. इस चुनाव के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें ढेर सारे खट्टे मीठे अनुभव हुए. एक बात उन्होंने और भी साफ कर दी कि 1972 का चुनाव मैंने केवल कांग्रेस के खिलाफ नहीं लड़ा था बल्कि यह सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ था. उन्होंने आगे चुनाव न लड़ने की भी बात कही.
फणीश्वर नाथ रेणु के बेटे इसी सीट से बने विधायक
बिहार के अररिया जिले को फणीश्वर नाथ रेणु के गृह जिले के रूप में भी जाना जाता है. फारबिसगंज विधानसभा सीट है जिससे उन्होंने चुनाव लड़ा था, वह इसी जिले में है. फणीश्वर नाथ रेणु का संबंध कभी भी दक्षिणपंथी पार्टी से नहीं रहा. हालांकि उनके बेटे पद्म राय वेणु फारबिसगंज सीट से 2010 से 2015 तक विधायक रहे. 2015 के चुनाव में जब बीजेपी ने उन्हें टिकट नहीं दिया तब वो जेडीयू में चले गए.
फारबिसगंज सीट पर 90 तक कांग्रेस का दबदबा था. कांग्रेस के सरयू मिश्र यहां से सात बार विधायक रहे. वह बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री भी रहे. सरयू मिश्र के ही खिलाफ फणीश्वर नाथ रेणु ने चुनाव लड़ा था. 90 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के अभेद्य किले में भारतीय जनता पार्टी ने सेंध लगा दी. तब से लेकर अब तक केवल एक चुनाव को छोड़कर इस सीट पर बीजेपी ही जीत दर्ज करती आ रही है. इस बार के भी चुनाव में बीजेपी ने अपने सिटिंग विधायक विद्यासागर केसरी को दोबारा टिकट दिया है.
अररिया जिला फणीश्वर नाथ रेणु के गृह जिले के रूप में भी जाना जाता है. फणीश्वर नाथ के बेटे पद्म राय वेणु 2010 में चुने गए विधायक फारबिसगंज सीट से कांग्रेस के सरयू मिश्र सात बार विधायक रहे.