Advertisement

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का कर्नाटक वाला 'विनिंग फॉर्मूला' क्यों अपना रही है बीजेपी?

छत्तीसगढ़ में पहले चरण की 20 सीटों पर जारी मतदान के बीच बीजेपी की बदली चुनावी रणनीति भी चर्चा में है. छत्तीसगढ़ में बीजेपी आखिर कांग्रेस का कर्नाटक वाला विनिंग फॉर्मूला क्यों अपना रही है?

बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा (फाइल फोटोः पीटीआई) बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा (फाइल फोटोः पीटीआई)
बिकेश तिवारी
  • नई दिल्ली,
  • 07 नवंबर 2023,
  • अपडेटेड 3:59 PM IST

छत्तीसगढ़ में अगले पांच साल सरकार चलाने के लिए जनता किसे जनादेश देगी? वह घड़ी आ गई है. सूबे के नक्सल प्रभावित बस्तर रीजन की 20 विधानसभा सीटों के लिए वोट डाले जा रहे हैं. शेष 70 सीटों के लिए 17 नवंबर को वोट डाले जाएंगे. सूबे की 90 में से 20 सीटों पर जारी मतदान के बीच सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की रणनीति को लेकर भी खूब चर्चा हो रही है.

Advertisement

पहले चरण का प्रचार थमने के बाद कहा तो ये तक जाने लगा कि बीजेपी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का कर्नाटक वाला विनिंग फॉर्मूला अपना रही है. इसके पीछे तर्क टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार तक की रणनीतिक समानताओं के दिए जा रहे हैं. किसने कहां किस तरह के मुद्दों पर फोकस किया, कब उम्मीदवारों का ऐलान किया, प्रचार के लिए किस रणनीति पर फोकस किया, बताया ये सब भी जा रहा है. चर्चा कांग्रेस के कर्नाटक वाले और बीजेपी के छत्तीसगढ़ फॉर्मूले की समानताओं को लेकर भी हो रही है.

जल्दी उम्मीदवारों का ऐलान

बीजेपी की पहचान पिछले कुछ साल में सबसे आखिर में टिकट का ऐलान करने वाली पार्टी की रही है. कहा तो ये भी जाता है कि इसके दो प्रमुख कारण हैं- पहला ये विश्वास कि उम्मीदवार कोई भी हो, वोट तो पीएम नरेंद्र मोदी के नाम पर ही मिलना है. दूसरा कारण ये बताया जाता है कि पार्टी बागियों को दूसरे दलों में शामिल होने का वक्त नहीं देना चाहती. लेकिन इस बार के छत्तीसगढ़ चुनाव में बीजेपी की रणनीति अपनी इस इमेज के ठीक उलट नजर आई है.

Advertisement
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

बीजेपी ने उम्मीदवारों की पहली सूची तो चुनाव कार्यक्रम के ऐलान से भी पहले ही जारी कर दी थी. ये कुछ वैसा ही कदम है जैसा कांग्रेस ने कर्नाटक में उठाया था. कर्नाटक में बीजेपी की सरकार थी और कांग्रेस विपक्ष में थी. कांग्रेस ने चुनाव से करीब दो महीने पहले ही अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया था. तर्क ये दिया गया था कि टिकट का ऐलान हो जाने से उम्मीदवारों को चुनावी तैयारी के लिए भरपूर समय मिल सकेगा.

ये भी पढ़ें- छत्तीसगढ़ में मतदान से पहले 'महादेव' पर 'महाभारत', सट्टा ऐप का चुनाव से क्या है कनेक्शन

कर्नाटक में कांग्रेस का ये फॉर्मूला हिट रहा और छत्तीसगढ़ में बीजेपी भी इसी फॉर्मूले पर आगे बढ़ती नजर आई. बीजेपी ने सूबे की उन सीटों पर उम्मीदवारों की पहली लिस्ट विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव कार्यक्रम का ऐलान होने से भी पहले कर दिया था जिन सीटों पर 2018 के चुनाव में पार्टी को मात मिली थी.

करप्शन

कांग्रेस ने कर्नाटक में करप्शन को अपने चुनाव प्रचार अभियान का मुख्य आधार बनाया लिया था. पार्टी ने 40 परसेंट कमीशन की सरकार बताते हुए बीजेपी पर जमकर हमला बोला था. कांग्रेस करप्शन के मुद्दे पर जनता के बीच बीजेपी के खिलाफ बज बनाने में सफल रही थी. छत्तीसगढ़ में पहले चरण के मतदान से पहले प्रचार के अंतिम हफ्ते में बीजेपी ने भी 30 परसेंट कमीशन की सरकार का नारा देने के साथ ही महादेव बेटिंग ऐप के मुद्दे पर आक्रामक रणनीति के साथ बज बनाने की कोशिश की.

Advertisement
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल (फाइल फोटो)

रायपुर से दिल्ली तक बड़े नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सीएम भूपेश बघेल पर सीधा हमला बोला. बीजेपी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बघेल सरकार को घेरने के लिए क्यूआर कोड जारी कर 'भू-पे' अभियान भी चलाया.

गारंटी वाला दांव

कांग्रेस ने कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के चुनाव में गारंटी नाम से चुनाव घोषणा पत्र जारी किया था. पार्टी का ये फॉर्मूला भी इन राज्यों के चुनाव में हिट साबित हुआ था. बीजेपी भी चुनावी राज्यों में गारंटी का दांव चलने लगी है. बीजेपी अभी तक संकल्प पत्र नाम से अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी करती रही है लेकिन छत्तीसगढ़ में पार्टी ने जो घोषणा पत्र जारी किया, उसे मोदी की गारंटी नाम दिया गया है.

बीजेपी ने क्यों बदली रणनीति

अब सवाल ये भी उठ रहे हैं कि बीजेपी को आखिर अपनी रणनीति बदलकर कांग्रेस के विनिंग फॉर्मूले का इस्तेमाल क्यों करना पड़ा? राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने कहा कि यह बताता है कि बीजेपी ने मान लिया है कि इलेक्शन लोकलाइज हो गया है. बीजेपी की यूएसपी पीएम मोदी और सेंट्रल लीडरशिप है, ऐसे में पार्टी मोदी की गारंटी जैसे दांव जरूर चल रही है लेकिन जोर सीएम बघेलने को घेरने पर ही है. एक वजह 2018 की हार के बाद साढ़े चार साल तक सूबे की लीडरशिप का निष्क्रिय रहना भी है और इसी वजह से अमित शाह को लगातार दौरे करने पड़े जिसके बाद लोकल लीडरशिप एक्टिव हुई.

Advertisement

ये भी पढ़ें- छत्तीसगढ़ में इधर बघेल, उधर मोदी... चुनावी पोस्टरों में किसका प्रचार, कौन दरकिनार?

कर्नाटक में कांग्रेस ने बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की जगह लोकल लीडरशिप को निशाने पर रखा. बीजेपी के हमलों के केंद्र में भी अब तक भूपेश बघेल ही नजर आए हैं. बीजेपी के लिए बदली रणनीति कितनी फायदेमंद साबित हो पाती है, ये तो तीन दिसंबर की तारीख ही बताएगी.

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement