Advertisement

कर्नाटक के इन 14 सीटों पर लिंगायत जनाधार का प्रभाव, 7 मई को होने वाले मतदान में भाजपा, कांग्रेस किसका पलड़ा भारी

कर्नाटक में जिन सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उनमें लिंगायत, अन्य पिछड़ी जातियां (ओबीसी), दलित और आदिवासी मतदाताओं की अच्छी-खासी मौजूदगी है. उत्तरी कर्नाटक में लिंगायतों की महत्वपूर्ण राजनीतिक उपस्थिति है.

प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 05 मई 2024,
  • अपडेटेड 6:13 PM IST

लोकसभा चुनाव में कर्नाटक की बची 14 सीटों पर 7 मई को मतदान होगा. ये सीटें अधिकतर उत्तरी और मध्य कर्नाटक में हैं. पिछली बार (2019) भाजपा ने सभी 14 सीटें जीती थीं. 2014 में भाजपा ने 10 सीटें जीती थीं और कांग्रेस को 4 सीट मिली थी. इस बार कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा टकराव है. जेडीएस इस क्षेत्र में (भाजपा के साथ गठबंधन के हिस्से के रूप में) किसी भी सीट पर चुनाव नहीं लड़ रही है.

Advertisement

कर्नाटक में तीन अलग-अलग क्षेत्र हैं जहां 7 मई को मतदान होने जा रहा है. कित्तूर कर्नाटक क्षेत्र (इसे पहले मुंबई-कर्नाटक क्षेत्र कहा जाता था) करीब तीन दशकों से भाजपा का गढ़ रहा है. कल्याण-कर्नाटक क्षेत्र (जिसे पहले हैदराबाद कर्नाटक कहा जाता था) राज्य के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है और यहां कांग्रेस और भाजपा के बीच लड़ाई देखी गई है, जिसमें जेडीएस को समर्थन मिले हैं. तीसरा क्षेत्र मध्य कर्नाटक क्षेत्र है जहां दो दशकों में भाजपा की बढ़ती उपस्थिति देखी गई है. परंपरागत रूप से यह क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ रहा है.

कुछ सांसदों को दोबारा टिकट
बीजेपी ने इन 14 सीटों पर अपने आधे मौजूदा सांसदों को बदल दिया है और बाकी आधे को उम्मीदवार बनाया है. कुछ मौजूदा सांसदों को दोबारा टिकट दिए जाने से बीजेपी में नाराजगी है. इसी तरह कम से कम दो सीटों (कोप्पल और उत्तर कन्नड़) पर मौजूदा सांसदों ने अपनी आपत्ति व्यक्त की है. कांग्रेस के मामले में चौदह में से पांच उम्मीदवार राज्य सरकार के मंत्रियों के बेटे/बेटियां हैं. अन्य तीन वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के रिश्तेदार हैं और एक रिटायर आईएएस अधिकारी हैं. सरकार के किसी भी वरिष्ठ मंत्री ने खुद को उम्मीदवार के रूप में पेश नहीं किया. एक उम्मीदवार को छोड़कर, कांग्रेस के किसी भी उम्मीदवार ने 2019 का चुनाव नहीं लड़ा. यह भाजपा और कांग्रेस उम्मीदवारों की अलग-अलग ताकतों का कारण है.

Advertisement

डेमोग्राफिक प्रभाव
कर्नाटक में जिन सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उनमें लिंगायत, अन्य पिछड़ी जातियां (ओबीसी), दलित और आदिवासी मतदाताओं की अच्छी-खासी मौजूदगी है. उत्तरी कर्नाटक में लिंगायतों की महत्वपूर्ण राजनीतिक उपस्थिति है. लोकनीति-सीएसडीएस सर्वेक्षणों के आंकड़ों से पता चलता है कि, 2014 के लोकसभा चुनावों (विधानसभा चुनावों सहित) के बाद से, 2023 के विधानसभा चुनावों को छोड़कर, भाजपा ने 60 प्रतिशत से अधिक लिंगायत वोट हासिल किए हैं. उस चुनाव में लिंगायत वोटों में भाजपा की हिस्सेदारी घटकर 56 प्रतिशत रह गई. इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में उसे करीब 87 फीसदी लिंगायत वोट मिले थे.

लिंगायत वोट कांग्रेस को भी मिल रहे हैं
दूसरी ओर कांग्रेस 2014 के बाद से सभी चुनावों में लिंगायत वोटों का लगभग एक चौथाई हिस्सा हासिल कर रही है. 2019 में लिंगायतों के बीच कांग्रेस का वोट शेयर घटकर सिर्फ 10 फीसदी रह गया. ऐसे में वोट किस तरह से स्विंग करेगा यह महत्वपूर्ण है. निर्णय लेने वाले महत्वपूर्ण पद पर येदियुरप्पा की वापसी, उनके बेटे को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने और लिंगायत समुदाय के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों (बोम्मई और शेट्टार) के इस क्षेत्र से चुनाव लड़ने के साथ, भाजपा लिंगायत वोटों के एकीकरण की उम्मीद कर रही होगी.

भाजपा का 14 सीटों पर बेहतर प्रदर्शन
इन 14 सीटों पर गैर-प्रमुख ओबीसी वोटों की मजबूत उपस्थिति को देखते हुए, कांग्रेस और भाजपा दोनों इस वोट को जीतने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं. 2014 के बाद से भाजपा ने इन मतदाताओं के बीच कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन किया है (लोकनीति सीएसडीएस सर्वेक्षण के अनुसार). कांग्रेस ने 2023 के विधानसभा चुनावों में इस अंतर को कम करके एक प्रतिशत कर दिया था. इस बार यह वोट प्रमुख सीटों पर स्विंग फैक्टर हो सकता है. 2014 से इस क्षेत्र में दलित वोट मजबूती से कांग्रेस के साथ है. यहां तक कि जब 2019 में भाजपा ने इस क्षेत्र की सभी सीटों पर कब्जा कर लिया, तब भी दलित मतदाताओं के बीच कांग्रेस को छह प्रतिशत अंक का फायदा हुआ था.

इनपुट- संदीप शास्त्री

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement