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जाटों पर फोकस, साउथ पर नजर... चुनावी साल में 5 भारत रत्न, जानिए मोदी सरकार के इस दांव के मायने

राम मंदिर उद्घाटन के बाद से ही बीजेपी लगातार मास्टर स्ट्रोक खेल रही है और विपक्षी खेमे को नैरेटिव की लड़ाई में हराने के लिए हरसंभव कदम उठा रही है. इन प्रयासों में काफी हद तक सफल भी दिख रही है. बीजेपी जानती है कि नैरेटिव की लड़ाई जीतना भी उतना ही जरूरी है, जितना चुनावी मैदान में विपक्ष को हराना. मोदी और राम मंदिर की लहर तो चल ही रही है, लेकिन सीटों का टारगेट छूकर नए रिकॉर्ड बनाना भी किसी चुनौती से कम नहीं है.

केंद्र की मोदी सरकार ने चुनावी साल में पांच भारत रत्न देने का ऐलान किया है. केंद्र की मोदी सरकार ने चुनावी साल में पांच भारत रत्न देने का ऐलान किया है.
उदित नारायण
  • नई दिल्ली,
  • 09 फरवरी 2024,
  • अपडेटेड 4:10 PM IST

चुनावी साल में भारत रत्न दिए जाने का नया रिकॉर्ड बन गया है. केंद्र की मोदी सरकार ने 17 दिन के भीतर पांच शख्सियतों को भारत रत्न दिए जाने का ऐलान किया है. शुक्रवार को खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीटर पर सिलसिलेवार तीन पोस्ट किए. पीएम मोदी ने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह और पूर्व पीएम नरसिम्हा राव को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा. इसके साथ ही महान वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन को भी मरणोपरांत भारत रत्न दिए जाने का ऐलान किया. एक दिन में तीन भारत रत्न की घोषणा किए जाने से चुनावी माहौल में चर्चाएं भी तेज हो गईं.

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इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 जनवरी को बिहार के पूर्व सीएम और जननायक कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने का ऐलान किया था. ये ऐलान कर्पूरी ठाकुर की जयंती से ठीक एक दिन पहले किया था. उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने 3 फरवरी को पूर्व उपप्रधानमंत्री और बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा की. चुनावी साल में पांचों भारत रत्न के सियासी मायने निकाले जाने लगे हैं.

'आम चुनाव से पहले नैरेटिव की लड़ाई'

राम मंदिर उद्घाटन के बाद से ही बीजेपी लगातार मास्टर स्ट्रोक खेल रही है और विपक्षी खेमे को नैरेटिव की लड़ाई में हराने के लिए हरसंभव कदम उठा रही है. इन प्रयासों में काफी हद तक सफल भी दिख रही है. बीजेपी जानती है कि नैरेटिव की लड़ाई जीतना भी उतना ही जरूरी है, जितना चुनावी मैदान में विपक्ष को हराना. मोदी और राम मंदिर की लहर तो चल ही रही है, लेकिन सीटों का टारगेट छूकर नए रिकॉर्ड बनाना भी किसी चुनौती से कम नहीं है. यही वजह है कि बीजेपी 2019 में जिन सीटों पर कम वोटों के अंतर से चुनाव हारी थी, वहां दो साल से फोकस कर रही है. जिन राज्यों में खुद को कमजोर पाती है, वहां क्षेत्रीय दलों से हाथ मिलाने में पीछे नहीं हट रही है. 

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'बिहार में बुन लिया एनडीए की जीत का ताना-बाना'

सबसे पहले बात बिहार की. बिहार में पूर्व सीएम दिवंगत कर्पूरी ठाकुर को बड़ा समाजवादी चेहरा माना जाता है. ठाकुर को जननायक के रूप में भी पहचान मिली है. वे बिहार में आज भी अपनी सरलता और सादगी के लिए जाने जाते हैं. जदयू प्रमुख नीतीश कुमार लंबे समय से कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने की मांग उठा रहे थे. बीजेपी ने कर्पूरी ठाकुर की 100वीं जयंती से एक दिन पहले उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न देने की घोषणा करके इंडिया ब्लॉक में भी तोड़फोड़ कर दी है और इस विपक्षी गठबंधन के सूत्रधार जदयू प्रमुख नीतीश कुमार को वापस अपने पाले (NDA) में कर लिया. इतना ही नहीं, कर्पूरी ठाकुर के जरिए बीजेपी ने चुनावी जीत का ताना-बाना भी बुन लिया. बिहार में ओबीसी का बड़ा वर्ग कर्पूरी ठाकुर को अपना आदर्श मानता है. यही वजह है कि जब पीएम मोदी ने उन्हें भारत रत्न देने का ऐलान किया तो आरजेडी को भी केंद्र सरकार को धन्यवाद ज्ञापित करना पड़ा. चुनाव से पहले के सर्वे भी बता रहे हैं कि नीतीश की वापसी के बाद एनडीए और मजबूत हुआ है और बीजेपी को बिहार साधने के लिए बड़ा चेहरा मिल गया है.

