
कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है और पार्टी को दक्षिण के प्रवेश द्वार से सत्ता गंवानी पड़ी है. बीजेपी की हार को लेकर तमाम तरह की कमियां और दावे किए जा रहे हैं. लेकिन, पार्टी के अंदरखाने इस हार के बाद टॉप लीडरशिप और रणनीतिकारों के दिमाग में दो सवाल सबसे ज्यादा चल रहे हैं. पहला- स्थानीय लिंगायत नेता बीएस येदियुरप्पा को जुलाई 2021 में मुख्यमंत्री पद से हटा दिए जाने के गुस्से ने पार्टी को कितना नुकसान पहुंचाया? और दूसरा- मई 2024 में आने वाले लोकसभा चुनावों के लिए समय रहते लिंगायतों के साथ कैसे सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है?
दरअसल, कर्नाटक चुनाव के नतीजों ने किसी तरह का संदेह में नहीं छोड़ा है कि करीब 17% आबादी वाले लिंगायत वोटर्स की एक महत्वपूर्ण संख्या बीजेपी से दूर हो गई है और तीन दशकों में पहली बार कांग्रेस को वोट दिया और सरकार बनाने में बड़ी मदद की है. हालांकि, बीजेपी यह कहकर खुद को तसल्ली देने की कोशिश कर रही है कि उसका कुल वोट प्रतिशत 36% पर बना हुआ है, जो 2018 के समान ही है. लेकिन, इस फैक्ट को भी नहीं छिपाया जा सकता है कि बीजेपी को उप क्षेत्रों में जीती गई छह में से पांच सीटों पर और वोट शेयर में काफी नुकसान हुआ है.
लिंगायत के गढ़ में बीजेपी को गंवानी पड़ी हैं सीटें
उदाहरण के लिए, कित्तूर (मुंबई) कर्नाटक, कल्याण (हैदराबाद) कर्नाटक और मध्य कर्नाटक में लिंगायतों की बड़ी संख्या में आबादी है. यहां कांग्रेस के सापेक्ष को बीजेपी के पक्ष में जबरदस्त माहौल और सीटें देखने को मिलती रही हैं. लेकिन, इस बार इन तीनों क्षेत्रों में भाजपा को सीटों में बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है. यहां कित्तूर में बीजेपी 26 से 16, कल्याण में 15 से 10 और मध्य में 21 से 6 सीटों तक पहुंच गई. जबकि कांग्रेस की सीटों की संख्या बढ़ गई है. यहां कित्तूर में कांग्रेस 16 से 33, कल्याण में 21 से 26 और मध्य में 5 से 15 सीटों तक पहुंच गई.
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सिर्फ बेंगलुरु शहर में बीजेपी की सीटें बढ़ीं
पुराने मैसूरु क्षेत्र में भी बीजेपी को बड़ा नुकसान हुआ. यहां भाजपा की सीटें तेजी से गिर गईं. पहले 15 सीटें थीं और अब 5 सीटें रह गईं. जबकि कांग्रेस की सीटों की संख्या 20 से बढ़कर 43 हो गई. तटीय क्षेत्र में भाजपा की सीटें 16 से घटकर 13 हो गईं, जबकि कांग्रेस की सीटों की संख्या 3 से बढ़कर 6 हो गई. सिर्फ बेंगलुरु शहर में ही बीजेपी को फायदा हुआ. वहां सीटें 11 से बढ़कर 16 हो गईं हैं, जबकि कांग्रेस की सीटें 13 से घटकर 12 हो गईं.
कांग्रेस की डबल इंजन लीडरशिप...
माना जा रहा है कि चुनाव प्रचार में जहां भाजपा ने अपनी डबल-इंजन सरकार के फायदे गिनाए और विकासों कार्यों में तेजी लाने का दावा किया, वहीं सिद्धारमैया और वोक्कालिगा समाज के बड़े नेता शिवकुमार ने अलग ही रणनीति के तहत काम किया. दोनों नेताओं ने ओबीसी, दलितों और मुसलमानों के बीच पैठ बनाने के लिए चुपचाप एक डबल-इंजन लीडरशिप तैयार की. फैक्ट यह है कि दोनों ने खुद को 'मुख्यमंत्री उम्मीदवार' के रूप में पेश किया और फिर भी साथ काम किया. अपने समर्थकों को रैली करने के लिए जोश भरा.
