
उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर (Muzaffarnagar) की सियासी जंग में एक भयंकर रस्साकशी देखी जा रही है. इस राजनीतिक लड़ाई को जिसे दो सीनियर जाट नेताओं- बीजेपी के दो बार के सांसद संजीव बालियान और समाजवादी पार्टी के पूर्व राज्यसभा सांसद हरेंद्र मलिक के बीच सम्मान की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है. 2019 के चुनावों में, बालियान राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख चौधरी अजीत सिंह के खिलाफ 4,000 से कम वोटों के अंतर से विजयी हुए थे.
अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी के पार्टी की कमान संभालने के बाद वह 2022 के विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रहे. दिलचस्प बात यह है कि आरएलडी, जो 2019 के लोकसभा चुनाव में एसपी और बीएसपी के साथ और 2022 के विधानसभा चुनावों में एसपी के साथ गठबंधन में थी, इस बार बीजेपी के साथ गठबंधन किया है. सूत्रों के मुताबिक मुजफ्फरनगर सीट विवाद का मुद्दा था, जिसकी वजह से एसपी-आरएलडी गठबंधन आगे नहीं चल सका.
वोटिंग नजदीक आने के साथ बढ़ रही सियासी सरगर्मी
इंडिया टुडे की ग्राउंड रिपोर्ट में पता चलता है कि जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ रही है. 2022 का विधानसभा चुनाव मुख्य रूप से तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग के कारण किसानों के आंदोलन के इर्द-गिर्द घूमता रहा. भारी विरोध के बाद, मौजूदा केंद्र सरकार ने किसानों की मांगें मान लीं, जिससे माहौल एसपी-आरएलडी गठबंधन के पक्ष में हो गया. मुजफ्फरनगर लोकसभा क्षेत्र में एसपी-आरएलडी गठबंधन तीन सीटें हासिल करने में कामयाब रहा, जबकि बीजेपी ने दो सीटें जीतीं. इसके बाद खतौली उपचुनाव में बीजेपी, आरएलडी से एक और सीट हार गई, जिससे गठबंधन के पक्ष में 4-1 की बढ़त हो गई.
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मुजफ्फरनगर में मुस्लिम मतदाताओं का एक अहम हिस्सा है, जो इस निर्वाचन क्षेत्र में कुल मतदाताओं का लगभग 39 फीसदी है और जाटों के एक गुट ने आरएलडी नेता जयंत चौधरी के बीजेपी के साथ गठबंधन करने के फैसले पर निराशा और असंतोष व्यक्त किया. काकरा गांव के जाट मतदाताओं ने विशेष रूप से जयंत पर किसानों की भावनाओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया और बीजेपी द्वारा उनके परिवार के प्रति दिखाए गए अनादर को उजागर किया.
मुजफ्फरनगर का जातीय समीकरण
मुजफ्फरनगर लोकसभा क्षेत्र के राजनीतिक सिनेरियो में आम धारणा यह है कि जाट मतदाता चुनावी नतीजों पर काफी असर डालते हैं. हालांकि जाट कुल मतदाता आधार का केवल लगभग 18 फीसदी हैं. वोटों का बहुमत हिस्सा मुस्लिम समुदाय का है, जो 39 फीसदी है. लगभग 14 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दलित वोट बैंक भी इलाके में अहम रोल अदा करता है. इसके अलावा, गुर्जर और ठाकुर समुदायों में से प्रत्येक के पास लगभग 10 फीसदी वोट हैं. प्रजापति, सैनी और त्यागी सहित अन्य जाति-आधारित समुदाय, निर्वाचन क्षेत्र के अंदर चुनाव के आखिरी नतीजों को प्रभावित करने के लिए अहम हैं.
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बीएसपी ने मुजफ्फरनगर सीट पर प्रजापति उम्मीदवार दारा सिंह प्रजापति को मैदान में उतारा है, जो बीजेपी के लिए चिंता का सबब बन सकता है, क्योंकि प्रजापति को अनुसूचित जाति और ओबीसी मतदाताओं से समर्थन मिल सकता है.
मुस्लिम अल्पसंख्यकों के बीच साझा आम सहमति समाजवादी पार्टी (सपा) के उम्मीदवार की ओर झुकती दिखाई दे रही है. इसकी वजह इलाके में शांति और विकास की उनकी चाहत है. उन्हें 2013 के सांप्रदायिक दंगे अच्छी तरह याद हैं, जिसने शहर में सद्भाव और प्रगति को काफी हद तक धीमा कर दिया था.
पश्चिमी यूपी का सियासी भविष्य तय करेगा मुजफ्फरनगर
मुजफ्फरनगर में लोकसभा परिणाम पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करेगा. जाटलैंड के बीच स्थित मुजफ्फरनगर इस क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य को आकार देने में अहम भूमिका निभाएगा. बीजेपी के संजीव बालियान के लिए जीत सिर्फ चुनावी जीत से कहीं ज्यादा मायने रखेगी.
दूसरी तरफ, अगर समाजवादी पार्टी के हरेंद्र मलिक जीतते हैं, तो यह कई धारणाओं को तोड़ देगा. नतीजा कुछ भी हो, एक बात तय है कि रिजल्ट के बाद जाटलैंड में राजनीतिक सिनेरियो बेहत अहम बदलाव से गुजरने वाला है.
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2014 लोकसभा चुनाव में वोट प्रतिशत
भारतीय जनता पार्टी: 58.9
समाजवादी पार्टी: 14.6
बहुजन समाज पार्टी: 22.8
कांग्रेस: 1.2
2017 विधानसभा चुनाव में वोट प्रतिशत
भारतीय जनता पार्टी: 42.1
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस (गठबंधन): 33.2
बहुजन समाज पार्टी: 17.3
आरएलडी 5.4
2019 लोकसभा चुनाव में वोट प्रतिशत
भारतीय जनता पार्टी: 49.6
आरएलडी, एसपी, बीएसपी (गठबंधन): 49.2
2022 विधानसभा चुनाव में वोट प्रतिशत
भारतीय जनता पार्टी: 43.4
एसपी, आरएलडी (गठबंधन): 44.9
बीएसपी: 8.2
कांग्रेस: 0.7