
पहले सनी देओल और अब तेजस्वी यादव की बारी है इतिहास बनाने की.
सियासी घरानों और चुनावी कामयाबियों की पेचीदा और विरोधाभासी दुनिया में, तेजस्वी को अगर 10 नवंबर, 2020 को बिहार का मुख्यमंत्री बनने का जनादेश मिल जाता है तो उन्हें एक ही परिवार से राज्य का तीसरा मुख्यमंत्री बनने का अनूठा गौरव प्राप्त होगा. लालू यादव ने बिहार में 1990 से 1997 तक दो बार मुख्यमंत्री के तौर पर कार्य किया. उनकी पत्नी और तेजस्वी की मां राबड़ी देवी ने 1997 से 2005 के बीच तीन बार मुख्यमंत्री की गद्दी संभाली.
अभिनेताओं से नेता बनने की कड़ी में देओल परिवार ने लोकसभा के लिए निर्वाचित तीन सांसदों को भेजा. अभिनेता धर्मेंद्र को 2004 लोकसभा चुनाव में बीकानेर से बीजेपी के टिकट पर कामयाबी मिली. उनकी पत्नी हेमा मालिनी मथुरा से सांसद हैं. धर्मेंद्र की पहली पत्नी प्रकाश के बेटे सनी देओल 2019 में पंजाब की गुरदासपुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए.
बच्चन परिवार के भी तीन सदस्य संसद के सदस्य रहे. कवि हरिवंश राय बच्चन, अमिताभ बच्चन और जया बच्चन. इनमें सिर्फ अमिताभ 1984 में इलाहाबाद से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए. बाकी दोनों ने राज्यसभा में नुमाइंदगी की.
दत्त परिवार से भी तीन सदस्य संसद में पहुंचे. सुनील दत्त, नरगिस दत्त और उनकी बेटी प्रिया दत्त. इनमें सुनील दत्त और प्रिया दत्त लोकसभा के सदस्य रहे.
हालांकि देओल परिवार के धर्मेंद्र, हेमा मालिनी और सनी देओल का प्रदर्शन सबसे प्रभावशाली रहा. तीनों लोकसभा के लिए चुनाव लड़कर संसद पहुंचे.
तेजस्वी यादव इस समय बिहार में कड़े मुकाबले में उलझे हैं. तुलनात्मक लोकतंत्र के लिए लोकनीति कार्यक्रम (लोकनीति-CSDS) ने हिन्दी न्यूज चैनल आजतक के साथ चुनाव पूर्व सर्वे किया. लोकनीति-CSDS सर्वे के मुताबिक 31 प्रतिशत प्रतिभागियों ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के लिए पहली पसंद बताया. वहीं 27 प्रतिशत प्रतिभागियों की राय में वे तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखना पसंद करेंगे.
कुछ मतदाताओं और राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह अंतर बहुत कम है और 28 अक्टूबर को पहला वोट डाले जाने से पहले और अधिक संकीर्ण होने की क्षमता रखता है. इसी तरह, जेडीयू-बीजेपी और महागठबंधन (यानी आरजेडी-कांग्रेस-लेफ्ट) के बीच वोट शेयर का अंतर मुश्किल से चार फीसदी है. यह देखते हुए कि बीजेपी को कुछ शहरी सीटों से बड़े अंतर से जीत मिलने की संभावना जताई जा रही है तो वोट शेयर के आधार पर सीटों की भविष्यवाणी करना भ्रामक और गलत हो सकता है.
समकालीन भारतीय राजनीति सियासी घरानों से अटी पड़ी है- नेहरू-गांधी, बादल, सिंधिया, मुलायम सिंह यादव, अब्दुल्ला, मुफ्ती, गौडा, पासवान, पटनायक, करुणानिधि और अन्य. गांधी अनौपचारिक तौर पर देश का पहला परिवार माना जाता है जिसने देश को तीन प्रधानमंत्री- जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दिए. इसी परिवार से अन्य अहम राजनीतिक शख्सियतों में सोनिया गांधी, मेनका गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और वरुण गांधी आते हैं. इसके अलावा, नेहरू-गांधी घराने से ही विजय लक्ष्मी पंडित और फिरोज गांधी में भी सांसद रहे हैं. लेकिन नेहरू-गांधी परिवार से कोई भी कभी मुख्यमंत्री नहीं बना.
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पेकिंग ऑर्डर के संदर्भ में विशुद्ध रूप से देखा जाए तो एक राज्य, विशेष रूप से बड़े राज्य, जैसे कि उत्तर प्रदेश और बिहार के मुख्यमंत्री के कार्यालय, को प्रधानमंत्री के उच्च कार्यालय के बाद दूसरा बड़ा कार्यालय समझा जाता है. दूसरे शब्दों में कहें तो कैबिनेट बर्थ या निर्वाचित सांसद का दर्जा इतना वजनदार नहीं होता.
