
पश्चिम बंगाल की बनगांव लोकसभा सीट 2009 में अस्तित्व में आई थी. इससे पहले यह हिस्सा बारासात संसदीय क्षेत्र के तहत आता था, लेकिन परिसीमन 2009 की रिपोर्ट में बनगांव को अलग से लोकसभा क्षेत्र घोषित किया गया. तब से लेकर अब तक इस सीट पर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) का कब्जा बना हुआ है. बनगांव उत्तर 24 परगना जिले का एक कस्बा है. इस संसदीय क्षेत्र का कुछ हिस्सा नादिया जिले में भी आता है.
आम चुनाव 2009 से इस सीट पर तृणमूल का कब्जा है. 2014 के लोकसभा चुनावों में चुने गए सांसद कपिल कृष्ण ठाकुर के निधन के बाद 2015 में इस सीट पर उपचुनाव हुए जिसमें तृणमूल कांग्रेस की ही उम्मीदवार ममता ठाकुर जीतने में कामयाब रहीं. 2015 के उपचुनाव ममता ठाकुर ने 5,39,999 वोट हासिल करके जीत दर्ज की. दूसरे पायदान पर माकपा के देबेश दास रहे, उन्हें 3,28,214 वोट मिले. तीसरे नंबर पर बीजेपी के सुब्रत ठाकुर रहे, जिन्हें 3,14,214 वोट मिले.
बनगांव सीट की राजनीतिक तस्वीर
चूंकि बनगांव संसदीय सीट 2009 में अस्तित्व में आई थी. इसलिए अभी तक यहां तीन ही लोकसभा चुनाव देखने को मिले हैं. इन चुनाव परिणामों को देखते हुए इस संसदीय क्षेत्र को तृणमूल कांग्रेस का गढ़ कहा जा सकता है. इस संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत सात विधानसभा सीटें हैं. इनमें कल्याणी (Kalyani), हरिनघाटा (Haringhata), बाग्दा (Bagda), बनगांव उत्तर (Bangaon Uttar), बनगांव दक्षिण (Bangaon Dakshin), गैघाट (Gaighata) और स्वरूपनगर (Swarupnagar) शामिल हैं. ये सभी विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हैं. बनगांव लोकसभा सीट के पहले सांसद तृणमूल कांग्रेस के गोविंद चंद्र नास्कर बने थे.
बनगांव लोकसभा सीट पर एक उप-चुनाव सहित अब तक तीन लोकसभा चुनाव हो चुके हैं और तीनों बार तृणमूल बाजी मारने में कामयाब रही है. 2009 के चुनावों में TMC के गोविंद चंद्र नास्कर 546,596 यानी 50.69 मतों के साथ जीते थे जबकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के प्रत्याशी असीम बाला दूसरे स्थान पर रहे थे. असीम बाला को 453,770 यानी 42.08 प्रतिशत वोट मिले थे. बीजेपी प्रत्याशी कृष्णपदा 3.95 फीसदी यानी 42,610 वोट पाने में कामयाब रहे थे.
क्या कहती है सामाजिक बुनावट
दरअसल उत्तर 24-परगना जिला बांग्लादेश से सटा हुआ पश्चिम बंगाल का जिला है, जो सियासी रूप से काफी महत्वपूर्ण है. यह इलाका मतुआ समुदाय का गढ़ माना जाता है. यह समुदाय 1947 में देश विभाजन के बाद शरणार्थी के तौर पर यहां आया था. बंगाल में इनकी आबादी लगभग तीस लाख है और उत्तर व दक्षिण 24-परगना जिलों की कम से कम पांच सीटों पर यह निर्णायक स्थिति में है. अमित शाह मालदा की अपनी रैली में कह चुके हैं कि उनकी सरकार शरणार्थियों को नागरिकता देगी. इस ऐलान के पीछे कहीं न कहीं मतुआ समुदाय को साधने की कोशिश देखी जा सकती है.
वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक इस संसदीय क्षेत्र की आबादी 20,81,665 है जिनमें 75.72% लोग गांवों जबकि 24.28% शहरों में रहते हैं. बनगांव संसदीय क्षेत्र की कुल आबादी में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की हिस्सेदारी क्रमशः 42.56 और 2.8 फीसदी है. 2017 की मतदाता सूची के अनुसार यहां कुल 16,67,446 मतदाता हैं, जो 1864 मतदान केंद्रों पर अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं. 2014 के संसदीय चुनावों में 83.36% मतदान हुआ था जबकि 2009 में यह आंकड़ा 86.47% था.
तृणमूल के पक्ष में था 2014 का जनादेश
2014 के चुनावों में बीजेपी तीसरे स्थान पर रही थी. यह वह इलाका है जिस पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की निगाह बनी हुई है. अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित इस सीट को बीजेपी अपने लिए अहम मान रही है. 2014 के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के कपिल कृष्ण ठाकुर ने 551,213 वोट के साथ जीत हासिल की थी. माकपा के देबेश दास दूसरे स्थान जबकि बीजेपी के केडी बिश्वास तीसरे स्थान पर रहे थे.
सांसद का रिपोर्ट कार्ड
संसदीय कार्यवाही में 76 फीसदी उपस्थित रहने वालीं ममता ठाकुर ने सदन में 6 डिबेट में हिस्सा लिए हैं. हालांकि इस दौरान वह कोई प्राइवेट मेंबर बिल नहीं ला पाईं. बनगांव लोकसभा क्षेत्र के लिए संसदीय निधि के तहत 22.50 करोड़ रुपये निर्धारित है. इस फंड से ममता ठाकुर ने विकास संबंधी कार्यों के लिए 103.64 फीसदी निधि खर्च किए हैं.