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प्रियंका गांधी की सक्रियता के बाद भी यूपी में क्या नहीं बन पा रहा कांग्रेस का माहौल?

प्रियंका गांधी के यूपी में लगातार सक्रिय रहने के बावजूद न तो सूबे में कोई बड़ा दल कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार है और न ही जिताऊ उम्मीदवार की तलाश पूरी हो पा रही है. इतना ही नहीं कई बड़े नेता कांग्रेस के हाथ का साथ छोड़कर दूसरे दलों का दामन थाम रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस की नैया 2022 के चुनाव में कैसे पार होगी? 

प्रियंका गांधी और अजय कुमार लल्लू प्रियंका गांधी और अजय कुमार लल्लू
कुमार अभिषेक/कुबूल अहमद
  • लखनऊ/नई दिल्ली ,
  • 28 सितंबर 2021,
  • अपडेटेड 11:59 AM IST
  • प्रियंका गांधी पांच दिन के उत्तर प्रदेश दौरे पर पहुंची
  • प्रियंका का सियासी जादू 2022 में असर दिखाएगा?
  • प्रियंका के सामने कांग्रेस में जान फूंकने की बड़ी चुनौती

उत्तर प्रदेश की सियासत में तीन दशक से हाशिए पर पड़ी कांग्रेस में फिर से नई जान फूंकने के लिए पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी हरसंभव कोशिश में जुटी हैं. योगी सरकार के खिलाफ आवाज उठाने और लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए एक विपक्षी दल के नेता के तौर पर प्रियंका गांधी हर तरीका अपना रही हैं. प्रियंका के ये प्रयास क्या असर दिखा पाएंगे और क्या कांग्रेस के पक्ष में माहौल बन पाएगा, इसे लेकर सवाल हैं. 

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प्रियंका गांधी के यूपी में लगातार सक्रिय रहने के बावजूद न तो सूबे में कोई बड़ा दल कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार है और न ही जिताऊ उम्मीदवार की तलाश पूरी हो पा रही है. इतना ही नहीं कई बड़े नेता कांग्रेस के हाथ का साथ छोड़कर दूसरे दलों का दामन थाम रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस की नैया 2022 के चुनाव में कैसे पार होगी? 

प्रियंका गांधी का लखनऊ दौरा

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को पुराना मुकाम दिलाने की खातिर बड़े अभियान में लगीं पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी सोमवार को करीब दो हफ्ते के अंतराल पर फिर लखनऊ पहुंचीं. पांच दिन के लखनऊ प्रवास पर वह कांग्रेस की प्रतिज्ञा यात्रा और प्रदेश के विभिन्न शहरों में अपनी जनसभाओं को लेकर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के साथ विस्तृत चर्चा करेंगी, जिसमें उनके गोरखपुर और अयोध्या में होनी वाले कार्यक्रम की भी रूप रेखा तैयार होगी. इतना ही नहीं उनका प्रयास पार्टी संगठन के भीतर उपजे असंतोष को थामने का भी है.

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सूबे में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस को लगातार लग रहे झटकों के बीच में भी प्रियंका की कोशिश है कि वह पार्टी की चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ाएं. जितिन प्रसाद के कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने के बाद मिर्जापुर की मड़िहान सीट के पूर्व विधायक व प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष रहे ललितेशपति त्रिपाठी ने भी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. ऐसे में प्रियंका कांग्रेस संगठन के अंतर्कलह से भी पार पाने की कोशिश करेंगी और लखनऊ प्रवास के दौरान वह कुछ पुराने नेताओं व पदाधिकारियों से भी बातचीत करेंगी. 

प्रियंका के आने से कांग्रेस सक्रिय हुई

कांग्रेस के प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं कि प्रियंका गांधी के आने से कार्यकर्ता उत्साहित हैं. प्रियंका के सक्रिय होने के चलते हमारे कार्यकर्ताओं का गांव-गांव तक पांव-पांव चला गया है. सूबे में हमारा संगठन बूथ स्तर पर तैयार है और कार्यकर्ता गांव की न्याय पंचायत तक पहुंच चुके हैं. आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस यूपी की सभी सीटों पर प्रियंका गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है और हम आने वाले चुनाव में सुखद परिणाम देंगे. निश्चित तौर पर प्रियंका गांधी के यूपी आने से जनता और कार्यकर्ता उत्साहित है, क्योंकि पार्टी नेतृत्व करने वाला एक नेता हमें मिल गया. प्रियंका खुद भी यूपी में जमीन पर उतरकर पार्टी का माहौल बनाने का काम करेंगी. 