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'अंत समय में भरोसा नहीं जीत पाई बीजेपी?'
दूसरी ओर, बीजेपी ने लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों को साधने के लिए आरक्षण का दांव चला. मुसलमानों को दिए गए 4% आरक्षण को हटाकर लिंगायत और वोक्कालिगा को 2-2% अतिरिक्त आरक्षण देकर लुभाने की कोशिश की. वहीं, आदिवासियों को 6% आरक्षण का आश्वासन देकर चुनाव जीतने की रणनीति बनाई. इस पूरे कैंपेन के बीच आरक्षण का फैसला या वादा काफी देर से आने के कारण सरकार की ईमानदारी के बारे में ना तो अगड़े और ना ही पिछड़े समुदायों को भरोसा हो पाया.
'2019 में कर्नाटक ने मोदी पर जताया था पूरा भरोसा'
उधर, कर्नाटक की राजनीति में येदियुरप्पा को साइडलाइन करने के निर्णय के बाद माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फैसला किया कि वो बड़े स्तर पर प्रचार करेंगे और कर्नाटक के लोगों से सीधा जुड़ाव बनाएंगे. आखिर, 2019 के लोकसभा चुनावों में कन्नडिगों ने मोदी पर पूरा विश्वास जताया था और बीजेपी को 28 में से 26 लोकसभा सीटें दी थीं, जिसमें बीजेपी द्वारा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार सुमलता अंबरीश ने भी जीत हासिल की थी. जबकि कांग्रेस और जेडी (एस) एक-एक सीट पर सिमट गई थी.
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यह कर्नाटक में कांग्रेस का सबसे खराब प्रदर्शन था. चूंकि, वो कर्नाटक ही था, जिसने 1977 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी को 24 सीटें ऐसे समय में दी थी, जब पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस पार्टी का सफाया हो गया था. 2019 में कर्नाटक कांग्रेस सबसे निचले पॉइंट पर खड़ी थी, उसे विधानसभा और फिर लोकसभा चुनावों में दोहरी हार का सामना करना पड़ा था, ऐसे में तब हाइ कमान ने डीके शिवकुमार को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया. वहीं, सिद्धारमैया ने विपक्ष के नेता के रूप में इस्तीफा देने तक की पेशकश की थी. बाद में कांग्रेस नेताओं ने बीजेपी के खिलाफ मोर्चा संभाला और नए सिरे से रणनीति बनाई. येदियुरप्पा को घेरने के लिए ऑडियो और वीडियो टेप जारी किए गए. संगठन ने येदियुरप्पा सरकार की विश्वसनीयता को कम करना शुरू कर दिया था.
'जब बोम्मई बने सीएम और कांग्रेस ने सेट कर दिया नेरेटिव'
जब भाजपा ने येदियुरप्पा को अपने विवेक से सीएम पद छोड़ने के लिए कहने का फैसला किया और उनकी जगह एक 'कमजोर चेहरा' बसवराज बोम्मई को जिम्मेदारी दी गई तो सिद्धारमैया और शिवकुमार को आक्रामक होने का मौका मिल गया. बोम्मई ने भी उन्हें सरकार पर हमला करने के लिए पर्याप्त गोला-बारूद थमा दिया. क्योंकि राज्य में अनावश्यक रूप से हिजाब, हलाल और अजान जैसे विवादों ने तूल पकड़ा और सरकार की खासी किरकिरी हुई. उसके बाद भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी घेरा और कांग्रेस ने मौका पाते ही '40% सरकार' और 'PayCM' जैसे नैरेटिव बनाकर माहौल खड़ा कर दिया. यही वजह है कि पूरे चुनाव प्रचार में बीजेपी इन सभी मुद्दों को लेकर डिफेंसिव मोड में देखी गई.
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कर्नाटक में येदियुरप्पा को साइडलाइन करने का मास्टरमाइंड बीजेपी महासचिव बीएल संतोष को माना जाता है, जो नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों के भरोसेमंद माने जाते हैं. हाल ही में जब चुनाव को लेकर प्रक्रिया शुरू हुई तो ऐसा माना गया कि चूंकि बीएल संतोष कर्नाटक से आते हैं, इसलिए उम्मीदवारों के चयन को लेकर काफी हद तक उनकी दखलअंदाजी देखने को मिलेगी.
