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गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए भले ही अभी औपचारिक ऐलान न हुआ हो, लेकिन सियासी सरगर्मियां तेज हो गई है. इस बार के चुनावी मैदान में आम आदमी पार्टी तीसरे विकल्प के रूप में मैदान में है, लेकिन कांग्रेस गुजरात विधानसभा चुनाव में त्रिकोणीय लड़ाई के बजाय बीजेपी से सीधा मुकाबला चाहती है. यही वजह है कि पार्टी गुजरात की चुनावी जंग को 27 साल कांग्रेस बनाम 27 साल बीजेपी के एजेंडे के इर्द-गिर्द रख रही है. ऐसे में देखना है कि कांग्रेस अपने इस सियासी दांव में क्या सफल हो पाएगी?
बता दें कि गुजरात में अभी तक कांग्रेस बनाम बीजेपी के बीच ही चुनावी मुकाबले होते रहे हैं, लेकिन इस आम आदमी पार्टी तीसरी ताकत के रूप में पूरे दमखम के साथ किस्मत आजमा रही है. ऐसे में कांग्रेस के सामने इस बार दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है. एक तरफ कांग्रेस के सामने चैलेंज है कि 27 सालों से सत्ता पर काबिज बीजेपी को कैसे सियासी मात दें तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी की दस्तक से कैसे अपने वोट बैंक को बचाए रखे.
गुजरात में इस बार बीजेपी लगातार छठी बार सत्ता में आने के लिए दम लगा रही होगी, लेकिन उसके सामने एंटी इंकम्बेंसी की भी चुनौती है. बीजेपी के लिए यहां सत्ता विरोधी लहर की चिंता इसलिए ज़्यादा हो सकती है, क्योंकि 2017 में उसकी सीटें घटकर सौ के नीचे रह गई थी. सत्ता विरोधी लहर का पिछली बार फायदा सीधे तौर पर कांग्रेस को मिला था, लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी के चुनावी मैदान में उतरने से एंटी इंकम्बेंसी वोट के दो जगह बंटने की संभावना दिख रही है.
आम आदमी पार्टी जिस तरह से गुजरात में सक्रिय है और बीटीपी के साथ गठबंधन कर रखा है. अरविंद केजरीवाल गुजरात का लगातार दौरा कर रहे हैं. ऐसे में आम आदमी पार्टी जितनी मजबूती से विधानसभा चुनाव लड़ती है तो उससे मुकाबला त्रिकोणीय बन सकता है. इससे कांग्रेस को सियासी तौर पर नुकसान होने का खतरा दिख रहा. इसीलिए कांग्रेस ने रणनीति बनाई है कि गुजरात चुनाव को कांग्रेस बनाम बीजेपी रखा जाए ताकि आम आदमी पार्टी को सियासी जड़े जमाने का मौका न मिल सके.
दरअसल, कांग्रेस को सियासी तौर पर नुकसान क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक उभार के बाद हुआ है. उत्तर प्रदेश से लेकर वेस्ट बंगाल, बिहार, दिल्ली सहित तमाम राज्यों में क्षेत्रीय दलों के उभार से कांग्रेस को सत्ता से ही नहीं बाहर किया बल्कि पूरी तरह से सफाया कर दिया है. क्षेत्रीय पार्टी के सियासी पैर जमाने के साथ ही कांग्रेस के लिए लड़ाई मुश्किल हो जाती है. दिल्ली के बाद पंजाब में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के हाथों से सत्ता छीन लिया है.
गुजरात के सूरत नगर निगम चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबला होने के चलते दिखा था कि आम आदमी पार्टी 27 सीटें जीतने में कामयाब रही थी जबकि कांग्रेस खाता नहीं खोल सकी थी. यही वजह है कि कांग्रेस विधानसभा चुनाव की लड़ाई को बीजेपी के इर्द-गिर्द रखना चाहती है. इसीलिए कांग्रेस इस कोशिश में है कि 2022 का चुनाव कांग्रेस बनाम बीजेपी हो. ऐसे में पार्टी बीजेपी सरकार की 27 साल की विफलताओं को लेकर जनसंपर्क शुरू किया है.
कांग्रेस गुजरात में 1960 से लेकर 1995 तक में अलग-अलग समय में करीब 27 सालों तक सत्ता में ही रही है जबकि 1995 से बीजेपी सत्ता में रही है बीच में कुछ दिनों के लिए शंकर सिंह वघेला सत्ता में रहे. कांग्रेस गुजरात में अपने 27 सालों सत्ता में रहने के दौरान किए गए कामों को लोगों के बीच रखने की रणनीति बनाई है ताकि बीजेपी के 27 साल के शासन में किए गए कामों में लोग फर्क कर सके. कांग्रेस बकायदा इसके लिए पुस्तिका तैयार कर रही है ताकि मतदाता बीजेपी और कांग्रेस के कामों की तुलना कर सकें.
कांग्रेस लगातार कहती रही है कि बीजेपी के सत्ता में आने के बाद गुजरात में कोई विकास कार्य नहीं हुआ है. राहुल गांधी से लेकर तमाम कांग्रेसी नेता अपनी रैलियों में यही बात कर रहे हैं कि बीजेपी के सरकार में आने के बाद गुजरात का विकास ठप हो गया है. इस तरह कांग्रेस एक तरफ बीजेपी को उसके 27 साल के राज में किए कार्यों को लेकर जहां घेरेगी तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी को गुजरात में सियासी आधार मजबूत करने से रोकने की भी कवायद करेगी. ऐसे में देखना है कि 27 साल कांग्रेस बनाम 27 साल बीजेपी के बीच चुनाव जंग से क्या 27 साल का वनवास खत्म कर पाएगी?