कई मायनों में, कश्मीर के अब्दुल्लाओं को लालू-राबड़ी के ग्रुप समकक्ष में देखा जा सकता है अगर तेजस्वी इस एलीट क्लब से जुड़ते हैं तो. अब्दुल्ला परिवार ने जम्मू-कश्मीर को तीन मुख्यमंत्री दिए लेकिन ये तीन पीढ़ियों में फैले हुए हैं. शेख अब्दुल्ला, फारूक और उमर इस परिवार से मुख्यमंत्री बने. इसके अलावा, फारूक के बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह को भी जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री के रूप में ताज पहनने का एक बार मौका मिला. फारूक की मां बेगम अकबर जहां अब्दुल्ला दो बार श्रीनगर से लोकसभा सांसद रहीं. लेकिन तब, जम्मू- कश्मीर एक अशांत इतिहास वाला छोटा राज्य रहा. 2019 से जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश बन चुका है.
देश में ऐसे कई राज्य रहे जहां पिता-पुत्र या पिता-पुत्री दोनों को मुख्यमंत्री के तौर पर काम करने का मौका मिला. मसलन, बीजू पटनायक-नवीन पटनायक (ओडिशा), मुलायम सिंह यादव-अखिलेश यादव (यूपी), मुफ्ती मोहम्मद सईद-महबूबा मुफ्ती (जम्मू और कश्मीर) और वाईएस राजशेखर रेड्डी- जगन मोहन रेड्डी (आंध्र प्रदेश). सितंबर 2009 में रुद्रकोंडा पहाड़ी के शिखर पर विमान हादसे में वाईएसआर की मौत के बाद मुख्यमंत्री पद पर जगन मोहन के दावे को सोनिया गांधी ने नामंजूर न किया होता तो, कांग्रेस और आंध्र का इतिहास द ग्रैंड ओल्ड पार्टी के लिए कहीं अधिक सहज हो सकता था.
लेकिन सोनिया को कथित तौर पर राहुल गांधी की ओर से सलाह दी गई कि वे जगन को मुख्यमंत्री न बनने दें क्योंकि इससे वंशवाद की राजनीति को बढ़ावा देने की 'गलत मिसाल' कायम होगी. राहुल ने बेशक सदाचार के नाते ऐसी सलाह दी हो सकती है लेकिन खुद राजवंश से उनके होने की वजह से जगन के लिए ये बहुत अपसेट करने वाली बात थी.
तमिलनाडु की बात की जाए तो कलैगनार (करुणानिधि) परिवार ने कई राजनेता दिए. हालांकि जब तक करुणानिधि के बेटे स्टालिन 2021 में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव नहीं जीत जाते तब तक ये परिवार कहीं भी लालू या अब्दुल्ला के करीब नहीं आएगा. अपने जीवनकाल के दौरान, करुणानिधि ने अपने तीन बेटों - एमके मुथु, अलागिरी और स्टालिन को राजनीतिक मैदान पर आगे बढ़ाया. वो अपनी बेटी कनिमोझी के जन्म को अपने लिए भाग्यशाली मानते थे क्योंकि 1969 में वे अचानक मुख्यमंत्री की गद्दी तक पहुंच गए थे.
एक पटकथा लेखक, करुणानिधि चाहते थे कि उनका अभिनेता पुत्र मुथु एमजीआर का मुकाबला करे. लेकिन मुथु, जो अक्सर एमजीआर की तरह कपड़े पहनते थे, असली एमजीआर प्रशंसक बन गए और यहां तक कि अन्नाद्रमुक में ही पाला बदल कर पहुंच गए. हालांकि, 2009 में, उन्होंने करुणानिधि के साथ फिर सुलह कर ली.
राजमाता विजयाराजे सिंधिया और उनके बेटे माधवराव सिंधिया के बीच घरेलू लड़ाई ने बेटी वसुंधरा को राजनेता के तौर पर उभरने में मदद की. माधवराव 1972 में जनसंघ छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गए. वह कहते थे कि 1970 में ऑक्सफोर्ड से लौटने के बाद जनसंघ में शामिल होना "एक भारी गलती थी." लेकिन परिवार के आश्रित दिवंगत सरदार संभाजीराव चंद्रोजी आंग्रे दावा करते थे कि माधवराव ने जनसंघ से बाहर आने का फैसला इसलिए किया क्योंकि 1972 मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव मे उसने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था.
सत्तर के दशक के मध्य में आपातकाल लागू होने के बाद मां और बेटे के बीच चल रहे तनाव में एक उबाल आ गया. राजमाता को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि उनके बेटे के कथित तौर पर नेपाल चले जाने की बात कही गई. उस दौर के करीब साढ़े चार दशक बाद राजमाता की सबसे छोटी बेटी यशोधरा अपने लिए ‘बड़ी भूमिका’ की उम्मीद बांध रही थीं, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया (माधवराव सिंधिया के पुत्र) कांग्रेस का हाथ छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए. राजमाता और माधव राव सिंधिया की तरह ही ज्योतिरादित्य और यशोधरा के मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने की संभावना कम है.
सियासी घरानों की इस बिसात पर अब सबकी नजरें तेजस्वी यादव पर हैं. यक्ष प्रश्न है कि क्या 10 नवंबर 2020 को इस कड़ी में वे नया आयाम जोड़ पाएंगे?
(पत्रकार रशीद किदवई ‘24 अकबर रोड’ और ‘सोनिया ए बायोग्राफी’ के लेखक हैं.)