
लोकसभा चुनाव से पहले नेताओं के दल-बदल का सिलसिला तेज हो गया है. यूपी से बिहार, महाराष्ट्र से गुजरात तक एक के बाद एक नेता अपनी पुरानी पार्टी छोड़ नए ठिकाने तलाश रहे हैं. सबसे अधिक झटके कांग्रेस को लग रहे हैं. राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा की शुरुआत के समय ही महाराष्ट्र में मिलिंद देवड़ा के इस्तीफे से नेताओं के कांग्रेस छोड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह गुजरात से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक जारी है. अरुणाचल में चार विधायकों वाली पार्टी की स्ट्रेंथ तीन विधायकों के पार्टी छोड़ने से एक पर आ गई है तो वहीं गुजरात में भी एक के बाद एक बड़े नेता पार्टी छोड़ते जा रहे हैं. चुनावी साल में पांच ऐसे पालाबदल हुए हैं जो कांग्रेस को बड़ा घाव दे सकते हैं.
अशोक चव्हाण
महाराष्ट्र के पूर्व सीएम अशोक चव्हाण मराठवाड़ा रीजन की नांदेड़ सीट से सांसद भी रहे हैं. 2014 के आम चुनाव में अशोक ने मोदी लहर के बावजूद नांदेड़ की सीट कांग्रेस की झोली में डाल दी थी. हालांकि, 2019 के चुनाव में वह बीजेपी उम्मीदवार से हार गए थे. तब वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए) के उम्मीदवार को एक लाख 66 हजार से अधिक वोट मिले थे. वीबीए इस बार कांग्रेस और शिवसेना यूबीटी के साथ विपक्षी गठबंधन में शामिल है. अशोक चव्हाण को बीजेपी ने राज्यसभा भेज दिया है.
बीजेपी अशोक के आने के बाद नांदेड़ में चुनावी राह आसान होने, मराठवाड़ रीजन में क्लीन स्वीप के दावे कर रही है. चव्हाण के पिता शंकरराव चव्हाण भी सूबे के सीएम रहे हैं और मराठवाड़ा रीजन में चव्हाण फैमिली का अच्छा प्रभाव माना जाता है. अशोक के पार्टी छोड़ने के बाद नेतृत्व के मोर्चे पर कांग्रेस के पास इस रीजन में प्रभावशाली चेहरे का अभाव उत्पन्न हो गया है. महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं. कांग्रेस 2014 में दो सीटें जीतने में सफल रही थी जिसमें एक सीट नांदेड़ भी थी जहां से खुद अशोक चव्हाण जीते थे.
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अर्जुन मोढवाडिया
पोरबंदर सीट से तीन बार के विधायक अर्जुन मोढवाडिया गुजरात के बड़े ओबीसी नेताओं में गिने जाते हैं. पोरबंदर और आसपास की सीटों के साथ ही सूबे के अन्य इलाकों में ओबीसी वर्ग के मतदाताओं के बीच भी अच्छी पैठ मानी जाती है. वह साल 2004 से 2007 तक गुजरात विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे हैं.
मोढवाडिया ने 2022 के चुनाव में बीजेपी की प्रचंड लहर में भी पोरबंदर सीट कांग्रेस की झोली में डाली थी. बीजेपी ने इस बार पोरबंदर सीट से केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया को उम्मीदवार बनाया है. चुनाव से ठीक पहले गुजरात कांग्रेस की कमान संभाल चुके मोढवाडिया का पार्टी छोड़ जाना भी ग्रैंड ओल्ड पार्टी के लिए बड़ा झटका है.
नारणभाई राठवा
गुजरात के छोटा उदयपुर से ताल्लुक रखने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री नारणभाई राठवा भी कांग्रेस छोड़ अपने बेटे मोहन राठवा और समर्थकों के साथ बीजेपी में जा चुके हैं. राठवा 1989 से 2004 के बीच छोटा उदयपुर सीट से पांच बार सांसद रहे हैं. यूपीए-1 सरकार में रेल राज्यमंत्री रहे राठवा फिलहाल राज्यसभा सांसद हैं और उनका कार्यकाल अप्रैल महीने में समाप्त हो रहा है. उनके पार्टी छोड़ जाने के बाद कांग्रेस के सामने आदिवासी समाज में अपनी सियासी जमीन बचाने की चुनौती होगी.
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पद्मजा वेणुगोपाल
केरल के पूर्व मुख्यमंत्री एके एंटनी के बेटे अनिल एंटनी पहले ही बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. अब चार बार सूबे के सीएम रहे के करुणाकरण की बेटी पद्मजा वेणुगोपाल के भी बीजेपी में शामिल होने की चर्चा जोरो पर है. पद्मजा वेणुगोपाल कांग्रेस के टिकट पर 2004 में पहली बार चुनाव मैदान में उतरी थीं. हालांकि, वह हार गई थीं.
पद्मजा इसके बाद 2016 और 2021 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरीं. हर बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा. चर्चा है कि केरल में सियासी आधार तैयार करने की कोशिशों में जुटी बीजेपी करुणाकरण परिवार से आने वाली पद्मजा को भी अनिल एंटनी की तरह लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बना सकती है.
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मनोज पांडेय
रायबरेली जिले की ऊंचाहार सीट से सपा के विधायक मनोज पांडेय ने विधानसभा में चीफ व्हिप पद से इस्तीफा दे दिया था. मनोज ने राज्यसभा चुनाव में भी सपा की लाइन से हटकर बीजेपी उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी. मनोज के बीजेपी में शामिल होने की अटकलें हैं. वह विधायक सपा के हैं लेकिन बीजेपी से उनकी करीबी कांग्रेस को बड़ा घाव दे सकती है.
मनोज रायबरेली का मजबूत ब्राह्मण चेहरा माने जाते हैं और गांधी परिवार से भी उनकी करीबी रही है. ऊंचाहार में उनके नए मकान में गृह प्रवेश का कार्यक्रम था, तब उसमें शामिल होने के लिए खुद सोनिया गांधी भी रायबरेली आई थीं. रायबरेली में दिनेश प्रताप सिंह समेत कई ठाकुर नेता पहले ही कांग्रेस से किनारा कर चुके हैं. अब मनोज का पालाबदलना भी सपा से कहीं अधिक कांग्रेस के लिए झटका होगा.