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रेलवे के खाली पदों को नहीं भर पाई मोदी सरकार, हर साल घटते गए कर्मचारी

इंडिया टुडे की आरटीआई का जवाब देते हुए भारतीय रेलवे ने बताया कि अकेले रेलवे में ग्रुप सी और डी के 2 लाख 66 हजार 790 पद खाली है. ग्रुप ए और बी की नौकरी जोड़ देने पर ये 3 लाख के पार हो जाएगा.

क्या आरक्षण सच में बेरोजगारों को कोई राहत देने वाला है (फाइल फोटो-PTI) क्या आरक्षण सच में बेरोजगारों को कोई राहत देने वाला है (फाइल फोटो-PTI)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 10 जनवरी 2019,
  • अपडेटेड 11:59 AM IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने सवर्ण गरीबों को सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण देने का ऐतिहासिक कदम उठाया है. लोकसभा और राज्यसभा में संविधान संशोधन बिल पास भी हो गया. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन भी जाएगा, लेकिन क्या आपको पता है कि देश में भयावह बेरोजगारी का दौर है. इस समय 3 करोड़ 10 लाख नौजवान बेरोजगार है. भारत में बेरोजगारी का दर 6 फीसद के पार है. हर साल एक करोड़ नौजवान नौकरी खोजने निकलते हैं. ऐसे में सवाल उठता है क्या आरक्षण सच में बेरोजगारों को कोई राहत देने वाला है. इंडिया टुडे की ओर से दाखिल आरटीआई में रेलवे की नौकरियों को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है. रेलवे में बेरोजगारों की नौकरी सरकार दबाकर बैठी है.

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भारतीय रेलवे देश में सबसे अधिक नौकरी देने वाली संस्था है. लेकिन नवंबर 2018 में अकेले रेलवे में 2 लाख 66 हजार 790 पद खाली है. ये केवल ग्रुप सी और डी की नौकरियों के खाली पद का आंकड़ा है. ग्रुप ए और बी की नौकरी जोड़ देने पर ये 3 लाख के पार हो जाएगा. हर साल रेलवे से कर्मचारी रिटायर हो रहे हैं, लेकिन उनकी जगह को भरा नहीं जा रहा है. एक तरह से कहे तो इन नौकरियों को खत्म कर दिया जा रहा है. 2008-09 में 13,86,011 रेलवे कर्मचारी थे. 20116-17 में यह आकंड़ा घटकर 13,08,323 हो गया है.

आंकड़ों के मुताबिक, 2014-15 में रिटायर हुए लगभग 59960 हजार कर्मचारी और नौकरी मिली 15191. यानि 44769 नौकरी खत्म हो गई. इसके अगले साल रिटायर हुए 53654 और रखे गए 27995, मतलब 25659 नौकरी खत्म हो गई. इसी तरह 2016-17 में फिर रिटायर हुए 58 हजार 373 और रखे मात्र 19587. मतलब 38768 नौकरी खत्म हो गई. मोदी सरकार ने नया रोजगार देने की बात की थी और जो रोजगार थे उसमें भी सरकार 109214 नौकरी खत्म कर दी.

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एक और आंकड़ा गौर करने वाला है. ये भारत सरकार के लेबर ब्यूरो की रिपोर्ट है. मनमोहन सरकार के अंतिम तीन साल में सालाना 5 लाख 69 हजार नई नौकरी मिली. मोदी के पहले साल 2014-15 में सिर्फ 1 लाख 55 हजार नई नौकरी मिली. मोदी के दूसरे साल 2015-16 में 2 लाख 31 हजार नई नौकरी मिली. इसी से सिद्ध हो गया था कि मौजूदा सरकार के पास बेरोजगार नौजवानों के दर्द का जवाब नहीं है.

सोचिए कि सरकार कह रही है कि नौकरियों की बाढ़ आई हुई है. नया रोजगार छोड़िए, पुराना बच जाए तो गनीमत. 2015 में टीसीएस के लगभग 5 हजार कर्मचारियों की नौकरी गई. 2016 में एल एंड टी के 14 हजार कर्मचारियों की नौकरी चली गई. आस्क मी स्टार्टअप ने 4 हजार कर्मचारियों को निकाल बाहर किया. नोकिया का कारखाना बंद होने से 8 हजार कर्मचारी बेरोजगार हुए. बस निर्माता स्केनिया ने 1200 कर्मचारियों को निकाल बाहर किया.

चुनाव सिर पर है और तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करने के बाद मोदी सरकार ने रेलवे में 1.2 लाख खाली पदों को भरने का फैसला किया है. 

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