
लोकसभा चुनाव अब पांचवे चरण तक पहुंच गया है. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की अगुवाई वाला सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और विपक्षी इंडिया ब्लॉक, दोनों ही चुनावी बाजी जीतने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं. नजरें सबसे अधिक सीटों वाले उत्तर प्रदेश के साथ ही बिहार के नतीजों पर टिकी हैं. बिहार के बाहर भी दो राज्यों की दो सीटें ऐसी हैं, जहां मुकाबला बिहार के ही रहने वाले उम्मीदवारों के बीच है. एक है केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली की नॉर्थ ईस्ट दिल्ली सीट और दूसरी पश्चिम बंगाल की आसनसोल सीट.
नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में मनोज तिवारी बनाम कन्हैया कुमार
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की नॉर्थ ईस्ट दिल्ली सीट पर बीजेपी ने भोजपुरी सिने स्टार मनोज तिवारी को टिकट दिया है. मनोज तिवारी 2014 और 2019 के चुनाव में इस सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं. मनोज तिवारी इस बार नॉर्थ ईस्ट दिल्ली सीट से लगातार तीसरी जीत के लिए जोर लगा रहे हैं. वहीं, इंडिया ब्लॉक की ओर से कांग्रेस ने इस सीट से कन्हैया कुमार को उम्मीदवार बनाया है. बीजेपी और कांग्रेस, दोनों ही दलों के उम्मीदवार बिहार से संबंध रखते हैं. मनोज तिवारी कैमूर (भभुआ) जिले के रहने वाले हैं तो वहीं जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार बेगूसराय से आते हैं. प्रदेश एक है लेकिन दोनों उम्मीदवारों की बोली-भाषा में अंतर है. मनोज तिवारी जहां भोजपुरी भाषी हैं तो वहीं बेगूसराय में मगही और अंगिका बोली जाती है.
मनोज तिवारी और कन्हैया कुमार, दोनों ही नेताओं ने अलग-अलग राज्यों की सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने और हारने के बाद दिल्ली का रुख किया. मनोज तिवारी ने 2009 का लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की गोरखपुर सीट से बीजेपी के योगी आदित्यनाथ के खिलाफ लड़ा था. तब वह सपा के सिंबल पर मैदान में थे. बाद में मनोज तिवारी बीजेपी में शामिल हो गए और पार्टी ने 2014 में उन्हें नॉर्थ ईस्ट दिल्ली सीट से मैदान में उतार दिया जहां से जीतकर वह पहली बार संसद पहुंचे थे.
वहीं, कन्हैया कुमार की बात करें तो वह 2019 के चुनाव में बिहार की बेगूसराय सीट से मैदान में थे. लेफ्ट के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे कन्हैया को भी मनोज तिवारी की ही तरह अपने पहले चुनावी मुकाबले में शिकस्त का सामना करना पड़ा था. कांग्रेस में शामिल होने के बाद भी कन्हैया बेगूसराय सीट से ही टिकट की दावेदारी कर रहे थे. लेकिन इंडिया ब्लॉक की सीट शेयरिंग में यह सीट लेफ्ट के खाते में चली गई. इसके बाद कांग्रेस ने कन्हैया को नॉर्थ ईस्ट दिल्ली सीट से टिकट दिया. नॉर्थ ईस्ट दिल्ली लोकसभा क्षेत्र में यूपी, बिहार और हरियाणा के रहने वाले मतदाताओं की तादाद अच्छी खासी है और शायद यही वजह है कि एनडीए और इंडिया, दोनों ही गठबंधनों ने पूर्वांचली चेहरों पर दांव लगाया है.
आसनसोल में शत्रुघ्न सिन्हा बनाम एसएस अहलूवालिया
पश्चिम बंगाल की आसनसोल सीट से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा को चुनाव मैदान में उतारा है तो वहीं बीजेपी ने बर्धमान-दुर्गापुर से सांसद एसएस अहलूवालिया पर दांव लगाया है. बीजेपी ने पहले भोजपुरी फिल्म जगत के पावर स्टार पवन सिंह को उम्मीदवार बनाया था लेकिन पवन ने इस सीट से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया. पवन के इस ऐलान के बाद बीजेपी ने अहलूवालिया को टिकट दिया. शत्रुघ्न सिन्हा की ही तरह एसएस अहलूवालिया भी बिहार के ही रहने वाले हैं.
