
मध्य प्रदेश के जनादेश की तस्वीर साफ होती दिख रही है. मध्य प्रदेश में आज शिव के नाम का जयकारा लग रहा है. मामा शिवराज सिंह चौहान ने उनकी विदाई का मर्शिया पढ़ रहे लोगों को करारा जवाब दिया है और बंपर बहुमत के साथ मध्य प्रदेश में वापसी करते दिख रहे हैं. एमपी के चुनावी समर में जिस शिवराज को लोग गया मान रहे थे उन्होंने झन्नाटेदार कमबैक किया है. ताजा रुझानों में शिवराज धुआंधार वापसी करते दिख रहे हैं.
आइए जानते हैं कि आखिर 4 बार मुख्यमंत्री रह चुके शिवराज सिंह चौहान ने एंटी इनकमबेंसी नाम की बला को कैसे धक्का दिया और मैदान अपने नाम कर लिया.
लाडली बहनों का प्यार, मामा ने किया चमत्कार
चुनावी पंडित शिवराज की वापसी में उनकी बहुप्रचारित और घर घर पहुंच चुकी स्कीम लाडली बहना योजना को प्राइम फैक्टर मान रहे हैं. इस योजना ने शिवराज की राजनीतिक किस्मत बदल कर रख दी है. प्रदेश की बेटियों का खुद को मामा कहने वाले शिवराज लंबे समय से मध्य प्रदेश में महिलाओं के बीच लोकप्रिय रहे हैं.
लाड़ली बहना योजना के तहत मध्य प्रदेश की 1.31 करोड़ महिलाओं को 1250 रुपये हर महीने दिये जा रहे हैं. इन योजनाओं ने शिवराज के लिए एक लाभार्यी वर्ग बना दिया. एमपी की 7 करोड़ आबादी में लाडली बहना योजना की लाभार्थियों ने शिवराज को भर भर कर वोट दिया है. इन महिलाओं लड़कियों के लिए शिवराज का नाम एक भरोसा था, इस पर उन्होंने यकीन किया. अनुमान है कि बीजेपी अगर कांग्रेस का परंपरागत वोटर माने जाने वाले एससी-एसटी वोट में भी सेंध लगाती नजर आ रही है तो इसके पीछे लाडली बहना योजना बताई जा रही है. दरअसल कैश डिलीवरी एक ऐसी योजना है जो लाभार्थी को अपने इच्छा के मुताबिक खर्च करने का विकल्प देता है. एमपी की बेटियों ने शिवराज की इस स्कीम को भविष्य की गारंटी समझा और वोट दिया.
चुनावी नतीजों की पल-पल की खबर, पढ़ें Live
इस चुनाव में शिवराज ने न सिर्फ अपने इस स्कीम को प्रचारित किया बल्कि अपने पुराने रिकॉर्ड का भी हवाला दिया और अपने 18 साल के गवर्नेंस की दुहाई दी. इस दौरान शिवराज ने गांव की बेटी और लाडली लक्ष्मी योजना का हवाला दिया.
इसके अलावा शिवराज ने कल्याणकारी घोषणाओं की बाढ़ लगा दी. उन्होंने राज्य के 30 लाख जूनियर स्तर के कर्मचारियों के लिए वेतन और भत्ते में वृद्धि की. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को भी तोहफा दिया और उनका वेतन 10,000 रुपये से बढ़ाकर 13,000 रुपये किया. इसके अलावा शिवराज ने रोजगार सहायकों का मानदेय दोगुना (9,000 रुपये से 18,000 रुपये) करने और जिला पंचायत अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, जिला अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और उपसरपंच और पंच जैसे नेताओं का मानदेय तीन गुना करने का भी वादा किया है.
न अंदरूनी चैलेंज, न ही बगावत
मध्य प्रदेश में 16 साल तक मुख्यमंत्री रह चुके शिवराज के लिए इस चुनाव में जो सबसे अच्छी बात रही वो ये रही कि उन्हें पार्टी के अंदर किसी बड़ी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा. शिवराज के सामने कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र सिंह तोमर, गणेश सिंह, राकेश सिंह, प्रह्लाद सिंह पटेल, फग्गन सिंह कुलस्ते जैसे नेता जो शिवराज को चुनौती दे सकते थे उन्हें पार्टी ने चुनावी मैदान में उतार दिया और उन्हें साफ-साफ अपनी योग्यता और प्रभाव साबित करने को कहा.
इन दिग्गजों को चुनाव में उतार कर बीजेपी आलाकमान ने यह मैसेज दिया कि किसी को दिल्ली का एब्सोल्युट आशीर्वाद हासिल नहीं है. अगर आपको बड़ी जिम्मेदारी चाहिए तो स्वयं को साबित भी करना पड़ेगा. आज के नतीजे एमपी के इन दिग्गजों का आगे का भविष्य तय करेंगे.
