
आगामी गुजरात विधानसभा को लेकर राज्य की हर सीट पर सियासी गहमागहमी तेज है. राजनीतिक दल राज्य के साथ ही विधानसभावार रणनीति बनाकर जनता के बीच जा रहे हैं. ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि वडोदरा जिले की सावली विधानसभा सीट के बारे में बताने जा रहे हैं. साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी केतनभाई इनामदार ने कांग्रेस प्रत्याशी सागर ब्रह्मभट को 41 हजार 633 मतों से हराया था.
साल 2020 में सावली विधानसभा पर दिलचस्प सियासी घटनाक्रम देखने को मिला था. इसकी वजह थी बीजेपी विधायक केतन इनामदार का विधायक पद से इस्तीफा. हालांकि जीतू वघानी से मुलाकात और मांगों को पूरा करने का आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया था. अपने त्याग पत्र में केतन इनामदार ने आरोप लगाया था कि मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा उनकी उपेक्षा की जा रही है.
केतन इनामदार वडोदरा जिले की सावली विधानसभा सीट से दो बार के लिए चुने गए हैं. हालांकि सियासी गलियारों में चर्चा है कि इस बार उनकी टिकट कट भी सकती है.
साल 2012 के चुनाव में भी इस सीट से केतनभाई चुनाव जीते थे. उन्हें 62 हजार वोट मिले थे, जबकि उनसे हारने वाले कांग्रेस के खुमानसिंह चौहान को 42 हजार वोट मिले थे. अगर 1990 से अब तक के चुनाव पर नजर डालें तो तीन बार कांग्रेस और एक बार बीजेपी को यहां जीत मिली है. जबकि दो बार अन्य दलों को सफलता हाथ लगी है. 2007 में हुए चुनाव में कांग्रेस के खुमानसिंह को सफलता हाथ लगी थी, जबकि बीजेपी से इनामदार जिगरकुमार चुनाव हार गए थे. जिगरकुमार को 47 हजार वोट मिले थे, जबकि चौहान को 53 हजार से अधिक वोट मिले थे.
बात अगर इस सीट की समस्याओं की करें तो स्थानीय लोगों को पानी की समस्या का सामना करना पड़ता है. सावली के 34 गांवों में सिंचाई के लिए नदी का पानी नहीं है. सिंचाई व पेयजल आपूर्ति की मांग को लेकर किसान व ग्रामीण कई बार आवाज उठा चुके हैं लेकिन यह समस्या हल नहीं हुई है.