
लंबे इंतजार के बाद आखिरकार शुक्रवार को बिहार के लिए महागठबंधन के दलों में सीट बंटवारे का आधिकारिक ऐलान हो गया. काफी जद्दोजहद के बाद कांग्रेस ने आरजेडी से गठबंधन में 9 लोकसभा सीटें हासिल कर लीं, लेकिन उसके दावे वाली ज्यादातर सीटों को आरजेडी ने या तो अपने पाले में रख लिया या फिर उसे लेफ्ट के खेमे में दे दिया.
महागठबंधन में सीट बंटवारे के ऐलान के बाद सबसे ज्यादा चर्चा हाल ही में अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय करने वाले पप्पू यादव और सीपीआई छोड़कर कांग्रेस का हाथ पकड़ने वाले कन्हैया कुमार की हो रही है. दरअसल पप्पू यादव और कन्हैया कुमार बिहार में अलग-अलग लोकसभा सीटों से कांग्रेस के दावेदार माने जा रहे थे. लेकिन सीट शेयरिंग में लालू ने कुछ ऐसी कैंची चलाई की पप्पू और कन्हैया दोनों किनारे लग गए.
मुकाबले से बाहर कन्हैया
कांग्रेस ने सीट बंटवारे में बेगूसराय सीट कन्हैया कुमार के लिए मांगी थी, जबकि पूर्णिया लोकसभा सीट पर पप्पू यादव अंतिम दौर तक दावा करते रहे. लेकिन राजद ने इन दोनों सीटों पर कांग्रेस की दाल नहीं गलने दी. बेगूसराय सीट आरजेडी ने सहयोगी लेफ्ट को दे डाली तो वहीं पूर्णिया सीट अपनी पार्टी की उम्मीदवार बीमा भारती के लिए रख ली.
सीट बंटवारे का आधिकारिक ऐलान होते ही तमाम कयासों और दावों पर विराम लग चुका है. पप्पू यादव कसम खाए बैठे हैं कि वह पूर्णिया से ही चुनाव लड़ेंगे लेकिन सबसे बड़ा सवाल कन्हैया कुमार के राजनीतिक भविष्य पर है. कन्हैया 2019 के लोकसभा चुनाव में बेगूसराय से मैदान में उतरे थे, उनका मुकाबला बीजेपी के दिग्गज नेता गिरिराज सिंह से था. कन्हैया कुमार और गिरिराज सिंह के मुकाबले की खूब चर्चा हुई थी.
2019 के चुनाव में बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से सबसे हाई प्रोफाइल सीट बेगूसराय रही. लेकिन कन्हैया को जीत हासिल नहीं हुई. गिरिराज सिंह ने उन्हें बड़े अंतर से हराया था. पिछले चुनाव में कन्हैया बेगूसराय से सीपीआई के उम्मीदवार थे. जेएनयू से राजनीति में सक्रिय होने वाले कन्हैया की पहचान एक वाकपटु युवा लेफ्ट नेता की थी.
जेएनयू प्रकरण के बाद देश भर के विपक्षी नेताओं ने कन्हैया कुमार को हाथों हाथ लिया था. कन्हैया जब बेगूसराय पहुंचे तब यह उम्मीद जताई गई थी कि आरजेडी इस सीट पर शायद कन्हैया के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं दे. लेकिन उस वक्त भी लालू यादव ने अपनी पार्टी के तनवीर हसन को मैदान में उतार दिया था.
गिरिराज सिंह ने 2019 में कन्हैया कुमार को बड़े अंतर से हराया था. गिरिराज को 6 लाख 92 हजार वोट हासिल हुए थे, जबकि कन्हैया कुमार 2 लाख 69 हजार वोट ही जुटा सके थे. आरजेडी के उम्मीदवार तनवीर हसन को 1 लाख 98 हजार वोट हासिल हुए थे. चुनाव के दौरान इस बात की चर्चा होती रही कि आरजेडी उम्मीदवार की वजह से कन्हैया को नुकसान पहुंच सकता है. लेकिन गिरिराज सिंह ने इतने बड़े अंतर से जीत हासिल की कि आरजेडी के उम्मीदवार को कन्हैया के हार की वजह मानना भी संभव नहीं रहा.