इसके अलावा मध्य प्रदेश की बड़ी नेत्री उमा भारती भी चुनावी गतविधियों से ज्यादातर दूर ही रहीं. इसका नतीजा ये हुआ कि मतदाताओं के सामने शिवराज के नेतृत्व को लेकर किसी तरह का संकोच- संकट नहीं रहा. वोटर्स ये अच्छी तरह समझ गए कि अगर उन्होंने बीजेपी को वोट दिया तो नेतृत्व किसके हाथ में जाएगा.
हिन्दुत्व का सिक्का, बुलडोजर का फैक्टर
मध्य प्रदेश में हिंदुत्व की जड़ें काफी गहरी हैं. यही वजह है कि कथित सेकुलर कांग्रेस को भी एमपी में सॉफ्ट हिन्दुत्व के सहारे चलना पड़ा. लेकिन मतदाताओं को जब चुनने की जरूरत हुई तो उन्होंने बीजेपी के ब्रांड वाले हिन्दुत्व को चुना.
शिवराज राज्य में मंदिरों की तस्वीर बदल कर उन्हें आध्यात्मिकता के साथ साथ आधुनिकता का कलेवर देने में लगे हैं. केंद्र की बीजेपी भी इसी नीति पर चल रही है. उज्जैन कॉरिडोर इसी का उदाहरण है. इसके अलावा शिवराज ने राज्य के चार मंदिरों- सलकनपुर में देवीलोक, ओरछा में रामलोक, सागर में रविदास स्मार्क और चित्रकूट में दिव्य वनवासी लोक के विस्तार और स्थापना के लिए 358 करोड़ रुपये का बजट दिया है.
इसके अलावा शिवराज ने उत्तर प्रदेश की तरह अपने यहां भी बुलडोजर ब्रांड की राजनीति का इस्तेमाल किया. उज्जैन में शोभायात्राओं पर पत्थर फेंकने वालों के घर बुलडोजर चले. उज्जैन में ही बच्ची के साथ रेप के आरोपी का घर बुलडोजर से ढहा दिया गया.
इमोशनल कार्ड
इस चुनाव में बीजेपी ने मध्य प्रदेश में शिवराज को बतौर सीएम कैंडिडेट नहीं उतारा है. चुनाव प्रचार के दौरान इस बात के कयास लगाये जा रहे हैं कि अगर एमपी में बीजेपी जीतती भी है तो शिवराज सीएम नहीं बनेंगे. इससे ये संदेश गया कि शिवराज की स्थिति कमजोर है. लेकिन इस मुद्दे पर शिवराज इमोशनल कार्ड खेल गए. शिवराज ने प्रचार के दौरान साफ साफ मतदाताओं-महिलाओं से पूछा कि क्या आप नहीं चाहते हैं कि आपका मामा, आपका भाई मुख्यमंत्री बने? शिवराज के इस सवाल पर वोटर्स ने भारी शोर के साथ उनके पक्ष में जवाब दिया. अब तो आंकड़े ये भी बता रहे हैं कि न सिर्फ मतदाताओं ने जवाब दिया, बल्कि शिवराज को भारी वोट दिया.
ब्रांड शिवराज
इन फैक्टर्स के अलावा मध्य प्रदेश में 16 साल तक मुख्यमंत्री रहने वाले शिवराज वोटर्स के सामने खुद भी ब्रांड बन गए. इस पीरियड में एमपी बीमारु राज्यों की कैटेगरी से बाहर निकला है. कई शहरों का कायाकल्प हुआ है. लोगों ने काम करने के इस तरीके को पसंद किया, उन्हें ब्रांड शिवराज पर भरोसा नजर आया, इसलिए लोगों ने शिवराज को वोट दिया. यहां बीजेपी का डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर का सिद्धांत शिवराज के काम आया. जब योजनाओं का फायदा सीधे जनता के हाथ में पहुंचता है तो सरकार और सिस्टम पर उनका यकीन बढ़ जाता है. यही वजह रहा कि जनता उन्हें 5 बार वोट दे रही है.
बता दें कि एसडीएस सर्वेक्षण के अनुसार, शिवराज सिंह चौहान सरकार के साथ जनता का satisfaction level 61 प्रतिशत बेहतर है, 27 प्रतिशत लोग पूरी तरह से संतुष्ट हैं.
इस चुनाव में जब जनता के सामने शिवराज और कमलनाथ के बीच चुनने का विकल्प आया तो जनता ने 16 सालों से लगातार आजमाये शिवराज के साथ जाना बेहतर समझा.