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यूपी चुनाव: सतीश मिश्रा की साख दांव पर, ब्राह्मणों को साधने उतरा 'मिश्रा परिवार'

सूबे में ब्राह्मणों को साधने का जिम्मा बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को दे रखा है. सतीश मिश्रा के कंधों पर ये एक बड़ी जिम्मेदारी तो है ही साथ ही खुद को साबित करने की एक चुनौती भी उनके सामने है. शायद यही वजह है कि वो पूरी ताकत से ब्राह्मण समाज के बीच जा रहे हैं, यहां तक कि उनका पूरा परिवार इस मिशन में जुट गया है.

सतीश चंद्र मिश्रा और नीली शर्ट में उनके बेटे कपिल मिश्रा सतीश चंद्र मिश्रा और नीली शर्ट में उनके बेटे कपिल मिश्रा
कुमार अभिषेक/कुबूल अहमद
  • लखनऊ/नई दिल्ली ,
  • 01 सितंबर 2021,
  • अपडेटेड 11:53 AM IST
  • ब्राह्मणों को साधने का जिम्मा सतीश चंद्र मिश्रा पर
  • सतीश मिश्रा की पत्नी कल्पना मिश्रा भी मैदान में उतरीं
  • बसपा की सत्ता में वापसी 2022 में बड़ी चुनौती है

उत्तर प्रदेश में सत्ता का वनवास खत्म करने के लिए बसपा 14 साल बाद फिर से ब्राह्मण समुदाय को जोड़ने की मुहिम चला रही है. सूबे में ब्राह्मणों को साधने का जिम्मा बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को दे रखा है. सतीश मिश्रा के कंधों पर ये एक बड़ी जिम्मेदारी तो है ही साथ ही खुद को साबित करने की एक चुनौती भी उनके सामने है. शायद यही वजह है कि वो पूरी ताकत से ब्राह्मण समाज के बीच जा रहे हैं, यहां तक कि उनका पूरा परिवार इस मिशन में जुट गया है. 

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दरअसल, बसपा में फिलहाल मायावती के अलावा कोई भी बड़ा चेहरा नहीं है. बसपा के पुराने और मजबूत दलित-ओबीसी समाज के नेता मायावती के रवैये की वजह से पार्टी छोड़ चुके हैं या फिर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. बीएसपी में जनाधार वाले चुनिंदा नेता ही बचे हैं. इतना ही नहीं दलित समुदाय का एक बड़ा वर्ग भी बसपा से छिटककर दूसरी पार्टियों में शिफ्ट हो गया है. ऐसे में सतीश चंद्र मिश्रा को आगे कर मायावती ने सियासी ब्रह्मास्त्र चला है. 

ब्राह्मण समाज के बीच जा रहे पत्नी और बेटा

यूपी में 2022 की चुनावी लड़ाई में अभी तक कमजोर मानी जा रही मायावती ने सतीश मिश्रा के कंधों पर ब्राह्मणों को जोड़ने का जिम्मा डाल दिया है. यही वजह है कि सतीश चंद्र मिश्रा के साथ अब उनकी जीवनसंगिनी कल्पना मिश्रा और उनके बेटे कपिल मिश्रा भी ब्राह्मणों को समझाने की मुहिम में जुट गए हैं. इससे साफ जाहिर होता है कि सतीश चंद्र मिश्रा की इस बार किस तरह राजनीतिक साख दांव पर लगी है. 

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मायावती को पांचवी बार यूपी का मुख्यमंत्री बनाने का मकसद लेकर बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने ब्राह्मण सम्मेलन का आगाज जुलाई के आखिर में अयोध्या में रामलला के दर्शन से किया था, जिसके बाद से अभी तक सूबे में 60 से ज्यादा जिलों में वो प्रबुद्ध सम्मेलन को संबोधित कर चुके हैं. वो एक दिन में कम से कम दो ब्राह्मण सम्मेलन के कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं. यूपी के सभी 75 जिलों में जाने का कार्यक्रम बना रखा है. 

सतीश मिश्रा की पत्नी ने उठाए महिलाओं के मुद्दे

सतीश चंद्र मिश्रा की पत्नी कल्पना मिश्रा और उनके बेटे कपिल मिश्रा भी बसपा के ब्राह्मण एजेंडे को धार देने के लिए मैदान में उतर गए हैं. कल्पना मिश्रा ने ब्राह्मण महिला प्रबुद्ध सम्मेलन के तहत 300 महिलाओं को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि पत्नी होने के नाते उनका (कल्पना) भी नैतिक कर्तव्य है कि यथाशक्ति सहयोग करें. 

कल्पना मिश्रा ने कहा कि सबने मायावती का शासनकाल देखा है कि जहां हमारी बहन-बेटियों और बहनों को आवश्यकता पड़ने पर देर रात भी घर से निकलने में कोई हिचक नहीं होती थी. वह निडर होकर अपना सभी काम करती थीं. मौजूदा बीजेपी सरकार में हमारी बहू-बेटियां अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रही हैं. उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि ब्राह्मण समाज के तमाम लोगों की एनकाउंटर के नाम पर हत्या कर दी जा रही है. उनके परिवार में मां-बाप, पत्नी और उनके बच्चों को कोई पूछने वाला नहीं है. 

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कंधे से कंधा मिलाकर खड़े कपिल मिश्रा

बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा यूपी में जहां-जहां ब्राह्मण सम्मेलन करने जा रहे हैं, वहां पर एक युवा लड़का उनके साथ नजर आता है. यह कोई और नहीं सतीश चंद्र मिश्रा के बेटे कपिल मिश्रा हैं, जो उनके बगल में खड़े रहते हैं. माना जा रहा है कि सतीश मिश्रा अपने बेटे को ब्राह्मण सम्मेलन के बहाने समाज के बीच उनका परिचय भी करा रहे हैं. वहीं, सतीश मिश्रा ने अपने पूरे परिवार को मैदान में उतारकर मायावती को भी संदेश दे दिया है कि वो पार्टी को सत्ता में लाने के लिए किस तरह से जुटे हैं.  

दरअसल, 2012 के बाद से बसपा का जनाधार जिस तरह से खिसका है, शायद उसी के चलते मायावती ने ब्राह्मणों को साधने की योजना बनाई है. राजनैतिक विश्लेषक सैय्यद कासिम कहते हैं कि नरेंद्र मोदी के केंद्र की सत्ता में आने के बाद से गैर-जाटव दलितों के बीच बीजेपी ने मजबूत पकड़ बनाई है. इधर, ब्राह्मण की बीजेपी से नाराजगी का फायदा उठाने के लिए मायावती ने सतीश मिश्रा को आगे किया है, लेकिन 2007 में और 2022 में बहुत वक्त गुजर चुका और सियासत भी बदल चुकी है. 

वह कहते हैं कि मायावती ने इस बार जिस तरह से सिर्फ ब्राह्मण कार्ड खुलकर खेला है और सतीश मिश्रा को कमान सौंपी है, अगर मिश्रा बसपा को जिताने में कामयाब नहीं रहते हैं तो हार का सारा ठीकरा भी उन्हीं के सिर फूटेगा. इस बात को सतीश मिश्रा बेहतर समझ रहे हैं और इसीलिए उन्होंने पूरे परिवार को मैदान में उतार दिया है. पहले भी ब्राह्मणों को जोड़ने का यह पूरा ताना-बाना सतीश चंद्र मिश्रा ने तैयार किया था, लेकिन इस बार चुनौती काफी अलग है. अब देखने वाली बात यह होगी कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में बसपा की ये सोशल इंजीनियरिंग क्या असर दिखाती है. 

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