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'आडवाणी के जरिए दिया संगठन को संदेश'

इधर, 22 जनवरी को अयोध्या में पूरे देश के हिंदू समुदाय की 500 साल पुरानी मुराद पूरी हुई है. नए राम मंदिर में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा हो गई है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 दिन तक कठोर व्रत और नियमों का पालन किया. राम मंदिर उद्घाटन के 10 दिन बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया कि पूर्व डिप्टी पीएम लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा. मोदी ने आडवाणी के कामों को याद किया और देश के विकास में उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया. आडवाणी को भारत रत्न देकर मोदी सरकार ने अपने संगठन को भी मैसेज दिया और यह बताया कि बीजेपी में हर किसी के सम्मान का ख्याल रखा जाता है. आडवाणी से पहले अटल बिहारी वाजपेयी को भी भारत रत्न दिया गया था.

'आडवाणी को अपना गुरु मानते हैं पीएम मोदी'

बीजेपी की पॉलिटिक्स के केंद्र में हिंदू कोर वोटर्स हैं. राम मंदिर का श्रेय भी बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जा रहा है. लेकिन, इसके पीछे सालों की मेहनत और बड़े आंदोलन को नहीं भुलाया जा सकता. 1990 के दशक में इस आंदोलन के अगुवा और बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी रहे. राम मंदिर को लेकर जब रथयात्रा निकाली गई तो उसे सफल बनाने की जिम्मेदारी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों में थी. आडवाणी गुजरात से चुनाव लड़ते रहे हैं और उन्हें पीएम मोदी का गुरु माना जाता है. खुद पीएम मोदी कई मौकों पर इसका जिक्र कर चुके हैं. साल 2002 के गुजरात दंगों के वक्त जब मोदी की सीएम पद की कुर्सी पर आंच आई, तो आडवाणी उनके लिए ढाल बनकर खड़े हो गए थे. इतना ही नहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से भी मतभेद हो गए थे.

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'देश के घरों में खुशियां लाए थे वैज्ञानिक स्वामीनाथन'

महान वैज्ञानिक डॉ. एमएस स्वामीनाथन को भी मोदी सरकार ने भारत रत्न देने का ऐलान किया है. डॉ. स्वामीनाथन को देश में हरित क्रांति लाने का जनक माना जाता है. इसका जिक्र खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है. दरअसल, जब देश आजाद हुआ, तब भूख और अकाल जैसे हालात थे. अंग्रेज देश को खोखला छोड़ गए थे. 1960 के दशक के मध्य में देश भयंकर सूखे से त्रस्त हो गया था. ना खाने को अनाज था, ना पीने के लिए ठीक से पानी. सिंचाई के लिए व्यवस्था दूर की कौड़ी थी. ऐसे में हमारा देश अनाज के लिए दूसरे मुल्कों पर निर्भर हो गया था. पश्चिम बंगाल में भीषण अकाल पड़ने से लाखों लोग मारे गए. देश में खाद्यान्न संकट बढ़ता जा रहा था. उस समय गांधीवादी वैज्ञानिक डॉ. एमएस स्वामीनाथन ने धान की ज्यादा उपज देने वाली किस्में विकसित कीं. इससे कम आय वाले किसानों के घर खुशियां आ गईं और ज्यादा पैदावार करने का एक जरिया मिल गया. देश में वही हरित क्रांति थी. उसके बाद देश के किसानों ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

'स्वामीनाथन के जरिए साधा जाएगा साउथ'

तमिलनाडु के चेन्नई में जन्मे हरित क्रांति के जनक डॉ. एमएस स्वामीनाथन ऐसी शख्सियत हैं, जिनका देश में आज भी पूरा वैज्ञानिक समुदाय सम्मान करता है. वे तमिलनाडु की शान माने जाते हैं और लोगों की उनसे भावनाएं जुड़ी हैं. स्वामीनाथन के जरिए बीजेपी ने दक्षिण भारत में अपनी पैठ मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. दक्षिण भारत के राज्यों में बीजेपी गठबंधन के लिए सहयोगी दलों की तलाश में है. कर्नाटक में जेडीएस के साथ बीजेपी का गठबंधन हो चुका है. तमिलनाडु में एआईएडीएमके से रिश्ता टूटने के बाद बीजेपी अब वहां छोटे दलों को साथ लाना चाह रही है. 2019 के चुनाव में बीजेपी का तमिलनाडु में ADIMK के साथ अलायंस था और 30 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल किए थे. इस बार बीजेपी को वहां सर्वे में बड़ा झटका लगने का अनुमान है.

