
बिजनौर, यूपी का वो सीमाई जिला है जिसकी सरहद उत्तराखंड से कई छोर पर लगती है. इसके एक तरफ हरिद्वार है, तो दूसरी तरफ कोटद्वार और तीसरी तरफ काशीपुर है. जनपद का ज्यादातर हिस्सा तराई बेल्ट में आता है. बिजनौर के लिए यूपी की राजधानी लखनऊ दूर मानी जाती है, जबकि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून यहां से नजदीक है. देहरादून को नैनीताल से जोड़ने वाला मुख्य मार्ग भी बिजनौर से ही होकर गुजरता है.
ये जिला गंगा और मालन नदी के बीच बसा है. यहां हर तरफ हरियाली नजर आती है. इसे 'विदुर भूमि' भी कहा जाता है क्योंकि महाभारत काल में युद्ध शुरू होने से पहले महात्मा विदुर हस्तिनापुर का त्याग कर यहीं बिजनौर आकर गंगा किनारे कुटिया बनाकर रहने लगे थे. इस जगह को आज 'विदुर कुटी' के नाम से जाना जाता है जो बिजनौर शहर से महज 10 किमी की दूरी पर है.
गन्ने की खेती सबसे ज्यादा
बिजनौर मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है. यहां गन्ना, धान और गेहूं की खेती बडे़ पैमाने पर होती है. यहां गन्ने की पैदावार इतनी है कि जिले में 9 शुगर मिल है. यहां तक कि जिले की धामपुर शुगर मिल को एशिया की सबसे बड़ी शुगर मिल के तौर पर जाना जाता है. जिले में शुगर मिल के अलावा परंपरागत तौर पर चलने वाले गन्ना क्रेशर और कोल्हू के रूप में लघु उद्योग भी हैं. इन लघु उद्योगों में शुगर और गुड़ का निर्माण किया जाता है.
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बिजनौर के इतिहास की बात करें तो ये इलाका प्राचीन काल में कौशल साम्राज्य का अभिन्न अंग था. बिजनौर को जहां एक ओर महाराजा दुष्यंत परम प्रतापी सम्राट परम संत ऋषि कण्व और महात्मा विदुर की कर्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है तो साथ ही भारत के प्रथम इंजीनियर राजा ज्वाला प्रसाद की जन्म भूमि होने का सौभाग्य भी प्राप्त बिजनौर को है.
भारतीय राजनीति और आजादी की लड़ाई में अग्रणी रहे हाफिज मोहम्मद इब्राहिम, मौलाना हिफजुर रहमान और मौलाना अब्दुल लतीफ गांधी जैसे कर्म योद्धा भी इस मिट्टे से निकले हैं.
बिजनौर का नाम पहले व्हेन नगर पड़ा था. फिर ये बिजयनगर कहलाया जाने लगा और अब बिजनौर के नाम से जाना जाता है. बिजनौर की स्थापना 1817 में हुई थी. इसका प्रथम मुख्यालय नगीना बनाया गया था. उसके बाद इसका मुख्यालय झालू बनाने की कोशिश की गई लेकिन यह रणनीति परवान नहीं चढ़ सकी. दरअसल, झालू में अंग्रेज कमिश्नर की पत्नी पर मधुमक्खियों ने हमला बोल दिया था जिसमें उनकी मौत हो गई था, उसी कारण झालू जिला मुख्यालय नहीं बन पाया और आखिरकार बिजनौर को मुख्यालय के लिए चुना गया और बिजनौर मुख्यालय बन गया.
मुस्लिम आबादी निर्णायक
2011 की जनगणना के अनुसार बिजनौर जनपद की कुल आबादी 36 लाख आठ हजार है जिसमें कुल वोटर 2615368 हैं. इसमें पुरुष वोटर 13 लाख 89 हजार 927 हैं, जबकि महिला वोटरों की संख्या 12 लाख 25 हजार 441 है. बिजनौर में हिंदू आबादी 55% और मुस्लिम आबादी 45% है.
जनपद में बिजनौर, धामपुर, चांदपुर, नगीना, नजीबाबाद सहित 5 तहसीलें हैं और 12 नगरपालिका व 6 नगर पंचायत हैं. इसके अलावा जनपद में 11 ब्लॉक हैं.
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बिजनौर में कई ऐतिहासिक स्थल भी मौजूद हैं जिसमें कण्व आश्रम, पारसनाथ का किला, विदुर कुटी मंदिर और आश्रम, दरगाह ए आलिया नजफे हिन्द जोगीरमपुरी, राजा के ताजपुर का गिरजाघर, नजीबुद्दौला का किला सबसे ज्यादा ऐतिहासिक है.
बिजनौर और सियासत
बिजनौर में 2 लोकसभा सीटें हैं. एक बिजनौर और दूसरी नगीना. दोनों ही सीटों पर फिलहाल बसपा के सांसद हैं. 2019 में मोदी लहर के बावजूद बसपा-सपा का गठजोड़ इन दोनों ही सीटों पर काम कर गया था और बिजनौर सीट से बसपा के मलूक नागर और नगीना सीट से बसपा के गिरीश चंद्र सांसद निर्वाचित हुए थे.
