
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के अंतिम यानि सातवें चरण में 9 जिलों की 54 सीटों पर आज (सोमवार) वोटिंग जारी है, जहां पर 613 उम्मीदवार की साख दांव पर है. आजमगढ़ से वाराणसी तक पूर्वांचल के जिन 9 जिलों में चुनाव हो रहे हैं, वहां पर सारे मुद्दों पर जातिगत समीकरण हमेशा प्रभावी रहा है. बीजेपी, सपा, बसपा और कांग्रेस ही नहीं बल्कि जातीय आधार वाले छोटे दल की भी असल परीक्षा होनी है. ऐसे में सवाल उठता है कि अपना दल (एस), सुभासपा, जनवादी पार्टी और निषाद पार्टी क्या फाइनल चरण में गेमचेंजर साबित होगी?
यूपी चुनाव का आखिरी चरण इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि असली परीक्षा मुख्य दलों के साथ-साथ उन छोटे दलों की है, जिन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई कहानी लिखनी शुरू की. छोटे दलों की ताकत पूर्वांचल में 2017 के चुनाव में उभरकर सामने आई. 2017 विधानसभा चुनाव के नतीजे कम से कम यही तस्दीक करते हैं.
सातवें चरण की जिन 54 सीटों पर चुनाव होने हैं उनमें इस वक़्त अपना दल (एस) के पास चार, सुभासपा के पास तीन, और निषाद पार्टी के पास एक सीट है. असली परीक्षा तो इन छोटे दलों की है, जिसमें संजय चौहान की जनवादी पार्टी और कृष्णा पटेल की अपना दल की सियासी ताकत की जोर आजमाइश भी है.
ओमप्रकाश राजभर की असल परीक्षा
पिछले चुनाव में बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा इस बार सपा के साथ मिलकर चुनावी मैदान में है. ओमप्रकाश राजभर के कंधों पर सपा का बेड़ा पार लगाने की बड़ी जिम्मेदारी है. सुभासपा ने 18 सीटों पर इस बार चुनाव लड़ा है, जिनमें से ज्यादातर सीटें पूर्वांचल के इलाके की हैं. इस चरण में सुभासपा की असल परीक्षा है. सातवें चरण की 54 में से 9 सीटों पर सुभासपा ने अपने प्रत्याशी उतारे हैं, जो गाजीपुर, मऊ, वाराणसी और चंदौली जिले की सीटों पर किस्मत आजमा रहे हैं.
ओमप्रकाश राजभर को पूर्वांचल में निषाद पार्टी और अपना दल (एस) से कड़ी लड़ाई लड़नी पड़ रही. इस बार ओमप्रकाश और उनके बेटे अरविंद राजभर दोनों ही चुनाव मैदान में हैं. इसके अलावा राजभर ने जिस तरह से आक्रामक रुख पूरे चुनाव में अपना रखा है, जिसके चलते उन्हें खुद को साबित करना भी होगा. राजभर समुदाय का वोट खासकर, गाजीपुर, वाराणसी, जौनपुर, मऊ, आजमगढ़ और चंदौली में है.
सुभासपा का गठन तो 2002 में ही हो गया था, लेकिन खाता 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी से गठबंधन करने के बाद खुला. सुभासपा ने 8 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से चार पर जीत दर्ज की थी. आठों सीटों पर 34.14 फीसदी वोट मिला था. इस बार सुभासपा सपा के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ लड़ रही है. ऐसे में देखना है राजभर क्या सियासी करिश्मा दिखाते हैं.
निषाद पार्टी के सामने खुद को साबित करने का चैलेंज
डा. संजय निषाद की निषाद पार्टी की असल परीक्षा पूर्वांचल के सातवें चरण में होनी है. निषाद पार्टी पहली बार बीजेपी के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरी है और 16 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार रखे हैं, जिनमें से 4 कैंडिडेट इसी सातवें फेज में हैं. संजय निषाद के कंधों पर पिछड़ों पर अपने प्रभाव को साबित करने की जिम्मेदारी है. वाराणसी, गाजीपुर, चंदौली, मिर्जापुर और जौनपुर में निषाद समुदाय का वोटर काफी अहम है. बीजेपी ने निषाद पार्टी को राजभर की कमी की भरपाई करने के लिए साथ लिया है, जिसके चलते संजय निषाद को एमएलसी भी बनाया है और सीटें भी दी हैं. ऐसे में देखना है कि संजय निषाद अपने समाज निषाद समुदाय को बीजेपी के साथ किस तरह से जोड़ पाते हैं.