'शेट्टार और लक्ष्मण के टिकट काटने में किसकी भूमिका?'
जाहिर तौर पर, टॉप लीडरशिप ने भी चुनाव में नए चेहरों की तलाश करने के लिए संगठन को भी अलर्ट किया था. इतना ही नहीं, 22 मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर बड़ा संदेश देने की भी कोशिश की थी. लगभग 50 नए उम्मीदवारों को मैदान में उतारा गया, जिनमें ज्यादातर पार्टी कार्यकर्ता और आरएसएस के स्वयंसेवक थे. कहा जाता है कि जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी जैसे वरिष्ठ नेताओं को टिकट देने और दरकिनार करने में बीएल संतोष की बड़ी भूमिका रही.
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'नहीं सुनी गई येदियुरप्पा की आवाज?'
कर्नाटक चुनाव प्रचार के बीच एक समय यह भी कहा जाने लगा कि येदियुरप्पा की आवाज पार्टी में काफी कमजोर हो गई है. दरअसल, येदियुरप्पा ने अंत तक शेट्टार और सावदी के समर्थन में तर्क दिए और पार्टी को सचेत भी किया. येदियुरप्पा का कहना था कि शेट्टार और सावदी को टिकट नहीं दिए जाने से लिंगायतों के बीच गलत संदेश जाएगा, लेकिन उनकी बात को नजरअंदाज कर दिया गया और अंतिम चरण में जैसे ही येदियुरप्पा प्रचार से गायब हो गए तो लिंगायत के बीच भी संदेश पहुंचने में देर नहीं लगी. प्रचार अभियान के आखिरी दिनों तक मैदान में सिर्फ मोदी और अमित शाह थे, जो हर जगह देखे जा रहे थे.
'येदियुरप्पा एक बात साबित करते हैं...'
पूरे चुनाव प्रचार के दरम्यान येदियुरप्पा चुपचाप अपने हितों की रक्षा के लिए 'सक्रिय' रहे. उदाहरण के लिए, चिक्कमंगलूर में येदियुरप्पा के करीबी समर्थक एचडी थमैय्या ने बीजेपी छोड़ दी और कांग्रेस में शामिल हो गए. चिक्कमंगलूर में बीजेपी ने पार्टी महासचिव सीटी रवि को उम्मीदवार बनाया था. यहां रवि के खिलाफ एचडी थमैय्या उतरे और चुनाव हरा दिया. मार्च के महीने में जब येदियुरप्पा ने संकेत दिया कि शिकारीपुरा में उनके बेटे विजयेंद्र उनकी जगह लेंगे और उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ेंगे.
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'येदियुरप्पा को लेकर सीटी रवि ने मारा था ताना'
येदियुरप्पा के संकेत पर रवि ने खुले तौर पर ताना मारा था. रवि ने कहा था कि उम्मीदवारों को लेकर किसी की रसोई में निर्णय नहीं लिया जाता है. किसी को टिकट नहीं मिलेगा, क्योंकि वह किसी का बेटा है. जब चुनाव आया तो येदियुरप्पा ने बदला ले लिया. उनके बेटे ने शिकारीपुरा से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीता.
'येदियुरप्पा ने दिया साफ संदेश?'
इस तरह के लगभग एक दर्जन मामले थे, जिनमें येदियुरप्पा ने अपने करीबी समर्थकों को भाजपा छोड़ने और कांग्रेस या जद (एस) से चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि पार्टी को यह संदेश दिया जा सके कि वह बूढ़े हो गए हैं, लेकिन उन्होंने अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता नहीं खोई है.
'खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में लगी बीजेपी'
फिलहाल, इस बड़ी हार के बाद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी चौकन्ना हो गया है और अपने कोर वोट बैंक को साधने के प्रयास में जुट गया है. यही वजह है कि बीजेपी अब येदियुरप्पा की मदद से या उनके बिना अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए नए सिरे से रणनीति बनाना चाहती है.
(रिपोर्ट- रामकृष्ण उपाध्याय)