
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) नेता प्रफुल्ल पटेल ने दावा किया है कि जब अजित पवार ने पिछले साल महाराष्ट्र सरकार में डिप्टी सीएम के तौर पर शपथ ली थी तो पार्टी संस्थापक शरद पवार भी सरकार के साथ जाने के लिए '50 प्रतिशत' तैयार थे. बता दें कि पिछले साल 2 जुलाई को अजित पवार ने एनसीपी में बंटवारा कर दिया था. तब उनके साथ महाराष्ट्र सरकार के 8 मंत्री भाजपा-शिवसेना (शिंदे गुट) सरकार में शामिल हो गए थे.
अजित पवार गुट से ताल्लुक रखने वाले प्रफुल्ल पटेल ने एजेंसी को बताया,'2 जुलाई 2023 को अजित पवार और हमारे मंत्रियों ने महाराष्ट्र सरकार में शामिल होकर शपथ ली. 15 और 16 जुलाई को हमने मुंबई में शरद पवार से मुलाकात की. हमने उनका आशीर्वाद लिया और उनसे हमारे साथ जुड़ने का अनुरोध किया. हमने कहा कि हम आपके नेतृत्व में काम करना चाहते हैं. बाद में अजित और शरद पवार की पुणे में मुलाकात हुई. मेरा मानना है कि शरद पवार 50 प्रतिशत तैयार थे.
शरद गुट के प्रवक्ता ने बयान को बताया गलत
बता दें कि एनसीपी में विभाजन के कारण पार्टी के चुनाव चिन्ह पर दावे को लेकर अजित पवार और शरद पवार गुटों के बीच तकरार शुरू हो गई थी. अंत में चुनाव आयोग ने फरवरी में फैसला सुनाते हुए अजित पवार के गुट को ही 'असली' एनसीपी बताया था. चुनाव आयोग ने शरद पवार के गुट के लिए एक नया नाम 'एनसीपी-शरदचंद्र पवार' आवंटित किया था. हालांकि, एनसीपी-शरदचंद्र पवार के प्रवक्ता क्लाइड क्रैस्टो ने प्रफुल्ल पटेल की टिप्पणी को निरर्थक बताया है.
क्या इसलिए दिए जा रहे हैं बयान?
क्लाइड क्रैस्टो ने कहा,'प्रफुल्ल पटेल का बयान निरर्थक है और इसका कोई मूल्य नहीं है. इस कथन में कोई सच्चाई नहीं है. ये सभी बयान केवल अपना मूल्य बढ़ाने के लिए दिए जा रहे हैं, क्योंकि भाजपा अजीत पवार समूह के साथ ऐसा व्यवहार कर रही है जैसे कि वे कुछ भी नहीं हैं. अगर चीजें होनी होतीं तो वे बहुत पहले ही हो गई होतीं.'
शिंदे की बगावत के बाद गिरी थी सरकार
बता दें कि पिछले साल अक्टूबर में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में प्रफुल्ल पटेल ने कहा था कि एनसीपी के अधिकतर नेता 2022 में महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होना चाहते हैं. यही वह समय था जब एकनाथ शिंदे द्वारा शिवसेना में विभाजन के कारण उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई थी.