चुनाव नतीजे बता रहे थे कि अगर तनवीर हसन के वोट को भी कन्हैया को मिले वोट में जोड़ दिया जाए तब भी वह गिरिराज सिंह को मिले वोटो से काफी पीछे रह जाते.
हार के बाद कन्हैया ने बिहार छोड़ा
2019 के लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद कन्हैया ने ना केवल बेगूसराय छोड़ बल्कि उन्होंने बिहार से भी दूरी बना ली. आगे चलकर कन्हैया ने सीपीआई छोड़कर कांग्रेस का हाथ पकड़ लिया. इसके बाद कन्हैया को लेकर लगातार यह चर्चा होती रही की कांग्रेस नेतृत्व उन्हें राज्यसभा भेज सकता है या फिर कोई बड़ी जिम्मेदारी दे सकता है.
कन्हैया राहुल गांधी के साथ भारत जोड़ो यात्रा में भी लगातार कम से कदम मिलाकर चलते रहे लेकिन उन्हें पार्टी में कोई बड़ी भूमिका नहीं दी गई. कांग्रेस की यूथ रिंग की जिम्मेदारी भले ही कन्हैया सांगठनिक रूप से निभा रहे हैं. इस साल जब लोकसभा चुनाव की आहट शुरू हुई तब यह चर्चा एक बार फिर से जोर पकड़ने लगी की कन्हैया कुमार बेगूसराय से कांग्रेस के उम्मीदवार हो सकते हैं. एक बार फिर 2019 वाला मुकाबला बेगूसराय में देखने को मिल सकता है.
कन्हैया के चाहने वालों के बीच उम्मीद जगी की इस बार लेफ़्ट भी महागठबंधन में शामिल है और आरजेडी भी उसका हिस्सा है इसलिए महागठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर कन्हैया बेगूसराय में गिरिराज सिंह को कड़ी टक्कर देंगे. सीट बंटवारे को लेकर जब पहली बातचीत शुरू हुई तब कांग्रेस ने अपने दावे वाली 14 सीटों की लिस्ट में बेगूसराय का नाम सबसे ऊपर रखा था लेकिन शुक्रवार को जब आधिकारिक ऐलान हुआ तब बेगूसराय की सीट की सीपीआई पास चली गई.
हालांकि सीपीआई ने हफ्ते भर पहले ही इस सीट से अवधेश राय को अपना उम्मीदवार बनाने की घोषणा कर दी थी. इसके बाद ही यह माना जा रहा था कि कन्हैया कुमार के लिए बेगूसराय का दरवाजा बंद हो गया है. कांग्रेस लगातार आरजेडी से बात करती रही लेकिन बेगूसराय पर बात नहीं बन पाई. बेगूसराय के बीहट से आने वाले कन्हैया के लिए अब बिहार में 2024 से का दरवाजा बंद हो चुका है.
अब चर्चा यह है कि कन्हैया कुमार उस उत्तर-पूर्वी दिल्ली की सीट से मैदान में उतर सकते हैं, जहां बीजेपी ने मनोज तिवारी को उम्मीदवार बनाया है. इस सीट पर पूर्वांचल से आने वाले मतदाताओं की अच्छी खासी तादाद है इसलिए एक कन्हैया के नाम की यहां चर्चा हो रही है. हालांकि यहां भी कन्हैया के लिए राह आसान नहीं है इस सीट पर कांग्रेस से कई दूसरे दावेदारों की भी चर्चा है जिनमें नेहा सिंह राठौड़ का नाम भी बताया जा रहा है.
बेगूसराय का चुनावी गणित
कन्हैया कुमार के लिए कांग्रेस से भले ही बेगूसराय सीट पर दावेदारी कर रही थी लेकिन जानकार बताते हैं कि यह दावा बहुत मजबूत भी नहीं था. बेगूसराय में सामाजिक और वोटो के समीकरण के लिहाज से कांग्रेस के स्थानीय नेता और आरजेडी यह समझ रही थी कि कन्हैया कुमार के लिए बेगूसराय का रास्ता आसान नहीं होगा. शायद यही वजह रही की बेगूसराय सीट सीपीआई पाले में दी गई. सीपीआई ने बेगूसराय में पूर्व विधायक अवधेश राय उम्मीदवार बनाया है.
