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मंदसौर लोकसभा सीट: क्या बीजेपी बचा पाएगी अपना किला?

मंदसौर लोकसभा सीट भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) के मजबूत गढ़ में से एक है. प्रदेश बीजेपी के दिग्गज नेता रहे लक्ष्मीनारायण पांडे के भरोसे बीजेपी को इस सीट पर सबसे ज्यादा जीत मिली है. खुद लक्ष्मीनारायण पांडे 8 बार यहां से सांसद रह चुके हैं.

बीजेपी ( फोटो- Reuters) बीजेपी ( फोटो- Reuters)
देवांग दुबे गौतम
  • नई दिल्ली,
  • 04 फरवरी 2019,
  • अपडेटेड 2:56 PM IST

मंदसौर लोकसभा सीट भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) के मजबूत गढ़ में से एक है. प्रदेश बीजेपी के दिग्गज नेता रहे लक्ष्मीनारायण पांडे के भरोसे बीजेपी को इस सीट पर सबसे ज्यादा जीत मिली है. खुद लक्ष्मीनारायण पांडे 8 बार यहां से सांसद रह चुके हैं. कांग्रेस का इस सीट पर प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा है और उसको सिर्फ 4 बार यहां जीत मिली है. कांग्रेस की दिग्गज नेता मीनाक्षी नटराजन यहां से सांसद रह चुकी हैं. उन्होंने 2009 के चुनाव में यहां पर जीत हासिल की थी. हालांकि अगले चुनाव में उनको हार मिली और बीजेपी के सुधीर गुप्ता यहां के सांसद बने.

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राजनीतिक पृष्ठभूमि

यहां पर साल 1957 में पहली बार चुनाव हुआ. तब कांग्रेस के मानकलाल ने जीत हासिल की थी. इसके अगले चुनाव में यह सीट कांग्रेस से छिन गई और जनसंघ को जीत मिली. लगातार 4 चुनाव में हार मिलने के बाद कांग्रेस को इस सीट पर जीत साल 1980 में मिली.

कांग्रेस(आई) के बंवरलाल राजमल ने पिछला दो चुनाव जीतने वाले लक्ष्मीनारायण पांडे को मात दी. इसके अगले चुनाव में भी कांग्रेस को जीत मिली, लेकिन 1989 में बीजेपी के लक्ष्मीनारायण पांडे ने फिर यहां पर वापसी की और जीत हासिल की. पांडे ने इसके बाद लगातार 6 चुनावों में जीत हासिल करते हुए यहां पर अपना दबदबा बनाए रखा.

2009 के चुनाव में कांग्रेस ने उनको हराने के लिए दिग्गज नेता मीनाक्षी नटराजन को यहां से उतारा. कांग्रेस का यह कदम सफल साबित हुआ और यहां पर उसका सूखा खत्म हुआ. हालांकि इसके अगले चुनाव यानी 2014 में नटराजन को बीजेपी के सुधीर गुप्ता के हाथों हार का सामना करना पड़ा.

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ऐसे में देखा जाए तो मंदसौर लोकसभा सीट बीजेपी के दबदबे वाली सीट है. लक्ष्मीनारायण पांडे का तो यहां पर खूब जादू चला है और उन्होंने सबसे ज्यादा 8 चुनावों में जीत हासिल की. कांग्रेस को इस सीट पर 4 चुनावों में ही जीत मिली है. मंदसौर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत विधानसभा की 8 सीटें आती हैं. जावरा, सुवासरा, नीमच, मंदसौर, गरोठ, जावद, मल्हारगढ़, मनासा यहा कीं विधानसभा सीटें हैं. यहां की 8 विधानसभा सीटों में से 7 पर बीजेपी और 1 पर कांग्रेस का कब्जा है.

सामाजिक ताना-बाना

मंदसौर मध्य प्रदेश का वो जिला है जो हिंदू और जैन मंदिरों के लिए खासा लोकप्रिय है. आजादी के पहले यह ग्वालियर रियासत का हिस्सा था.पशुपतिनाथ मंदिर, बाही पारसनाथ जैन मंदिर और गांधी सागर बांध यहां के मुख्य दर्शनीय स्थल हैं. इस जिले में अफीम का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है. मंदसौर राजस्थान के चित्तौड़गढ़, कोटा, भीलवाड़ा, झालावाड़ और मध्य प्रदेश के रतलाम जिलों से घिरा हुआ है.

2011 की जनगणना के मुताबिक मंदसौर की जनसंख्या 24,72,444 है. यहां की 75.49 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्र में रहती है और 24.51 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्र में रहती है. मंदसौर में 16.78 फीसदी आबादी अनुसूचित जाति की है और 5.36 फीसदी आबादी अनुसूचित जनजाति की है. चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां पर 1626571 मतदाता थे. इनमें से 788495 महिला मतदाता और 838076 पुरुष मतदाता थे. 2014 के चुनाव में यहां पर 71.40 फीसदी मतदान हुआ था.

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2014 का जनादेश

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के सुधीर गुप्ता ने यहां पर जीत हासिल की. उन्होंने कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन को हराया था. सुधीर गुप्ता को 698335 वोट मिले थे तो वहीं मीनाक्षी नटराजन को 394686 वोट मिले थे. दोनों के बीच हार जीत का अंतर 303649 वोटों का था. वहीं आम आदमी पार्टी .88 फीसदी वोटों से साथ तीसरे स्थान पर रही थी.

इससे पहले 2009 के चुनाव में मीनाक्षी नटराजन को जीत मिली थी. उन्होंने बीजेपी के लक्ष्मीनारायण पांडे को हराया था. इस चुनाव में नटराजन को 373532 वोट मिले थे तो वहीं पांडे को 342713 वोट मिले थे. लक्ष्मीनारायण पांडे को इस चुनाव में 30819 वोटों से जीत मिली थी.

सांसद का रिपोर्ट कार्ड

59 साल के सुधीर गुप्ता 2014 में पहली बार सांसद चुने गए. 16वीं लोकसभा में उनके प्रदर्शन की बात जाए तो संसद में उनकी उपस्थिति 89 फीसदी रही. उन्होंने 354 बहस में हिस्सा लिया और 980 सवाल भी किए. साथ ही उन्होंने 1 प्राइवेट मेंबर बिल भी लाया.

बीजेपी सांसद सुधीर गुप्ता( फोटो- Twitter)

सुधीर गुप्ता को उनके निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए 20 करोड़ रुपये आवंटित हुए थे. जो कि ब्याज की रकम मिलाकर 22.83 करोड़ हो गई थी. इसमें से उन्होंने 19.22 यानी मूल आवंटित फंड का 94.35 फीसदी खर्च किया. उनका करीब 3.6 करोड़ रुपये का फंड बिना खर्च किए रह गया.

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