जिले में फिलहाल 8 विधानसभा सीटें हैं. बिजनौर, चांदपुर, नूरपुर, धामपुर, बढ़ापुर, नगीना, नजीबाबाद और नहटौर. नगीना और नहटौर आरक्षित सीटें हैं. 2017 के चुनाव में बीजेपी को 6 सीटें मिली थीं, जबकि दो सीटों पर सपा जीती थी. बिजनौर, चांदपुर, नूरपुर, धामपुर, बढ़ापुर और नहटौर सीट पर भाजपा जीती थी. जबकि नगीना और नजीबाबाद पर सपा को जीत मिली थी. हालांकि, बाद में नूरपुर के विधायक की सड़क हादसे में मौत के बाद इस सीट पर हुए उपचुनाव में सपा के नईमुल हसन ने जीत दर्ज की.
बिजनौर जिले में मुस्लिम और हिंदू आबादी सियासी तौर पर बराबर ही है. हिंदुओं में भी यहां दलित आबादी 22 फीसदी के करीब है जो SC है. हिंदू आबादी की बात करें तो यहां जाटों का प्रभाव ज्यादा है. इनके अलावा चौहान, त्यागी भी असर रखते हैं. हरिजन वोट बड़ी संख्या में है. मुस्लिम वोटर किसी भी पार्टी को जीत दिलाने का माद्दा रखते हैं. यही वजह है कि मुस्लिम और दलितों के गठजोड़ से यहां बसपा अपना परचम लहराती रही है.
2007 में जब यहां सात विधानसभा सीटें हुआ करती थीं, तब बसपा ने सभी विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी. खुद मायावती का रिश्ता बिजनौर से काफी मजबूत रहा है. बताया जाता है कि अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर में मायावती ने बिजनौर में खूब मेहनत की और लोगों के बीच जा-जाकर पार्टी को खड़ा किया. 1989 में वो बिजनौर सीट से ही जीतकर सांसद बनी थीं. बिजनौर से ही मीरा कुमार और रामविलास पासवान जैसे राष्ट्रीय नेता भी चुनावी बाजी लड़ चुके हैं.
जिले में वैसे तो सपा, भाजपा और बसपा ही मजबूत मानी जाती है. लेकिन एक सीट ऐसी भी है जहां कांग्रेस का दबदबा नजर आता है. ये सीट है बढ़ापुर. बढ़ापुर सीट पर 2017 के चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार लड़े थे, जो बहुत कम मार्जिन से भाजपा से हार गए थे. इससे पहले भी 2012 के चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार ने भाजपा और बसपा के उम्मीदवारों को कड़ी टक्कर दी थी.
विवाद
दिसंबर 2019 में जब सीएए कानून के विरोध में पूरे देश के साथ यूपी में प्रदर्शन हुए तो बिजनौर में भी उसका असर दिखाई दिया. यहां भी लोग सड़कों पर उतरे. बिजनौर शहर में हिंसा देखने को मिली. जिसके बाद पुलिस ने बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक नौजवानों को गिरफ्तार किया. कई पर रासुका भी लगाई गई. दूसरी तरफ, प्रदर्शन के दौरान ही जिले के नहटौर कस्बे में दो युवाओं की मौत हो गई. ये मौत पुलिस फायरिंग से हुईं. जिस पर जमकर बवाल हुआ. ये मुद्दा काफी गरमाया और सियासत भी हुई. कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी खुद पीड़ित परिवारों से मिलने पहुंचीं थीं.
इससे पहले बिजनौर शहर से जुड़े गांव पेदा में सितंबर 2016 में एक लड़की से छेड़छाड़ को लेकर सांप्रदायिक बवाल हुआ था. जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के तीन लोग गोली लगने से मारे गए थे और करीब आधा दर्जन लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे. यह इतनी बड़ी घटना थी कि शहर में अघोषित कर्फ्यू जैसे हालात पैदा हो गए थे. इस केस के आरोप में ऐश्वर्य मौसम चौधरी को गिरफ्तार किया गया था. लेकिन घटना के कुछ वक्त बाद ही जब 2017 में विधानसभा चुनाव हुए तो मौसम की पत्नी सूची मौसम चौधरी को भाजपा ने टिकट दिया और वो विधायक बन गईं. ऐश्वर्य मौसम चौधरी लगभग 18 महीने जेल में रहे. उनके कुछ केस वापस ले लिए गए और अब वो फिर से राजनीति में सक्रिय हैं.
कुल मिलाकर जिले की सियासी तस्वीर की बात की जाए तो यहां सबसे ज्यादा असर मुस्लिम और जाटों का है. ये दोनों ही समुदाय यहां के किसान भी हैं जो किसान आंदोलन का हिस्सा भी रहे हैं. इसीलिए मौजूदा चुनाव में आरएलडी भी यहां एक बड़ी फाइटर के रूप में सामने है. सपा आरएलडी का गठबंधन सीधे तौर पर मुस्लिम और जाटों का ही गठबंधन माना जा रहा है. जिसे लेकर बीजेपी में चिंता भी है. दूसरी तरफ, अगर मुस्लिमों का रुख बसपा की तरफ नहीं रहता है तो उसके लिए भी समीकरण चुनौतीपूर्ण बन सकते हैं.