अवधेश राय यादव जाति से आते हैं, लेफ्ट का बेगूसराय में अच्छा खासा काडर भी है जबकि कन्हैया कुमार भूमिहार जाति से आते हैं और बीजेपी के उम्मीदवार गिरिराज सिंह भी भूमिहार जाति से आते हैं. कन्हैया कुमार को उम्मीदवार बनाए जाने के बावजूद कांग्रेस और महागठबंधन के सामने यह चुनौती बनी रहती कि उनके अपने स्वजातीय वोटरों का समर्थन बेगूसराय में कन्हैया को कितना मिल पाता है.
पिछले चुनाव में कन्हैया अपने स्वजातीय वोटरों के बीच भी दमखम नहीं दिखा पाए थे और लेफ्ट काडर की वजह से ही कन्हैया दूसरे नंबर पर रह पाए थे. बेगूसराय लोकसभा सीट शुरुआती दौर में कांग्रेस के लिए मजबूत किला रही है. कभी कांग्रेस के मथुरा प्रसाद मिश्रा बाद में श्याम नंदन मिश्रा और फिर कृष्णा शाही जैसी दिग्गज इस सीट से चुनाव जीतकर संसद में जाती रहीं.
1967 के चुनाव में यहां पहली बार गैर कांग्रेसी उम्मीदवार के तौर पर सीपीआई के योगेंद्र शर्मा ने जीत हासिल की. इसके बाद जनता दल से ललित विजय सिंह 1989 में चुनाव जीते और फिर एक दफे आरजेडी का भी इस सीट पर कब्जा जा रहा. 1998 में राजो सिंह ने यहां आखिरी बार कांग्रेस के लिए जीत का परचम लहराया.
2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में यहां जनता दल यूनाइटेड की जीत हुई और 2014 के बाद बीजेपी लगातार यहां जीत हासिल करती रही है. 2014 में बेगूसराय से बीजेपी के उम्मीदवार भोला सिंह चुनाव जीते थे. 2019 में गिरिराज सिंह ने जीत हासिल की और एक बार फिर गिरिराज सिंह चुनाव मैदान में हैं. बेगूसराय में कुल 7 विधानसभा सीटें हैं.
सात विधानसभा सीटों में से चार पर इस वक्त महागठबंधन का कब्जा है. इसमें तेघड़ा और बखरी में सीपीआई के विधायक हैं जबकि चेरिया बरियारपुर और साहेबपुर कमाल में आरजेडी के विधायक हैं. बेगूसराय और बछवाड़ा में बीजेपी के विधायक हैं जबकि मटिहानी में जेडीयू के विधायक हैं. विधानसभा सीटों पर कब्जे के मामले में टक्कर लगभग बराबरी की है लेकिन एनडीए से एक ज्यादा सीट पर महागठबंधन का कब्जा है. बेगूसराय में लगभग साढ़े 19 लाख वोटर हैं, जिसमें महिला मतदाताओं की संख्या ज्यादा है. यहां लगभग 10 लाख 43 हजार महिला वोटर और 9 लाख 14 हजार पुरुष वोटर्स हैं.
बेगूसराय का इतिहास बताता है कि यहां वोटर्स घर से निकलकर अच्छी खासी तादाद में मतदान करते हैं. 2019 में यहां 62 फ़ीसदी से ज्यादा वोटिंग रिकॉर्ड की गई थी. बेगूसराय मैं जातीय समीकरण की बात करें तो यहां सबसे अधिक तादाद में भूमिहार जाति के वोटर्स हैं, यहां तकरीबन 4 लाख 75 हजार भूमिहार मतदाता हैं जो चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. यहां कुशवाहा और कुर्मी मतदाताओं की संख्या भी 2 लाख से ज्यादा है जबकि यादव जाति के लगभग डेढ़ लाख मतदाता हैं. इसके अलावा ब्राह्मण और राजपूत जाति के भी मतदाताओं की अच्छी खासी तादाद है.