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'साउथ के राज्यों पर बीजेपी का फोकस'

बीजेपी लगातार साउथ को लेकर मिशन मोड में काम कर रही है. साउथ में फिल्म डायरेक्टर एसएस राजामौली को फिल्म 'RRR' के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का अवॉर्ड दिया गया था. इससे पहले 69वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में तेलुगू सिनेमा ने सबसे ज्यादा 11 नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते थे. इसका संदेश भी साउथ में सकारात्मक गया था. अल्लू अर्जुन को फिल्म 'पुष्पा' में बेहतरीन अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया गया था. देवी श्री प्रसाद को भी इसी फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार मिला था. दक्षिण भारत के कुछ और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेताओं में कमल हासन, ममूटी, जोजू जॉर्ज का नाम शामिल था. बीजेपी ने केरल की रहने वाली एथलीट पीटी उषा को राज्यसभा सदस्य बनाया था. 

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'सेंगोल से लेकर काशी तमिल संगमम तक'

इसके अलावा, दक्षिण भारत की मान्यताओं को सम्मान देने की दिशा में भी मोदी सरकार ने कदम उठाए. काशी-तमिल संगमम आयोजित किया गया. ये कार्यक्रम देश के उत्तर और दक्षिण के बीच ऐतिहासिक और सभ्यतागत संबंधों के कई पहलुओं का जश्न है. इसका व्यापक उद्देश्य ज्ञान और सांस्कृतिक परंपराओं (उत्तर एवं दक्षिण की) को करीब लाना, साझा विरासत की समझ विकसित करना है. इतना ही नहीं, मई 2023 में जब नई संसद का उद्घाटन हुआ तो तमिलनाडु के सदियों पुराने मठ के आधीनम महंतों की मौजूदगी में 'सेंगोल' की स्थापना की गई. दरअसल, 'सेंगोल' राजदंड सिर्फ सत्ता का प्रतीक नहीं, बल्कि राजा के सामने हमेशा न्यायशील बने रहने और जनता के प्रति समर्पित रहने का भी प्रतीक रहा है.

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'देश की राजनीति के चाणक्य माने जाते थे नरसिम्हा राव'

पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव को भी भारत रत्न दिए जाने की घोषणा की गई है. पीएम मोदी ने नरसिम्हा राव को देश की समृद्धि और विकास के लिए एक ठोस नींव रखने वाला नेता बताया है. पीवी नरसिम्हा आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और कई वर्षों तक संसद और विधानसभा के सदस्य के रूप में भी रहे हैं. उन्हें 1991 में देश को आर्थिक संकट से निकालने का श्रेय भी दिया जाता है. वे लगातार 8 बार चुनाव जीते और कांग्रेस में 50 साल से ज्यादा समय तक काम किया. राजनीतिक लिहाज से देखें तो पीवी नरसिम्हा राव को देश की राजनीति का चाणक्य भी कहा जाता था. 10 भाषाओं में बातचीत करने में मास्टर माने जाते थे. उनका जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ और पढ़ाई तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में हुई. दोनों राज्यों की राजनीति में प्रभावशाली भी बने रहे. राव को 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए भी अपनी ही पार्टी में आलोचना का सामना करना पड़ा था.

 

'साधे जाएंगे साउथ के राज्य'

नरसिम्हा राव के जरिए बीजेपी ने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में वोटर्स को साधने के लिए बड़ा दांव खेला है. क्योंकि आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की पार्टी YSRP का दबदबा है. इस बार चुनाव में एनडीए का खाता भी नहीं खुलने का अनुमान लगाया जा रहा है. आम चुनाव में बीजेपी अकेले मैदान में उतर रही है. हालांकि, पवन कल्याण की पार्टी जनसेना के बाद टीडीपी भी एनडीए के साथ आने की तैयारी में हैं. ऐसे में अगर यह दांव काम करता है तो बीजेपी को कुछ हद तक सीटों का फायदा मिल सकता है. कुछ ऐसा ही हाल तेलंगाना का है. वहां कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव जीता तो उसके पक्ष में आम चुनाव को लेकर भी लहर मानी जा रही है. इस बार बीजेपी को कुछ सीटों का नुकसान होने का अनुमान लगाया जा रहा है. नरसिम्हा राव के जरिए बीजेपी एक बड़े वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिश करेगी.

