
पिछले साल 27 अगस्त को अकाली दल के नेता और पंजाब के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की चिट्ठी दिखाकर कहते हैं कि नए कृषि कानूनों से सरकार की ओर से फसलों की खरीद और उनके न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. उस दिन किसी ने नहीं सोचा था कि राजनीति कुछ इस तरह करवट लेगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुद ही इस बात का ऐलान करना पड़ेगा कि कृषि कानून वापस लिए जाएंगे.
27 अगस्त 2020 से लेकर 17 सितंबर 2020 के बीच घटनाक्रम कुछ ऐसा बदला कि अकाली दल ने कृषि कानूनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. 17 सितंबर 2020 को जिस दिन लोकसभा में इन बिलों को पास किया गया उस पर बहस के दौरान विरोध करते हुए सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि वो इन अध्यादेशों के विरोध में हैं. क्योंकि किसान, खेतों में काम करने वाले मज़दूर और आढ़तियों के लिए ये खतरा हैं.
अकाली दल का ये विरोध इस सीमा तक पहुंचा कि पार्टी ने बीजेपी से 24 साल पुराने गठबंधन को ही तोड़ लिया. केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल अकाली नेताओं ने इस्तीफा दे दिया. दूसरी ओर किसान नेता राकेश टिकैत की अगुवाई में पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने दिल्ली में डेरा डाल दिया. पंजाब में किसानों का सबसे बड़ा हितैषी कौन है, इस पर कांग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी के बीच रस्साकशी शुरू हो गई.
अकाली दल ने रुख क्यों बदला इसको सुखबीर सिंह बादल के लोकसभा में दिए गए भाषण के अंश से समझ सकते हैं. उन्होंने कहा, ये कृषि कानून 20 लाख किसानों, 3 लाख मंडी मजदूर, 30 लाख खेतिहर मजदूर, 30 हजार आढ़तियों के लिए खतरा हैं. सुखबीर बादल ने आगे कहा, ' पंजाब की पिछली 50 साल की बनी बनाई किसान की फ़सल ख़रीद व्यवस्था को ये बिल नाश कर देंगे.' जाहिर है सुखबीर सिंह बादल ने ये आंकड़ा पंजाब को ही ध्यान में रखते हुए दिया था. पंजाब की राजनीति में आढ़तिए और किसानों का वोट निर्णायक रहता है.
क्या है अब अकाली दल की स्थिति?
पंजाब में आम आदमी पार्टी की गतिविधियां बढ़ने के बाद से ही राजनीति अब वहां दो ध्रुवीय नहीं रही है. बीते विधानसभा चुनाव में पंजाब में आम आदमी पार्टी ने अकाली दल से मुख्य विपक्षी पार्टी तक का रुतबा छीन लिया. अकाली दल ही एक ऐसी पार्टी है जिसने पंजाब में लगातार दो बार सरकार बनाई है. एक क्षेत्रीय दल होने के नाते किसी पार्टी के लिए किसान एक बड़ा वोट बैंक हो सकते हैं. आम आदमी पार्टी जिस तरह से पंजाब में विस्तार कर रही है उससे अकाली दल को लगता है कि किसानों के बीच उसकी पैठ कम न हो जाए. उसके लिए जरूरी है कि कृषि कानून के विरोध के सहारे इस पर मजबूत पकड़ बनाई रखी जाए. इसलिए किसानों के नाम पर गठबंधन को भी कुर्बान करके एक संदेश देने की कोशिश की गई.
आम आदमी पार्टी की क्या है स्थिति
पंजाब में कृषि कानून एक बड़ा मुद्दा बन चुका है. अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल एनडीए से हटने के बाद मोदी सरकार के खिलाफ लगातार हमलावर हैं. आम आदमी पार्टी भले ही लोकलुभावन वादे करे लेकिन बादल के टक्कर का चेहरा अभी उसके पास नहीं है और न ही किसी को सीएम कैंडिडेट पार्टी ने घोषित किया है. आम आदमी पार्टी की हालत आज भी 2017 के चुनाव वाली है. जहां पार्टी कार्यकर्ताओं में ऊहापोह की स्थिति है. बाकी दलों के नाराज नेताओं को अपने पाले में लाकर आम आदमी पार्टी किसी तरह अपना कुनबा बढ़ा रही है.
कांग्रेस भी अपनों में उलझी
कांग्रेस इस समय चुनावी तैयारियों से ज्यादा कैप्टन अमरिंदर सिंह से उलझी दिख रही है. बाकी कसर सीएम चरणजीत सिंह चन्नी और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच जारी दांवपेंच पूरे कर रहे हैं. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नई पार्टी बनाने का ऐलान किया है और साथ ही वो बीजेपी के काफी करीब हो गए हैं. दावा है कि कृषि कानून वापसी के पीछे कैप्टन अमरिंदर सिंह का भी बड़ा हाथ है. कैप्टन बीजेपी के साथ मिलकर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.
बीजेपी को मिले 'कैप्टन'!
पंजाब में अकाली दल के साथ मिलकर बीते 24 सालों से चुनाव लड़ रही बीजेपी के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है. लेकिन पार्टी ने ऐलान कर दिया है कि वह राज्य की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी. इसके पीछे पार्टी खुद का विस्तार करने की रणनीति पर काम करेगी. लेकिन आज के हालात पर नजर डालें तो फिलहाल अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद पार्टी को बहुत मेहनत करनी होगी.
वहीं पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र जादौन का कहना है कि भले की कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कृषि कानून वापस लेने का क्रेडिट लेकर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे हों लेकिन कांग्रेस आज भी मजबूत स्थिति में है. इसकी वजह ये है कि सीएम चन्नी लगातार लोकलुभावन घोषणाएं कर रहे हैं और दलित वोटों का भी पार्टी की ओर झुकाव देखा जा रहा है.
अकाली दल और बीजेपी गठबंधन टूटने के असर के सवाल पर जादौन का दावा है इस बार के विधानसभा चुनाव में अकाली दल और बीजेपी पर्दे के पीछे एक होकर चुनाव लड़ेंगे. पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी बैकडोर से इस गठबंधन में शामिल रहेंगे. कृषि कानून वापस लेने के बाद भी किसान वोट बीजेपी को मिलने के आसार कम हैं लेकिन चर्चा यह भी है कि किसान यूनियन अपने प्रत्याशी उतारेगी, ऐसे में दूसरे दल से भी ये वोट छिटक सकते हैं.