
पॉपुलैरिटी (लोकप्रियता) और पोल मैनेजमेंट (चुनाव प्रबंधन) राजनीति के खेल में ऐसे 2 हथियार हैं, जो आपका खेल बुरी से बुरी परिस्थिति में भी बना सकते हैं. अगर किसी को लगने लगे कि इस गेम में वो लगातार पिछड़ रहा है, तो इन 2 काबिलियत के भरोसे किसी विरोधी का खेल बिगाड़ा भी जा सकता है. बिहार की राजनीति में राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव के चारों ओर जो घट रहा है, वह सूबे की राजनीति और खासकर पूर्णिया के लिए काफी अहम है. आगामी लोकसभा चुनाव में पूर्णिया सीट पर जीत या हार, पप्पू यादव का मौजूदा राजनीतिक कद न सिर्फ इस सीट पर बल्कि आसपास के इलाकों में भी निर्धारित करेगी. वहीं, आरजेडी और पप्पू यादव के लिए नाक का सवाल बन चुकी पूर्णिया सीट का परिणाम लालू यादव की 2 बेटियों मीसा और रोहिणी की सीट (क्रमशः पाटलिपुत्र और सारण) के मुकाबले क्या आता है, ये बिहार में आगे की राजनीति की दिशा तय करने में बाकी दलों की मदद कर सकता है.
लालू की विरासत पर छिड़ जाएगी नई बहस
2025 में बिहार में विधानसभा चुनाव होना है. इससे पहले लोकसभा चुनाव 2024 का रण है. जिसमें RJD सुप्रीमो लालू यादव ने अपनी दो बेटियों को चुनावी मैदान में उतार दिया है. सारण सीट से जहां लालू की बेटी रोहिणी आचार्य का नाम फाइनल हो चुका है. वहीं, पाटलिपुत्र सीट से मीसा भारती को टिकट देने की चर्चा है. ये दोनों सीटें आरजेडी बीते दो लोकसभा चुनाव (2014 और 2019) में नहीं जीत सकी थी. ऐसे में इन दोनों सीटों पर 2024 का परिणाम भी अगर बीते 2 लोकसभा चुनावों की तर्ज पर रहा और पप्पू यादव अपनी सीट निकालने में कामयाब रहे, तो सूबे में एक नई राजनीतिक बहस छिड़ना तय है. ये बहस बिहार की राजनीति में लालू की राजनीतिक विरासत के एक्सेप्टेंस के आसपास घूमेगी. इस पर विपक्ष का परिवारवाद वाला तड़का बिहार विधानसभा चुनाव में इस बहस में और भी स्वाद भर सकता है.
RJD के लिए कम नहीं है चुनौतियां
2004 के लोकसभा चुनाव में RJD ने अपना सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया था. इस चुनाव में RJD ने राज्य में कुल 22 लोकसभा की सीटें जीती थीं. इसके बाद से लोकसभा चुनावों में RJD का प्रदर्शन राज्य में लगातार गिरा है. 2009 के आम चुनाव में राजद 22 सीटों से गिरकर 4 पर सिमट गई थी. वहीं, 2014 के आम चुनाव में भी पार्टी के हाथ महज 4 सीटें ही आई थीं. 2019 आते-आते लोकसभा से पार्टी गायब ही हो गई. 2019 की मोदी लहर में RJD एक भी सीट नहीं जीत सकी थी.
खोई विरासत हासिल करने का दबाव
बिहार में महागठबंधन की गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर बैठे लालू यादव पर गठबंधन को 2024 के आम चुनाव में न सिर्फ अधिक से अधिक सीटें जितवाने का दबाव है. बल्कि अपने दोनों बेटों तेजस्वी और तेजप्रताप के बाद दो बेटियों, रोहिणी आचार्य और मीसा भारती को चुनाव जिताकर लोकसभा भेजने का भी प्रेशर रहेगा. खासकर तब, जब सारण सीट RJD के लिए एक तरह से राजनीतिक विरासत के तौर पर देखी जाती रही हो.
सारण सीट (पहले छपरा) से लालू यादव खुद 4 बार सांसद रह चुके हैं. वह पहली बार 1977 में इसी सीट से जीतकर संसद पहुंचे थे. 2009 में लालू यादव आखिरी बार इसी सीट से जीतकर संसद पहुंचे थे. इसके बाद 2014 में लालू यादव की पत्नी राबड़ी देवी ने सारण सीट से चुनाव लड़ा और हार गईं. फिर 2019 में लालू यादव के समधि चंद्रिकाराय को पार्टी ने इस सीट से मैदान में उतारा, वो भी पार्टी को अपनी खोई सीट जिताने में कामयाब नहीं हो सके थे. पाटलिपुत्र की बात करें तो मीसा भारती इस सीट से 2 बार अपनी किस्मत आजमा चुकीं हैं. उन्हें दोनों बार 2014 और 2019 में हार का सामना करना पड़ा था.
