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चरणजीत चन्नी: चुनाव से पहले ही कांग्रेस ने निकाला विपक्ष के वादे का तोड़, पंजाब को दिया पहला दलित CM

पंजाब में पहली बार दलित मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने राज्य की सबसे बड़ी करीब 32 फीसदी दलित आबादी को न सिर्फ प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की बल्कि विपक्ष के दलित मुख्यमंत्री और डिप्टी सीएम के एजेंडे की धार को भी कुंद करने की कोशिश की है. हालांकि, कांग्रेस का दलित फार्मूला कितना सफल रहता है यह तो 2022 के चुनाव में ही पता चल सकेगा.

चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के नए सीएम चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के नए सीएम
कुबूल अहमद
  • नई दिल्ली ,
  • 20 सितंबर 2021,
  • अपडेटेड 11:28 AM IST
  • पंजाब के पहले दलित सीएम बने चरणजीत सिंह चन्नी
  • देश में सबसे ज्यादा दलित मतदाता पंजाब में हैं
  • पंजाब का दलित रविदासी और वाल्मीकि में बंटा

पंजाब में सत्ता की कमान कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी (Charanjit Singh Channi) को सौंप दी है. भारी उलटफेर और नवजोत सिंह सिद्धू, सुखजिंदर रंधावा, अंबिका सोनी और सुनील जाखड़ जैसे दिग्गज नेताओं के नाम सामने आने के बाद चरणजीत सिंह चन्नी के नाम पर मुहर लगी. वे पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री हैं. पंजाब में बदलाव का यह फैसला चाहे सियासी मजबूरी के तौर पर हुआ हो, लेकिन चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया जाना राज्य की सियासत में कांग्रेस के एक 'मास्टरस्ट्रोक' के तौर पर देखा जा रहा है.

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पंजाब में पहली बार दलित मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने राज्य की सबसे बड़ी करीब 32 फीसदी दलित आबादी को न सिर्फ प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की बल्कि बीजेपी द्वारा दलित मुख्यमंत्री के एजेंडे की धार को भी कुंद करने का दांव चला है. इसके साथ ही कांग्रेस ने अकाली दल और आम आदमी पार्टी के द्वारा दलित उपमुख्यमंत्री की घोषणा को भी सियासी मात देने की कवायद की है. 

इन नेताओं के नाम आगे आए

दरअसल, कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब में पहले हिंदू कार्ड खेलने की कोशिश की और वरिष्ठ नेता अंबिका सोनी को मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने पंजाब में जट सिख को ही सीएम बनाने की बात कहते हुए मुख्यमंत्री बनने से इनकार कर दिया. इसके बाद सुनील जाखड़ भी सीएम की रेस से बाहर हो गए और सुखजिंदर सिंह रंधावा का नाम सामने आया. 

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रंधावा के आड़े आए सिद्धू

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने अपने सियासी समीकरण को ध्यान में रखते हुए सुखजिंदर सिंह रंधावा की राह में पेंच फंसा दिया और खुद सीएम बनने की दावेदारी पेश कर दी. ऐसे में सीएम के लिए दो जट सिख नेताओं की लड़ाई में दलित नेता चरणजीत चन्‍नी के नाम की लॉटरी निकल गई और उनके नाम पर मुहर लगी. इसी के साथ कांग्रेस ने पंजाब में जट मुख्यमंत्री की धारणा को भी तोड़ दिया है. पंजाब में अभी तक जट सिख ही मुख्यमंत्री बनता रहा है. 

खरड़ नगर काउंसिल के प्रधान पद से राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने एक तीर से कई शिकार किए हैं. बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल दलित कार्ड खेलकर सत्ता में वापसी की उम्मीद लगा रही थी. ऐसे में कांग्रेस ने डिप्टी सीएम की बजाए दलित को ही मुख्यमंत्री बनाने का फैसला कर विपक्षी दलों के वादे को सियासी मात चुनाव से पहले ही दे दी. इसके अलावा पंजाब की सबसे बड़ी आबादी दलित वोटों को भी कांग्रेस ने सियासी संदेश देने की कवायद की है. 

देश में सबसे ज्यादा दलित पंजाब में

बता दें कि देश में सबसे ज्यादा 32 फीसदी दलित आबादी पंजाब में रहती है, जो राजनीतिक दशा और दिशा बदलने की पूरी ताकत रखती है. पंजाब का यह वर्ग अभी तक पूरी तरह कभी किसी पार्टी के साथ नहीं रहा है. दलित वोट आमतौर पर कांग्रेस और अकाली के बीच बंटता रहा है. हालांकि, बीएसपी ने इसमें सेंध लगाने की कोशिश की, लेकिन उसे भी एकतरफा समर्थन नहीं मिला. वहीं आम आदमी पार्टी के पंजाब में दलित वोटों को साधने के लिए तमाम कोशिश की, लेकिन बहुत हिस्सा उसके साथ नहीं गया. 

