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आंध्र प्रदेश: NDA का गणित, 'CIA' का फैक्टर और कंट्रोल-डिलीट पॉलिटिक्स... किंग और किंगमेकर बनकर लौटे चंद्रबाबू नायडू

Andhra pradesh result: इस प्रचंड जीत के साथ चंद्रबाबू नायडू को यह तय करने का अधिकार होगा कि अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा. अटल बिहारी वाजपेयी के दिनों में नायडू एक सुपर पावर सीएम थे. अब वो समय फिर से आ गया है. टीडीपी के शीर्ष नेता फिलहाल इस बात पर जोर दे रहे हैं कि INDIA ब्लॉक से प्रस्ताव आने के बावजूद नायडू एनडीए के साथ बने रहेंगे.

चंद्रबाबू नायडू की शानदार वापसी. चंद्रबाबू नायडू की शानदार वापसी.
टी एस सुधीर
  • नई दिल्ली,
  • 04 जून 2024,
  • अपडेटेड 7:14 PM IST

नारा चंद्रबाबू नायडू एक बार फिर किंगमेकर बन सकते हैं. तेलुगु देशम पार्टी की सत्ता में धमाकेदार वापसी को राजनीतिक गलियारों में 'मदर आफ' कमबैक' यानी कि प्रचंड वापसी बताया जा रहा है. नायडू 20 साल बाद ऐसे शख्स होंगे जिन पर अमरावती से लेकर दिल्ली तक में राजनीतिक पंडितों की नजर होगी. 272 के मैजिक नंबर दूर रही बीजेपी को अब अपनी सरकार को चलाने के लिए नायडू पर निर्भर रहना होगा. इससे राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद बढ़ेगा. 

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यह किसी भी तरह से आसान जीत नहीं थी. 2019 के विधानसभा चुनावों में सिर्फ़ 23 सीटों पर सिमटने के बाद, नायडू का वाईएसआर कांग्रेस ने न सिर्फ मज़ाक उड़ाया बल्कि पिछले साल कौशल विकास मामले में उन्हें 53 दिनों के लिए जेल भी जाना पड़ा. 4 जून को उनके प्रदर्शन ने दिखा दिया कि कभी हार नहीं माननी चाहिए. पिछले पांच सालों में, नायडू ने एक-एक दिन संघर्ष किया और जब वे 13 मई के चुनाव में बॉक्सिंग रिंग में उतरे, तो उन्होंने अपने धुरंधर वाईएस जगनमोहन रेड्डी को करारी शिकस्त दी. वाईएसआरसीपी ने 2019 में हासिलत किए बहुमत (175 में 151) को नायडू एंड कंपनी की आंधी के आगे गंवा दिया. 

ऐसा क्या नाटकीय बदलाव हुआ कि जगन को एनडीए के बैनर तले नायडू के नेतृत्व वाले तेलुगु देशम-जन सेना-बीजेपी के मजबूत गठबंधन ने हरा दिया. इसका मतलब यह हुआ कि जगन वह नहीं कर पाए जो उनके पिता दिवंगत वाईएस राजशेखर रेड्डी ने 2009 में किया था. ये जादूगरी थी लगातार दूसरी बार सत्ता में बने रहना.

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NDA का गणित

आंध्र प्रदेश में सत्ता का अंकगणित निर्णायक था और यह सुनिश्चित करता रहा कि गठबंधन हमेशा सत्ता के करीब रहे. तेलुगु देशम के रणनीतिकारों ने यह भी हिसाब लगाया की कि पांच साल के बाद सत्ता विरोधी लहर जगन को 2019 में मिले 49.95 प्रतिशत वोट में गिरावट सुनिश्चित करेगी. उच्च जातियों और शहरी आबादी के साथ वाईएसआरसीपी का मोहभंग जमीन पर स्पष्ट था. इसके अलावा कम्मा और कापू समुदायों का एकजुट होना भी बढ़िया रहा. सोने पर सुहागा रहा यूथ पावर जो कि पवन कल्याण की उपस्थिति से उत्साहित था. इस कॉकटेल ने सत्तापक्ष को नॉकआउट कर दिया. 

जगन को उम्मीद थी कि पीडब्लूजी सत्ता में वापसी कराने में मददगार साबित होगी. इससे पहले कि आप आश्चर्यचकित हो जाएं, पीडब्लूजी का मतलब खूंखार नक्सली संगठन पीपुल्स वार ग्रुप से नहीं है, बल्कि ये आंध्र प्रदेश के 65 लाख पेंशनभोगियों, महिलाओं (women) और ग्रामीण (Grameen) मतदाताओं के समूह से है. चूंकि वे जगन के शासन के रेवडी केंद्रित मॉडल के लाभार्थी थे, इसलिए इस समूह से उम्मीद थी कि वे वाईएसआरसीपी को फायदा पहुंचाएंगे. लेकिन परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि 'पीडब्लूजी' ने जगन के पीछे अपना पूरा ज़ोर नहीं लगाया है, जैसा कि उन्होंने उम्मीद की होगी.