पूर्णिया में पप्पू की पॉपुलैरिटी
इसमें कोई दो राय नहीं है कि पप्पू यादव बिहार के पूर्णिया (सीमांचल का क्षेत्र) और कोसी क्षेत्र (सुपौल, सहरसा, मधेपुरा) में काफी पॉपुलर हैं. इलाके में उनकी छवि एक जमीन से जुड़े नेता की है और इन सीटों से उनका चुनावी प्रदर्शन इस बात की गवाही भी देता है. पप्पू यादव पूर्णिया से तीन बार सांसद रह चुके हैं. 1991 और 1999 में वो इस सीट से निर्दलीय जीतकर आए तो वहीं 1996 में पप्पू यादव पूर्णिया से समाजवादी पार्टी (लगभग निर्दलीय ही कहा जा सकता है ) की टिकट पर सांसदी जीते थे.
इसके अलावा मधेपुरा सीट से वह 2004 और 2014 में जीतकर संसद पहुंचे थे. मधेपुरा सीट से दोनों बार उन्होंने राजद की टिकट पर चुनाव जीता था. इसके अलावा पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन 2004 में लोक जनशक्ति पार्टी की टिकट पर सहरसा सीट से जीतकर संसद पहुंची थी. 2009 में रंजीत रंजन ने कांग्रेस की टिकट पर सुपौल से लोकसभा का चुनाव लड़ा और हार गईं. 2014 में उन्हें पार्टी ने फिर सुपौल से चुनावी मैदान में उतारा और उन्होंने पार्टी के भरोसे को कायम रखते हुए कांग्रेस की झोली में ये सीट डाल दी थी. रंजीत रंजन फिलहाल कांग्रेस से राज्यसभा की सदस्य हैं.
मधेपुरा छोड़कर घर वापसी की तैयारी
2 बार मधेपुरा से सांसद रह चुके पप्पू यादव इस बार पूर्णिया सीट को लेकर अड़ गए हैं. बगावती तेवर और गठबंधन धर्म को तोड़ते हुए उन्होंने गुरुवार (4 अप्रैल ) को इस सीट से पर्चा भर दिया. 2019 में पप्पू यादव को इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा था. अगर जातीय समीकरण के हिसाब से भी देखें तो पूर्णिया सीट पप्पू यादव के लिए ज्यादा मुफीद नजर आती है. मधेपुरा लोकसभा सीट पर करीब 22 फीसदी यादव वोटर हैं, करीब 13 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं. इस सीट पर 35% मुस्लिम-यादव वोटरों की तुलना में पूर्णिया सीट पर ये आकड़ा करीब 50 फीसदी के आसपास पहुंच जाता है. पूर्णिया में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 40 फीसदी है, तो यादव वोटर की तादाद करीब 8 से 10 फीसदी है. इस लिहाज से पप्पू यादव को मधेपुरा के मुकाबले पूर्णिया सीट अधिक सुरक्षित नजर आती है. इसके अलावा पप्पू यादव पूर्णिया से तीन बार सांसद भी रह चुके हैं. तीनों बार उन्होंने यह सीट अपने दम पर जीता था. जबकि मधेपुरा सीट पर जीत उन्हें राजद के टिकट पर मिली थी. यही करण है कि पप्पू यादव पूर्णिया सीट के लिए 'दुनिया छोड़' देने की बात कह चुके हैं.
पहली बार नहीं हुए हैं बागी
बगावत से पप्पू यादव का पुराना नाता है. पहली बार पप्पू यादव के विधायक बनने की कहानी भी बगावत से ही जुड़ी है. दरअसल, पप्पू यादव 1990 में पहली बार विधायक बने थे. उस साल वो मधेपुरा की सिंघेश्वर विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनकर आए थे. तह उन्हें जनता दल से टिकट नहीं मिला था. इसके बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा था. चुनाव जीतने के बाद वो लालू यादव के साथ जुड़ गए थे. फिलहाल पप्पू यादव ने पूर्णिया से नामांकन भर दिया है. चुनाव में जीत और हार का फैसला तो जनता करेगी. लेकिन इतना तय है कि पूर्णिया का परिणाम और इसके मुकाबले सारण और पाटलिपुत्र सीट का जनादेश सूबे की राजनीति की दिशा तय करने की ओर एक नई बहस को जन्म तो दे ही देगा. बता दें कि बिहार की पूर्णिया लोकसभा सीट पर दूसरे चरण यानी 26 अप्रैल को मतदान होना है, जबकि सभी सीटों के नतीजे 4 जून का आएंगे.