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पंजाब का दलित दो हिस्सों में बंटा

पंजाब में दलित वोट अलग-अलग वर्गों में बंटा है. यहां रविदासी और वाल्मीकि दो बड़े वर्ग दलित समुदाय के हैं. देहात में रहने वाले दलित वोटरों में एक बड़ा हिस्सा डेरों से जुड़ा हुआ है. ऐसे में चुनाव के वक्त दलित वोटों में डेरे भी अहम भूमिका निभाते हैं.  महत्वपूर्ण है कि दोआबा की बेल्ट में जो दलित हैं, वे पंजाब के दूसरे हिस्सों से अलग हैं. इसकी वजह यह है कि इनमें से अधिकांश परिवारों का कम से कम एक सदस्य एनआरआई है.  इस नाते आर्थिक रूप से ये काफी संपन्न हैं. इनका असर फगवाड़ा, जालंधर और लुधियाना के कुछ हिस्सों में है. 

चरणजीत सिंह चन्नी इसी इलाके से आते हैं और दलित समुदाय में खासकर रविदासी समाज के बीच उनकी अच्छी पकड़ है. दलित मुख्यमंत्री के जरिए कांग्रेस पार्टी को ग्रामीण क्षेत्र में मजबूत आधार मिलेगा. दोआबा क्षेत्र में 2017 के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 18 सीटें जीती थी. कांग्रेस के पास 20 दलित विधायक हैं. 117 सदस्यीय विधानसभा में 36 आरक्षित सीटें है, जिनमें से केवल तीन को ही मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था. 

चरणजीत को चुनने की कांग्रेस की रणनीति

2022 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियों की नजर दलित वोटरों पर है. अकाली दल प्रमुख ने बसपा के साथ हाथ मिलाकर दलित डिप्टी सीएम का दांव चला था. दलित वोटों को अपने पाले में लाने के लिए बीजेपी सीएम बनाने का वादा कर रही है तो आम आदमी पार्टी ने भी डिप्टी सीएम का ऐलान कर रखा था. ऐसे में कांग्रेस ने दलित मुख्यमंत्री बनाकर सारी पार्टियों पर बढ़त बना ली है. 

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चरणजीत सिंह चन्‍नी को चुनने के पीछे कांग्रेस की सोची-समझी स्‍ट्रैटेजी है. पंजाब की पॉलिटिक्‍स में एक कहावत बहुत चर्चित है कि जो मालवा जीत लेता है, वही सरकार बना लेता है. पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में 69 सीटें मालवा में ही हैं.

2017 के चुनाव में कांग्रेस ने मालवा क्षेत्र में 40 सीटें जीती थीं. इसके बाद दूसरे अहम क्षेत्र माझा और दोआब को माना जाता है. माझा में 25 विधानसभा सीटें हैं तो दोआब में 23 विधानसभा सीटें आती हैं. पिछले चुनाव में कांग्रेस ने माझा की 22 सीटों और दोआब की 15 सीटों पर जीत हासिल कर सत्ता पर काबिज हुई थी. 

मालवा क्षेत्र में डेरा का सबसे ज्यादा प्रभाव मालवा में ही है. एक अनुमान के अनुसार, क्षेत्र के 13 जिलों में करीब 35 लाख डेरा प्रेमी हैं, उसमें भी खास बात यह है कि दलित सिख ही इनमें ज्‍यादा जाते हैं. यही बात चरणजीत सिंह चन्‍नी के समर्थन में गई. डेरा प्रेमी का एकमुश्‍त वोट किसी भी दल का गणित बिगाड़ सकता है. यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्‍व वाली आम आदमी पार्टी मालवा में पूरा दम झोंकती रही है.

 2017 के चुनाव में उसने यहां से 18 सीटें जीती थीं. इस बार भी वह यहीं के बूते गणित बिगाड़ना चाहती है. आम आदमी पार्टी ही नहीं बल्कि शिरोमणि अकाली दल भी बसपा के साथ मिलकर यहां अपनी मौजूदगी को फिर मजबूत करना चाहती है. अकाली दल ने इस क्षेत्र से 2012 में 33 सीटें जीती थीं, लेकिन 2017 में उसकी सीटें घटकर 8 रह गई थीं. इस तरह उसने सत्‍ता भी गंवा दी थी जबकि 23 सीटों वाले दोआब क्षेत्र में पारंपरिक तौर पर अकाली दल की पकड़ रही है.

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पंजाब का यह है जातीय समीकरण

पंजाब का जातीय गणित माझा मालवा और दोआबा में बंटा है. सूबे में 20 प्रतिशत जट सिख हैं, 32 फीसदी दलित वोट और 38 प्रतिशत हिंदू हैं. ऐसे में कांग्रेस ने दलित सीएम की घोषणा कर जातीय ध्रुवीकरण करने की कोशिश की है. मुस्लिम, ईसाई और अन्य के 10 प्रतिशत के करीब वोटर सूबे में हैं, जो कांग्रेस का मजबूत वोट माना जाता है. ऐसे में दलित सीएम देकर कांग्रेस ने अपना सियासी समीकरण सेट करने की कवायद की है, लेकिन यह फॉर्मूला कितना सफल रहता है यह तो 2022 के चुनाव में ही पता चल सकेगा. 

 

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