अपना दल के दोनों गुटों की होगी परीक्षा
कुर्मी समुदाय के सियासी आधार रखने वाले अपना दल दो गुटों में बंटा हुआ है, जिसमें एक धड़ा केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की अगुवाई में बीजेपी के साथ है तो दूसरा कृष्णा पटेल की नेतृत्व में सपा के साथ है. अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर से दूसरी बार सांसद हैं, जहां पर सातवें चरण में वोटिंग हो रही है. इसके अलावा अनुप्रिया पटेल पहली बार वाराणसी की रोहनिया सीट से जीतकर विधायक बनी थी, वहां पर भी चुनाव है.
2017 के चुनाव में अनुप्रिया की पार्टी 11 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसके 9 प्रत्याशी जीते थे. अपना दल (एस) को 11 सीटों पर 39.21 फीसदी वोट मिले थे. इस बार अपना दल (एस) ने 17 सीटों पर प्रत्याशी उतारे हैं. सातवें चरण की 54 में से 4 सीटों पर अपना दल (एस) का कब्जा है, लेकिन इस बार तीन सीटों पर प्रत्याशी उतार रखे हैं और अपनी जीती हुई एक सीट बीजेपी के दे दी है. अनुप्रिया के सामने अपनी पार्टी के प्रत्याशियों को जिताने के अलावा उन सीटों पर भाजपा को भी चुनाव जिताने की चुनौती होगी, जिन पर कुर्मी मतदाता अधिक हैं.
वहीं, अनुप्रिया पटेल की मां कृष्णा पटेल और बहन पल्लवी पटेल सपा के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरी है, जहां पर चौथे चरण में वोटिंग हो चुकी है. सातवें चरण में सपा उम्मीदवारों के लिए पूर्वांचल में जिताने की जिम्मा है. कृष्णा और पल्लवी की साख कुर्मी बहुल सीटों पर दांव पर है.
संजय चौहान की पार्टी का इम्तिहान
पूर्वांचल के कई जिलों में इन्हें स्थानीय भाषा में चौहान जाति को नोनिया के नाम से जाना जाता है. विशेषकर मऊ, गाजीपुर बलिया, देवरिया, कुशीनगर, आजमगढ़, महराजगंज, चंदौली, बहराइच और जौनपुर के अधिकतर विधानसभा क्षेत्रों में इनकी संख्या अच्छी खासी है. पूर्वांचल की सियासत में भले ही डेढ़ फीसदी वोट हो, लेकिन मऊ और गाजीपुर की सीटों पर बड़ी ताकत रखते हैं. नोनिया समाज के नेता डा. संजय चौहान ने जनवादी पार्टी बना रखी है, जो सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव में उतरी है. ऐसे में संजय चौहान की परीक्षा अगले दो चरणों के चुनाव में होना है.
जेडीयू और वीआईपी पार्टी की परीक्षा
बिहार की सत्ता पर काबिज जेडीयू और वीआईपी यूपी के चुनावी रण में बीजेपी के साथ दो-दो हाथ कर रही है. वीआईपी पार्टी ने यूपी की डेढ़ सौ सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार रखे हैं तो जेडीयू 26 सीटों पर चुनावी मैदान में है. वीआईपी के प्रमुख मुकेश सहनी ने पिछले दो महीने से यूपी में डेरा जमा रखा है और अपने निषाद समुदाय के दम पर सूबे में खाता खोलने के लिए बेताब हैं. वहीं, सातवें चरण में असल परीक्षा जेडीयू की भी है, जिसका आधार कुर्मी समुदाय के बीच है. जेडीयू ने ज्यादातर पूर्वांचल की सीटों पर अपने कैंडिडेट उतार रखे हैं, जिनमें सभी की निगाहें जौनपुर की मल्हानी सीट पर है, जहां से माफिया धनंजय सिंह चुनाव लड़ रहे हैं. धनंजय सिंह जेडीयू प्रत्याशी हैं और वीआईपी ने इस सीट पर उन्हें समर्थन दे रखा है.