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खास बात यह भी है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा वर्षों तक जिस पटना साहिब सीट का संसद में प्रतिनिधित्व करते रहे हैं, अहलूवालिया उसी संसदीय सीट के मतदाता हैं. अहलूवालिया का जन्म आसनसोल में हुआ था लेकिन उनका स्थायी पता पटना में बोरिंग कैनाल रोड का है. अहलूवालिया का नाम बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में बतौर मतदाता दर्ज है जो पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र में आता है. कांग्रेस से सियासी सफर का आगाज करने वाले अहलूवालिया बिहार से दो बार राज्यसभा सांसद रहे हैं. 2014 में वह बीजेपी के टिकट पर दार्जिलिंग, 2019 में दुर्गापुर-बर्धमान सीट से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए थे.
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शत्रुघ्न सिन्हा 1996 और 2002 में बीजेपी से राज्यसभा सदस्य रहे. 2009 और 2014 में वह पटना साहिब सीट से लोकसभा चुनाव जीते थे. बाबुल सुप्रियो के इस्तीफे से रिक्त हुई आसनसोल सीट पर उपचुनाव में वह टीएमसी के टिकट पर निर्वाचित हुए थे. आसनसोल में बड़ी तादाद बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के मतदाताओं की है. इस लोकसभा क्षेत्र में करीब 45 फीसदी मतदाता हिंदी भाषी हैं. अनुमानों के मुताबिक सिख मतदाताओं की तादाद भी इस लोकसभा क्षेत्र में करीब 10 फीसदी है.
बिहार से भी जीतते रहे हैं दूसरे राज्यों से आए नेता
बिहार से नाता रखने वाले नेता पहले भी दूसरे राज्यों की सीट से लोकसभा पहुंचते रहे हैं लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सूबे की जनता ने दूसरे राज्यों से आकर चुनाव लड़ने वाले नेताओं को कभी नहीं जिताया. आचार्य जेबी कृपलानी, मधु लिमये, चंद्रशेखर से लेकर जार्ज फर्नांडिस और शरद यादव तक, बिहार की लोकसभा सीट से किस्मत आजमाने वाले नेताओं की भी लंबी लिस्ट है जिन्हें जनता ने संसद में अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना. आचार्य कृपलानी का जन्म आजादी के पहले 1888 में सिंध प्रांत के हैदराबाद में हुआ था. वह मुजफ्फरपुर के एलएस कॉलेज के इतिहास विभाग में प्राध्यापक थे.
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आचार्य कृपलानी 1952 में भागलपुर सीट से उपचुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर संसद पहुंचे थे. मधु लिमये ने भी चुनावी राजनीति के लिए बिहार को चुना. लिमये 1964 में मुंगेर सीट से उपचुनाव में निर्वाचित हुए थे और 1967 में भी इसी सीट से सांसद रहे. मधु लिमये ने दो बार बांका सीट का संसद में प्रतिनिधित्व किया. वह मूल रूप से पुणे, महाराष्ट्र के रहने वाले थे. कर्नाटक के रहने वाले जॉर्ज फर्नांडिस 1977 में मुजफ्फरपुर सीट से निर्वाचित हुए थे. फर्नांडिस ने मुजफ्फरपुर और नालंदा से कुल मिलाकर सात बार सांसद रहे.
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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने 1989 में दो सीटों से चुनाव लड़ा था. वह अपनी गृह सीट उत्तर प्रदेश के बलिया से मैदान में थे ही, बिहार की महाराजगंज सीट से भी चुनाव मैदान में थे. वह दोनों ही सीट से चुनाव जीते. हालांकि, चंद्रशेखर ने महाराजगंज सीट छोड़ दी थी. इसी तरह वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर 1989 में बिहार की किशनगंज सीट से संसद पहुंचे थे. अकबर पश्चिम बंगाल से आते हैं. बिहार की सत्ताधारी जेडीयू के अध्यक्ष रह चुके शरद यादव की चुनावी राजनीति का केंद्र भी बिहार था. मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में जन्मे शरद यादव बिहार की मधेपुरा सीट से 1991 में पहली बार संसद पहुंचे थे. वह मधेपुरा से पांच बार सांसद रहे.
(रिपोर्टः बिकास सिंह)