
पंजाब की राजनीति में नेताओं, पार्टियों और जातिगत समीकरणों के साथ-साथ डेरे भी बड़ी भूमिका निभाते हैं. सीधे शब्दों में कहें तो पंजाब में राजनीतिक दल और डेरे एक दूसरे की जरूरत हैं. डेरों के प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का इस्तेमाल अपने 'भक्तों' की संख्या बढ़ाने के लिए करते हैं तो राजनीतिक दल इन डेरों की चौखट पर इसलिए जाते हैं ताकि इनके लाखों अनुयायियों के एकमुश्त वोट मिल सकें. पंजाब में इन डेरों का दखल सिर्फ धार्मिक गतिविधियों तक नहीं है.
डेरे वहां के सामाजिक-राजनीतिक नजरिए से कई समुदायों के वैचारिक मंच भी बन गए हैं. इन डेरों में दलित समुदाय के ज्यादा अनुयायी हैं जो राज्य में हमेशा से ही जाट सिखों के बीच अपनी जगह-पहचान पाने के लिए संघर्ष करते रहे हैं. डेरों की सक्रियता से जाट सिखों और दलितों की बीच वर्चस्व की लड़ाई बढ़ी है.
पंजाब में डेरों की शुरुआत
पंजाब के लिए डेरों का अस्तित्व कोई 10-20 साल पुरानी बात नहीं है. इनका इतिहास उतना ही पुराना है जितना की सिख धर्म का. वास्तव में पहले डेरे मुस्लिमों और योगनाथ से ताल्लुक रखते थे. लेकिन सिख धर्म की स्थापना के बाद कुछ सिख और गैर सिख डेरे भी अस्तित्व में आए. इनमें प्रमुख रूप से उदासी डेरा, डेरा बाबा राम तहमान, नामधारी और नानक्सर थे.
पंजाब में अभी कितने डेरे हैं?
पंजाब में कितने डेरे अभी सक्रिय हैं इसका कोई सरकारी आंकड़ा तो नही हैं. लेकिन इंटरनेट में सवाल को तलाशने पर एक रिसर्च पेपर मिला है जिसको डॉ. नीरू वर्मा ने लिखा है. जिसमें उन्होंने सिख धर्म के स्कॉलर के हवाले से लिखा है कि इस समय पंजाब के गांवों में कम से कम 9000 सिख और 12000 गैर सिख डेरे सक्रिय हैं. इनमें करीब 300 डेरे खासे लोकप्रिय हैं जो पंजाब के साथ ही हरियाणा में भी सक्रिय हैं. इनमें से करीब 12 ऐसे होंगे जिनके 1 लाख से ज्यादा अनुयायी हैं.
कौन हैं प्रमुख डेरे?
पंजाब में इस समय राधा स्वामी सत्संग ब्यास, डेरा सच्चा सौदा, निरंकारी, नामधारी, दियाज्योति जागरण संस्थान (नूरमहल), डेरा संत बनीरवाला, डेरा सच्चा कांड हैं. इन सभी डेरों की शाखाएं प्रदेश के हर जिले में फैली हैं. कुछ डेरा ऐसे हैं जो दूसरे राज्यों में भी सक्रिय हैं.
कौन हैं डेरे के अनुयायी
पंजाब में डेरों को लेकर मन में श्रद्धा है और यहां पर हर जाति के लोग आते हैं. लेकिन दलितों और पिछड़ों की संख्या सबसे ज्यादा है जो कि आर्थिक रूप से ज्यादा मजबूत नहीं होते हैं. पंजाब में सामाजिक असमानता डेरों के अस्तित्व में आने का प्रमुख कारण है. पंजाब में जाट सिखों का सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में दबदबा है. यहां दलितों की आबादी कुल जनसंख्या का 32 फीसदी है जो कि किसी भी राज्य में सबसे ज्यादा है लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है. बड़ी संख्या में दलित मजदूर ही हैं.
ऐसे सामाजिक तानेबाने में पंजाब के अंदर डेरों ने दलित चेतना को पैदा करने का काम किया. डेरों ने दलित समुदाय के लोगों के लिए शिक्षा और चिकित्सा का भी जिम्मा उठाया. नतीजा ये रहा कि दलित समुदाय के लोगों ने गैर खेती से जुड़े व्यवसाय अपना लिए और बड़ी संख्या में विदेशों में भी बस गए. हालांकि दलितों की इस चेतना की वजह से कई जगहों पर टकराव की भी घटनाएं हुईं.
राजनीति में कैसे बढ़ा वर्चस्व
डेरे समय-समय पर अपने अनुयायियों से किसी पार्टी या प्रत्याशी के लिए वोट की अपील करते रहे हैं. यही वजह है कि राज्य के दो प्रमुख दल कांग्रेस हो या अकाली दल किसी न किसी डेरे से अपने संबंध बनाए रखे हैं. साल 2007 के चुनाव में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख रहे और अब रेप के आरोप में जेल काट रहे गुरमीत राम रहीम ने कांग्रेस की जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी. कांग्रेस को मालवा इलाके में बड़ा समर्थन मिला था जबकि इसी क्षेत्र में अकाली दल को तगड़ा नुकसान हुआ था जबकि ये इस पार्टी का गढ़ माना जाता था.
वहीं साल 2009 के लोकसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल ने डेरा सच्चा सौदा को अपने पाले में कर लिया. इसका नतीजा ये रहा कि हरसिमरत कौर ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के बेटे रनिंदर सिंह को एक लाख वोटों से हरा दिया. साल 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले खुद विदेशमंत्री सुषमा स्वराज डेरा सच्चा सौदा गई थीं. सिर्फ डेरा सच्चा सौदा ही नहीं, कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के नेता नामधारी, राधास्वामी जैसे तमाम डेरों की चौखट पर सिर नवाते रहते हैं ताकि उनके लाखों समर्थकों के वोट मिल सके.