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'जाटलैंड में बीजेपी ने बनाई मजबूत पकड़'

एक और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को भी भारत रत्न दिए जाने का ऐलान हुआ है. चौधरी चरण सिंह को किसानों का मसीहा कहा जाता है. पश्चिमी यूपी में जाट और किसानों के बीच चौधरी साहब की लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है. चौधरी चरण सिंह की विरासत को पहले उनके बेटे चौधरी अजित सिंह ने आगे बढ़ाया. अब अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी सियासी विरासत को आगे ले जा रहे हैं. आम चुनाव से पहले पश्चिमी यूपी में जाट, किसान और मुसलमानों को साधने की कवायद चल रही है. वैसे तो पिछले दो चुनावों में बीजेपी जाटलैंड में छाई है. लेकिन वो इस बार क्लीन स्वीप के मूड में है और यही वजह है कि बीजेपी ने जयंत की पार्टी आरएलडी को भी एनडीए में लाने के लिए हर शर्त पर मुहर लगा दी है. शुक्रवार को जब चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा हुई तो सबसे पहले जयंत चौधरी ने पीएम मोदी के पोस्ट को रीट्वीट किया और लिखा- दिल जीत लिया. उसके बाद अलायंस को लेकर कहा कि अब किस मुंह से मना कर सकते हैं. यानी बीजेपी और आरएलडी का अलायंस फाइनल हो गया है.

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'आरएलडी के लिए भी जरूरी था गठबंधन'

आम चुनाव से पहले सबसे ज्यादा चर्चा इस बार जाटलैंड यानी पश्चिमी यूपी के सियासी समीकरणों और चौधरी चरण सिंह की सियासी विरासत की हो रही है. 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद ये इलाका एकतरफा बीजेपी के पाले में चला गया था, लेकिन उसके बाद हुए किसान आंदोलन ने इस इलाके के वोटों के गणित को इतना बदल दिया है कि सभी दल पहले की तरह यहां अपने लिए संभावनाएं तलाशने लगे. हालांकि, 2014 और 2019 के चुनाव में बीजेपी ने रिकॉर्ड जीत हासिल की थी. यहां लोकसभा की कुल 27 सीटें हैं और 2019 के चुनाव में बीजेपी ने 19 सीटों पर जीत हासिल की थी. जबकि 4 सपा और 4 बसपा गठबंधन के खाते में आई थी. लेकिन, आरएलडी को किसी सीट पर जीत नसीब नहीं हुई थी. यहां तक कि जयंत को पश्चिमी यूपी में जाट समाज का भी साथ नहीं मिला था. 2014 के चुनाव में भी जयंत को निराशा हाथ लगी थी और एक भी सीट नहीं मिली थी.

'पश्चिमी यूपी में क्लीन स्वीप की तैयारी'

बीजेपी इस बार पश्चिमी यूपी की सभी 24 सीटें जीतना चाह रही है. इसके लिए आरएलडी से अलायंस हो गया है. तय फॉर्मूला के मुताबिक आरएलडी 2 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी. ये दो सीटें बागपत और बिजनोर होंगी. इसके अलावा जयंत चौधरी की पार्टी RLD को एक राज्यसभा सीट भी दी जाएगी.

'जयंत के जरिए हरियाणा को साधेगी बीजेपी'

चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने के बीजेपी के कदम को जाट समुदाय तक पार्टी की पहुंच के रूप में देखा जा रहा है. इसी वोट बैंक की बदौलत जाटों के सबसे बड़े नेता चौधरी चरण सिंह 2 बार यूपी के सीएम, केंद्र में मंत्री, उप प्रधानमंत्री और फिर देश के पांचवें प्रधानमंत्री के पद तक पहुंच गए थे. वैसे तो जाट समुदाय की आबादी पंजाब, हरियाणा, राजस्थान समेत कई राज्यों में प्रभावी है, लेकिन खासकर यूपी के पश्चिमी जिलों में स्थिति बेहद मजबूत है. यूपी में जाट प्रभाव वाले जिलों में मेरठ, मथुरा, अलीगढ़, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर, आगरा, बिजनौर, मुरादाबाद, सहारनपुर, बरेली और बदायूं का नाम शामिल है. कुछ समय बाद हरियाणा में भी विधानसभा चुनाव हैं. आरएलडी का साथ मिलने से पार्टी को वहां भी जाट समुदाय को साधने में मदद मिलेगी.

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