बेगूसराय में अति पिछड़ा वोटर्स की भी संख्या अहम भूमिका निभाती है. इतना ही नहीं मुस्लिम मतदाताओं की तादाद भी ढाई लाख के करीब है. मतदाताओं में जातीय समीकरण के लिहाज से एनडीए के लिए यह सीट सेफ मानी जाती है. सवर्ण और लव-कुश के साथ-साथ अति पिछड़ा वोट बैंक को अगर जोड़ दिया जाए तो यह संख्या जीत के लिए बहुत बड़ी हो जाती है जबकि महागठबंधन खेमे के मुस्लिम और यादव जाति के वोटर के अलावे अन्य पिछड़ी जातियों और लेफ्ट के काडर को जोड़कर यह संख्या एनडीए के वोट बैंक के आसपास नहीं पहुंच पाती. नीतीश कुमार जब बीजेपी के साथ रहते हैं तब यह सीट एनडीए के लिए सेफ सीट बन जाती है.
लालू ने किया कन्हैया के साथ खेल?
कांग्रेस के पहले में बेगूसराय सीट भले ही जिस कारण से भी नहीं गई हो लेकिन कन्हैया कुमार का पत्ता साफ होने के बाद बिहार के सियासी गलियारे में एक चर्चा बड़ी तेजी से हो रही है. सियासी चर्चा है कि लालू यादव ने पप्पू यादव के साथ-साथ कन्हैया कुमार के साथ भी खेला कर दिया.
पप्पू यादव ने आरजेडी से बागी होने के बाद लालू यादव और उनके दोनों बेटों को खुले मंच से खूब कोसा था लिहाजा उनके दावे वाली पूर्णिया सीट को लालू ने कांग्रेस के लिए नहीं छोड़ा और कन्हैया कुमार के मामले में यह कहा जा रहा है कि उनके राजनीतिक तेवर को देखते हुए लालू कन्हैया को बिहार में स्थापित नहीं होने देना चाहते.
जानकार बताते हैं कि तेजस्वी यादव के कद को चुनौती देने लायक किसी भी चेहरे को लालू बिहार में अपनी संजीवनी नहीं देंगे. यही वजह है कि लालू यादव ने कन्हैया कुमार के दावे वाली सीट पर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. सियासी जानकार तो यहां तक बता रहे हैं कि सीपीआई को बेगूसराय सीट महागठबंधन में लेने के लिए कोई बहुत मेहनत भी नहीं करनी पड़ी, लालू बेगूसराय पर फौरन तैयार हो गए.
जेएनयू प्रकरण के बाद कन्हैया कुमार जब जेल से रिहा हुए थे उसके बाद बिहार पहुंचकर उन्होंने लालू यादव से मुलाकात की थी. तब बिहार के में महागठबंधन में नीतीश लालू के साथ थे. उस दौर में कन्हैया को लेकर लालू यादव ने बड़ी गर्मजोशी से दिखाई थी. लेकिन मौजूदा हकीकत यह है कि अब लाल कन्हैया को लेकर पहले जैसी गर्मजोशी नहीं दिखाते हैं.
2019 लोकसभा चुनाव में कन्हैया के सामने उन्होंने आरजेडी का उम्मीदवार उतारा था और अब बेगूसराय से कन्हैया को चलता करने में लालू ने एक बार फिर बड़ी भूमिका निभाई है. मैसेज सीधा है.. तेजस्वी ही बिहार में विपक्षी कुनबे के नेतृत्व का विकल्प हो सकते हैं और तेजस्वी के सामने लालू किसी और को महागठबंधन में उभरने नहीं देंगे. अब देखना होगा कांग्रेस नेतृत्व कन्हैया को क्या वाकई कहीं और से एडजस्ट कर उनका कद बढ़ाता है या फिर लालू की सियासी कैंची चलने के बाद कन्हैया के भविष्य पर यूं ही ग्रहण लगा रहेगा?