
लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी ने रविवार को उम्मीदवारों की अपनी पांचवीं लिस्ट जारी कर दी है. इस लिस्ट में बीजेपी ने झारखंड की भी लोकसभा सीटों से उम्मीदवारों को उतारा है. इसमें सबसे बड़ा नाम सीता सोरेन का है. बीजेपी ने उन्हें दुमका से टिकट दी है. सीता सोरेन का नाम खास इसलिए है, क्योंकि वह झारखंड के पूर्व सीएम हेमंत सोरेन की भाभी हैं. उन्होंने हाल ही में बीजेपी का दामन थामा था.
जामा से विधायक हैं सीता सोरेन
बता दें कि, सीता मुर्मू उर्फ सीता सोरेन JMM प्रमुख शिबू सोरेन की बहू और दिवंगत दुर्गा सोरेन की पत्नी हैं. सीता झारखंड मुक्ति मोर्चा की नेता रही हैं और झारखंड के ही जामा सीट से विधायक हैं. उन पर 2012 के राज्यसभा चुनाव में मतदान के लिए पैसे लेने का आरोप लगा था और वह सात महीने तक जेल में रहीं. इसके बाद से जमानत पर बाहर हैं. इसी 19 मार्च 2024 को सीता सोरेन ने पार्टी की तरफ से लगातार उपेक्षा का हवाला देते हुए झामुमो के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया.
सीता 2009 में विधायक चुनी गईं. उनके चुनाव के बाद, उन्हें झारखंड मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में नियुक्त किया गया था. 2014 में, उन्होंने उसी निर्वाचन क्षेत्र से झारखंड विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. 2019 में, उन्होंने झारखंड के जामा विधानसभा सीट से तीसरी बार विधायकी जीती है.
क्यों JMM से अलग हुईं थीं सीता सोरेन?
बता दें कि सीता सोरेन का JMM से अलग होना काफी चर्चा का विषय रहा था. इस दौरान उन्होंने पार्टी और परिवार दोनों पर हमला बोला था. बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने आजतक से बात करते हुए हेमंत सोरेन पर निशाना साधते हुए उपेक्षा का आरोप लगाया था और परिवार वाली पार्टी छोड़ने को लेकर कहा था कि, 'कारण तो बहुत सारे हैं. मैं पीएम मोदी, अमित शाह, जेपी जी को धन्यवाद देती हूं कि उन्होंने अपने विशाल परिवार में मुझे जगह दी है. मेरा मकसद भी बहुत बड़ा है क्योंकि मेरे स्वर्गीय पति के खून से सींची हुई यह पार्टी है. उनका बड़ा सपना था झारखंड को लेकर. हमने आज तक प्रयास किया कि हम झारखंडियों के लिए काम करें, लेकिन वो जगह हमें नहीं मिली.'
झारखंड में लूट चरम परः सीता सोरेन
सीता सोरेन ने कहा था कि, 'झारखंड में जमीन की लूट चरम पर है. वहां के लोग त्रस्त हैं. मैं भी कुछ नहीं कर पा रही थी. आज जिस जगह मैं पहुंची हूं, आने वाले दिनों में हमें झारखंड में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. मेरे साथ बहुत कुछ हुआ. 14 साल मैंने पार्टी में काम किया लेकिन सम्मान के नाते मुझे पार्टी में कोई पोर्टफोलियो नहीं दिया गया और पार्टी से मुझे हमेशा अलग-थलग रखा गया. मैं बहुत डिस्टर्ब चल रही थी इसी वजह से मैंने आज बीजेपी ज्वॉइन की.'
नाम घोषित होने के बाद सीता को टिकट
झारखंड में संथाल परगना को सोरेन परिवार का गढ़ माना जाता था. मोदी लहर में भी 2014 में शिबू सोरेन ने दुमका से जीत का परचम लहराया था, जबकि राजमहल सीट भी पार्टी के हिस्से में आई थी. वहां से अब सोरेन परिवार की बड़ी बहू ही जेएमएम को 2024 में चुनौती देंगी. दुमका से बतौर लोकसभा प्रत्याशी वर्तमान सांसद सुनील सोरेन का नाम घोषित किए जाने के बाद भी बीजेपी ने सीता सोरेन को प्रत्याशी बना दिया है.
परिवार में उपेक्षा के कारण छोड़ा साथ
बीजेपी संथाल परगना के साथ ही ट्राइबल के बीच यह संदेश देना चाहती है कि जो परिवार अपने बड़ी बहू का नहीं हो सका वो उनका क्या होगा. बता दें कि यहां ट्राइबल की संख्या 26% है. हाल ही में सीता सोरेन ने शिबू सोरेन को पत्र लिखकर जेएमएम का साथ छोड दिया था और बीजेपी का दामन थाम लिया था. सीता सोरेन ने आरोप लगाए थे कि जबसे उनके पति दुर्गा सोरेन का निधन हुआ, उनकी और उनकी परिवार की उपेक्षा पार्टी और सोरेन परिवार ने की है. इसलिए मजबूरी में वो जेएमएम एवं सोरेन परिवार से नाता तोड़ रही हैं.