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प्रियंका 2019 में ही फेल हो चुकी हैं-बीजेपी

वहीं, बीजेपी नेता नवीन श्रीवास्तव कहते हैं कि प्रियंका गांधी 2019 के लोकसभा चुनाव में ही फेल हो चुकी हैं. प्रियंका के आने के कोई फर्क नहीं पड़ रहा है बल्कि लगातार कांग्रेस सिमटती जा रही है. कांग्रेस की सीटें घट रही हैं और नेता पार्टी छोड़ रहे हैं. प्रियंका गांधी जब 2019 में प्रभारी के रूप में यूपी आई तो कांग्रेस का गढ़ और परंपरागत सीट कही जाने वाला अमेठी भी वह हार गईं. प्रियंका गांधी का कोई जादू यूपी में नहीं चल रहा है सिर्फ और सिर्फ वह राजनैतिक पर्यटन के लिए उत्तर प्रदेश आती हैं. 

यूपी में कांग्रेस तीन दशक से सत्ता से बाहर है

बता दें कि प्रियंका गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कांग्रेस का मुकाबला सत्ता में बैठी बीजेपी से ही सिर्फ नहीं है बल्कि उस सपा व बसपा से भी है जिसने सत्ता में आने के बाद अपने समर्थकों के इतने काम तो किए ही हैं कि वे अब बूथ स्तर तक अपनी पार्टी के लिए खुलकर डटे नजर आते हैं. हालांकि, तीन दशक पहले तक यूपी में कांग्रेस की भी उतनी ही मजबूत स्थिति हुआ करती थी, जैसी आज बीजेपी की है.

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2019 में प्रियंका गांधी के सूबे की कमान संभालने के बाद कांग्रेस का संगठन जमीनी स्तर पर तो मजबूत हुआ है, लेकिन बदले हुए सियासी माहौल में उनका जादू अपना असर नहीं छोड़ पा रहा. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि 90 के दशक में मंडल और कमंडल की राजनीति के चलते कांग्रेस का कोर वोटबैंक रहे दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण पूरी तरह से पार्टी से दूर हो चुके हैं. 

कांग्रेस का मुस्लिम वोटबैंक अब सपा के साथ

एक जमाने में कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक समझा जाने वाला 20 फीसदी मुसलमान अब अखिलेश यादव की सपा को पहली पसंद के रूप में देखता है. वहीं, अगर दलितों व अति पिछड़ों की बात करें तो कमोबेश वो अभी तक मायावती की बसपा को ही अपना खैरख्वाह समझते आए हैं. लेकिन, पिछले तीन चुनावों में बीजेपी ने छोटे दलों के साथ मिलकर ऐसी रणनीति बनाई कि अब वो भी बसपा से काफी हद तक छिटक चुका है. ब्राह्मण वोटर पहले से ही बीजेपी के साथ है. यही वजह है कि प्रियंका गांधी की सक्रियता के बाद भी कांग्रेस का माहौल नहीं बनता नजर आ रहा. 

यूपी में बीजेपी का विकल्प बनती सपा

सपा नेता व पूर्व मंत्री रविदास मेहरोत्रा कहते हैं कि यूपी में कांग्रेस का कोई जनाधार नहीं है. प्रियंका गांधी चाहे जितना भी यूपी का दौरा कर लें, लेकिन कांग्रेस में जान नहीं फूंक सकती हैं. यूपी में बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिए सिर्फ सपा ही सक्षम है. सूबे की जनता भी इस बात को समझ रही है और अखिलेश यादव की तरफ उम्मीद भरी नजर से देख रही है. यूपी की राजनीति में प्रियंका गांधी का कभी कोई जादू नहीं है और न ही उनका कोई असर है. प्रियंका गांधी ने कभी संघर्ष नहीं किया. प्रियंका गांधी यूपी राज्य का दौरा इसलिए भी कर रही हैं ताकि किसी तरह से हर जिलों से प्रत्याशी को खड़ा किया जा सके. 

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