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'CIA' फैक्टर

के चंद्रशेखर राव और उनकी बीआरएस को दिसंबर 2023 में तेलंगाना में धूल चाटनी पड़ी. राज्य में उनके विधायकों को भ्रष्ट और अहंकारी माना जाता था, जबकि खुद केसीआर की छवि ऐसी नेता की बन गई थी जिनसे मिलना मुश्किल था. अब CIA फैक्टर ने जगन को भी नीचे गिरा दिया है. इस CIA का अर्थ कुछ इस तरह है. सी फॉर करप्शन, आई फॉर इनएक्सेसिबिलिटी और ए फॉर ऑथॉरिटेरियनिज्म एंड एरोगेंस. इसके साथ वाईएसआरसीपी ने अपनी कब्र खुद खोदी. हालांकि वाईएसआरसीपी को एक व्यक्ति की पार्टी के रूप में देखा जाता था, जो जगन के नाम पर वोट मांगती थी, लेकिन स्थानीय स्तर पर इस पार्टी के विधायक और नेता बेहद शक्तिशाली थे और अक्सर खुद ही कानून थे. आंध्र प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर ने डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर द्वारा पैदा की गई सद्भावना और गुडविल को खत्म कर दिया. जगन के मंत्रिमंडल में इतने सारे मंत्रियों को जनता द्वारा खारिज कर दिया जाना स्पष्ट संकेत है.

जगन को चुनाव से करीब एक साल पहले इस समस्या का एहसास हुआ. उन्होंने केसीआर जैसी गलती न करने की कोशिश की. ये गलती थी उन विधायकों को न हटाना जिनके जीतने की संभावना संदेहास्पद थी. लेकिन जगन कुछ ज्यादा ही आगे चले गए. उन्होंने 50 प्रतिशत उम्मीदवारों को या तो हटा दिया या फिर फेरबदल कर दिया.  हालांकि, उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि इसका राजनीतिक संदेश कितना गलत गया.  जब उन्होंने एक विधायक को एक सीट से हटाकर दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में भेज दिया या किसी सांसद को लोकसभा के लिए लड़ने के बजाय विधानसभा सीट से लड़ने के लिए कहा, तो वे स्वीकार कर रहे थे कि पहला व्यक्ति जीतने के काबिल नहीं था और वे दूसरे निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं को घटिया विकल्प दे रहे थे. टीडीपी ने इस पहलू पर जमकर हमला किया और इसे एक सीट से दूसरी सीट पर फेंके जा रहे कचरे के रूप में पेश किया. 

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विकास या उसका अभाव

जगन ने आंध्र के ह्युमन इंडेक्स को बढ़ाने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करते हुए शासन के केरल मॉडल का अनुसरण किया. लेकिन लोगों को नौकरी, बेहतर सड़कें और बुनियादी ढांचा भी चाहिए था. उद्योग को लुभाने में जगन की विफलता उनकी कमजोरी थी क्योंकि इससे यह धारणा बनी कि उन्हें ठोस संपत्ति बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है. जगन ने सोचा कि हर महीने जेब में पैसा डालना लोगों को अपने पक्ष में रखने का एक बढ़िया तरीका है. वह इस बात पर ध्यान केंद्रित करने में विफल रहे कि हैदराबाद के नुकसान की भरपाई जल्द से जल्द एक मजबूत राजधानी बनाकर करनी होगी. तीन राजधानियों की उनकी योजना एक ऐसे राज्य के लिए बहुत काल्पनिक थी जो अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा था. 2023 में विशाखापत्तनम में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट को छोड़कर, उद्योगों को आमंत्रित करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया. जगन भूल गए कि उनका मुकाबला नायडू से था जिन्हें अतीत में सीईओ-सीएम के रूप में मनाया जाता रहा है. यही कारण है कि कई युवाओं ने नायडू की वापसी के लिए स्वेच्छा से अभियान चलाने के लिए समूह बनाए. ताडेपल्ली में अपने घर में बैठे जगन ने अपने दरवाजे पर पनप रहे विद्रोह नहीं देखा. नायडू को बस मतदाताओं को अपने पिछले रिकॉर्ड की याद दिलानी थी और मतदाताओं ने उन पर दोबारा काम करने का भरोसा जताया.

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पवन कल्याण की शक्ति

अभिनेता से नेता बने पवन गेमचेंजर साबित हुए. अपने साहसिक निर्णयों के साथ वे वास्तविक जीवन में भी एक पावर स्टार साबित हुए. सितंबर 2023 में राजमुंदरी जेल के अंदर नायडू से मिलने के बाद उनके साथ गठबंधन करने का उनका कदम, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से नाराजगी का जोखिम उठाने के बावजूद उनके राजनीतिक कौशल और मानवीय पक्ष को दर्शाता है. वह दिल्ली को यह समझाने की कोशिश करते रहे कि अगर तीनों दल एक साथ आते हैं, तो ही जगन को हराया जा सकता है. भले ही उनकी सार्वजनिक बैठकें ऊर्जा से भरी हुई थीं और वे सही मायने में एक स्टार प्रचारक थे, लेकिन पवन ने अहंकार नहीं किया और जेएसपी द्वारा लड़ी जाने वाली सीटों की संख्या को कम करने के लिए तैयार थे, ताकि भाजपा को समायोजित किया जा सके. पवन भले ही अभी भी एक शुरुआती राजनेता हों, लेकिन उन्होंने दिखाया कि राजनीति में शालीनता के लिए जगह है.