क्या देवर-भाभी के बीच होगा दुमका चुनाव
सोरेन परिवार में सेंधमारी के बाद से ही ये कयास लग रहे थे की बीजेपी संथाल परगना में अपना रास्ता बनाने के लिए सीता सोरेन के चेहरे का सहारा लेगी और ऐसा ही हुआ. सुनील सोरेन के नाम की घोषणा के बाद भी सीता सोरेन को दुमका से बीजेपी ने प्रत्याशी बना दिया. जाहिर है कि अब अगर हेमंत सोरेन जेल के अंदर से चुनाव लड़ते हैं तो दुमका में लड़ाई देवर-भाभी के बीच हो जाएगी. सीता सोरेन के सहारे बीजेपी उस सहानभूति की लहर को न्यूट्रलाइज कर देने की मंशा में है, जिसको जेएमएम भुनाना चाहती थी.
असमंजस में फंस सकते हैं वोटर्स
वैसे भी बीजेपी को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी, जिसके सहारे वो ट्राइबल के बीच अपनी पैठ बना सके. यहां ये बताना जरूरी है कि 2019 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी राज्य की 28 ट्राइबल सीट में से 26 सीट हार गई थी. सोरेन परिवार की बड़ी बहू ही जब मोर्चा सभालेंगी तो वोटर भी असमंजस में होगा.
1. गोड्डा लोकसभा में निशिकांत दुबे ने जिस तरह अपने लोकसभा क्षेत्र का विकास किया, उसकी तुलना में सुनील सोरेन के नाम कोई उपलब्धि नहीं है. गोड्डा लोकसभा क्षेत्र में देवघर में एम्स और हवाई अड्डा, गोड्डा में अडानी पावर, देवघर से गोड्डा रेलवे लाइन प्लांट समेत कई महत्वपूर्ण नेशनल हाईवे समेत गोड्डा से देश की राजधानी दिल्ली और व्यावसायिक नगरी मुंबई के लिए डायरेक्ट ट्रेन की सुविधा उपलब्ध कराई. लेकिन इसकी तुलना में दुमका लोकसभा में सुनील सोरेन ने ऐसा कोई भी विकास के कार्य नहीं किया. उन्होंने बस कुछ एक्सप्रेस ट्रेनों का ठहराव कुछ एक स्टेशनों पर करवाया. लिहाजा जनता इन कारणों से भी सुनील सोरेन से नाराज थी.
2. सांसद सुनील सोरेन का यहां की जनता के साथ जुड़ाव भी काफी कम था. वे कभी भी क्षेत्र में दिखाई नहीं दिए.
3. सुनील सोरेन को दुमका लोकसभा क्षेत्र से टिकट दिए जाने से सोशल मीडिया पर लगातार यहां की जनता की प्रतिक्रिया आ रही थी कि सुनील सोरेन को वोट देने की इच्छा नहीं है. लेकिन पीएम मोदी को जिताने के लिए सुनील सोरेन को वोट देना होगा.
4. कहा जा रहा है कि सांसद सुनील सोरेन का कुछ चुनिंदा लोगों से घिरा रहना भी उनकी लोकप्रियता को गर्त में ले गया.
5. दुमका लोकसभा की जनता को लगता था कि सांसद सुनील सोरेन अपने कार्यों की वजह से नहीं बल्कि पीएम मोदी की लोकप्रियता की वजह से चुनाव जीते हैं.
6. संसद में सुनील सोरेन ने कभी इस क्षेत्र का मुद्दा नहीं उठाया.
7. दुमका में हाई कोर्ट बनने का मुद्दा वर्षों पुराना है, लेकिन सांसद सुनील सोरेन ने इस पर कभी भी पहल नहीं की. यहां के लोगों को लगता है कि दुमका में बनने वाला एम्स जिस तरह से तेज तर्रार सांसद निशिकांत दुबे के कारण देवघर चला गया, उसी तरह हाई कोर्ट भी सांसद निशिकांत दुबे अपने क्षेत्र में बनवा लेंगे.
8. दुमका की भाजपा दो गुटों में बंटी है. एक सांसद सुनील सोरेन के खेमे में है तो दूसरा गुट भाजपा की पूर्व मंत्री लुईस मरांडी के खेमे में.
9. 2019 में बेशक उन्होंने शिबू सोरेन जैसे दुरंधर को हराया था फिर भी अपनी पहचान बनाने में दुमका में वो विफल रहे. ठीक लोकसभा के बाद विधानसभा के चुनाव में बीजेपी 2019 में ही बुरी तरह से उस क्षेत्र में हार गई थी.