प्रतिशोध का शासन

पिछले साल नायडू की गिरफ़्तारी बदले की राजनीति का एक क्लासिक मामला लग रहा था. ऐसा लग रहा था मानो जगन नायडू के लिए विचाराधीन कैदी के टैग से कम कुछ नहीं चाहते थे. उम्रदराज नायडू को जेल में ले जाने की घटना ने टीडीपी समर्थकों के लिए एक टॉनिक का काम किया और उन्होंने नायडू के लिए समर्थन जुटाने के लिए हर संभव कोशिश की. सिर्फ़ वोट डालने के लिए अमेरिका और मध्य पूर्व से आने वाले लोगों की संख्या नायडू के समर्थन के लिए दृढ़ संकल्पित और टीडीपी के पक्ष में एकजुटता का सबूत थी.

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बेटे की पद यात्रा

चंद्रबाबू नायडू के बेटे नारा लोकेश ने 226 दिनों में दक्षिण आंध्र प्रदेश के कुप्पम से उत्तरी तटीय आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम तक 3132 किलोमीटर लंबी पदयात्रा की. आंध्र की राजनीति में पदयात्रा ने हमेशा से ही चुनावी लाभ अर्जित किया है. जैसे 2004 से पहले वाईएसआर, 2014 से पहले नायडू और 2019 से पहले जगन. हालांकि इसने लोकेश को टीडीपी में नंबर 2 के रूप में स्थापित किया, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पदयात्रा के दौरान उनका व्यवहार - जब लोग अपनी शिकायतें दर्ज करवा रहे थे, तो उन्हें नोट करना, यह बताता कि वे समस्याओं को कैसे हल करेंगे. इससे विश्वास का रिश्ता स्थापित हुआ. वाईएसआरसीपी ने हर किलोमीटर पर लोकेश द्वारा की जा रही छोटी-छोटी बढ़त का मुकाबला करने के लिए कुछ खास नहीं किया, जिससे वे आम तेलुगु लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहे थे.

कंट्रोल और डिलीट पॉलिटिक्स

यह धारणा कि जगन केवल नायडू द्वारा किए गए हर काम को रद्द करना चाहते हैं, तुच्छ राजनीति की पहचान लगती है. 2019 में सत्ता में आने पर जगन ने सबसे पहला काम नायडू द्वारा बनाए गए कॉन्फ्रेंस हॉल प्रजा वेदिका को ध्वस्त करने के रूप में किया था. इससे ये मैसेज गया कि जगन नायडू के काम और विरासत को मिटाने वाले जुनूनी व्यक्ति हैं. नायडू के सत्ता में रहने के दौरान आंध्र प्रदेश सरकार के विभिन्न विभागों के लिए काम करने वाली कंपनियों ने पाया कि उनके काम को नई सरकार के प्रति वफादार नौकरशाहों ने बर्बाद कर दिया गया और बिलों को मंजूरी नहीं दी गई. जगन भूल गए कि सरकार एक सतत इकाई है चाहे सत्ता में कोई भी हो.

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जगन परिवार में संघर्ष

पारिवारिक कलह ने दिखा दिया कि जगन अपनी बहन और चचेरे भाई को भी अपने साथ नहीं रख सकते. विवेकानंद रेड्डी हत्याकांड में आरोपी अविनाश रेड्डी को कडप्पा लोकसभा सीट से बहन शर्मिला के खिलाफ फिर से उम्मीदवार बनाने के जगन के फैसले ने यह धारणा बनाई कि उनके अपने परिवार के सदस्य ही उनके खिलाफ हैं. इसके विपरीत, नायडू परिवार के चार सदस्य टीडीपी के बैनर तले चुनाव लड़ रहे थे, जबकि पवन के भाई नागबाबू ने पिथापुरम में उनके अभियान की कमान संभाली और चिरंजीवी ने उनकी उम्मीदवारी का समर्थन किया.

फिलहाल, टीडीपी के शीर्ष नेता इस बात पर जोर दे रहे हैं कि वे INDIA ब्लॉक से प्रस्ताव आने के बावजूद एनडीए के साथ बने रहेंगे. किसी भी तरह, नायडू को यह तय करने का अधिकार होगा कि अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा. अटल बिहारी वाजपेयी के दिनों में नायडू एक सुपर पावर सीएम थे. अब वो समय फिर से आ गया है. 
 

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