
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (UP election 2022) के दूसरे चरण में 9 जिलों की 55 सीटों पर सोमवार को 62.82 फीसदी मतदान हुआ. दूसरे चरण में कुल 586 उम्मीदवारों की किस्मत दांव पर लगी है. इस चरण में कई दिग्गज नेताओं के बेटे-बेटियां भी चुनाव लड़ रहे हैं. ऐसे में किसी के सामने अपने दादा की विरासत बचाने की चुनौती है तो किसी के सामने अपने पिता की राजनीतिक साख को बरकरार रखने की चिंता है.
नवाब परिवार की साख दांव पर
रामपुर विधानसभा सीट पर नवाब परिवार की साख दांव पर लगी है. जेल में बंद सपा नेता आजम खान रामपुर सीट पर एक बार फिर से चुनावी मैदान में है, जिनके खिलाफ रामपुर के नवाब काजिम अली ताल ठोक रहे हैं. बीजेपी से आकाश सक्सेना और बसपा से सदाकत हुसैन उम्मीदवार हैं. देश की स्वतंत्रता के वक्त रजा अली खान बहादुर रामपुर के नवाब थे. काजिम अली खान उनके पोते हैं. कांग्रेस के टिकट पर नवाब काजिम अली के माता-पिता ने 7 बार रामपुर लोकसभा सीट से सांसद रहे हैं. नवाब काजिम अली चार बार विधायक रहे हैं, लेकिन 2017 से उनके परिवार का कोई सदस्य न तो विधायक है और न ही सांसद.
रामपुर स्वार टांडा विधानसभा सीट पर आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम खान एक फिर से सपा से चुनाव मैदान में उतरे हैं, जिनके खिलाफ बीजेपी की सहयोगी अपना दल (एस) से नवाब काजिम अली खान के बेटे हैदर अली खान चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं, बसपा से शकंरपाल और कांग्रेस ने राम रक्षपाल सिंह उम्मीदवार हैं. 2017 के चुनाव में अब्दुल्ला आजम ने नवाब काजिम अली का मात देकर विधायक बने थे. इस बार अपने पिता की सियासी विरासत को दोबारा से हासिल करने के लिए हैदर अली चुनावी मैदान में है. वहीं, आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम खान भी दोबारा से विधायक बनने के लिए चुनावी मैदान में है, पिछली बार उम्र को छिपाने के मामले में कोर्ट ने उन्हें अयोग्य कर दिया था.
काजी परिवार की विरासत बचाने की जंग
सहारनपुर की सियासत में काजी रशीद मसूद परिवार का लंबे समय तक सियासी कब्जा रहा है. काजी रशीद मसूद सांसद से लेकर केंद्र में मंत्री तक रहे, लेकिन बदले हुए राजनीतिक समीकरण में उनका सियासी वर्चस्व धीरे-धीरे खत्म हो गया. ऐसे में काजी रशीद मसूद के बेटे नोमान मसूद अपने परिवार की सियासी विरासत को बचाने के लिए गंगोह सीट से बसपा के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे हैं. नोमान मसूद के खिलाफ बीजेपी से कीरत सिंह गुर्जर, सपा से इंद्रसेन और कांग्रेस से अशोक सैनी किस्मत आजमा रहे हैं.
कार्तिकेय के सामने पिता की विरासत
सहारनपुर जिले की देवबंद सीट पर सपा के टिकट पर उतरे कार्तिकेय राणा के सामने अपने पिता पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह राणा की सियासी विरासत को दोबारा पाने की है. कार्तिकेय राणा के पिता राजेंद्र राणा दो बार देवबंद सीट से विधायक रहे हैं. वो 2002 में बसपा के टिकट विधायक बने थे, लेकिन सपा में चले गए थे और मुलायम सिंह यादव सरकार में मंत्री बनाए गए थे. 2012 में राजेंद्र राणा देवबंद से सपा के टिकट पर फिर से विधायक चुने गए और अखिलेश सरकार में मंत्री बनाए गए. 2016 में राजेंद्र राणा का निधन हो गया था तब से यह सीट उनके परिवार से बाहर चली गई .राजेंद्र सिंह राणा के बेटे कार्तिकेय राणा उतरे हैं, जिनके खिलाफ बीजेपी से मौजूदा विधायक बृजेश सिंह रावत, बसपा से राजेंद्र सिंह हैं और कांग्रेस से राहत खलील हैं.
शफीकुर्रहमान बर्क के पोते मैदान में
मुरादाबाद जिले की कुंदरकी विधानसभा सीट पर सपा के टिकट पर जियाउर्रहमान बर्क चुनावी मैदान में उतरे हैं, जो संभल के सांसद शफीकुर्रहान बर्क के पोते हैं. शफीकुर्रहमान के बेटे और पोते कई बार चुनावी मैदान में उतर चुके हैं, लेकिन अभी तक जीत नहीं मिल सकी है. ऐसे में बर्क परिवार की सियासत विरासत को बचाने के लिए सीट बदली है और कंदरकी सीट से उतरे हैं, जहां से मो. रिजवान लगातार विधायक हो रहे थे. सपा ने रिजवान का टिकट काटकर जियाउर्रहमान को उतारा तो रिजवान बसपा से ताल ठोक दिया है. बीजेपी ने कमल प्रजापति और कांग्रेस ने दरख्शां एहसान को उतारा है. 3 मुस्लिमों के बीच सियासी जंग है.
कटरा में वीर विक्रम सिंह की चुनौती
शाहजहांपुर जिले की कटरा विधानसभा सीट पर वीर विक्रम सिंह (प्रिंस) एक बार फिर से चुनावी मैदान में उतरे हैं, उनके पिता वीरेंद्र प्रताप सिंह कांग्रेस से विधायक हुआ करते थे. विक्रम सिंह 2017 में अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उतरे और जीतकर विधानसभा पहुंचे. इस बार फिर से उतरे हैं, जिनके खिलाफ सपा से राजेश यादव, बसपा से राजेश कश्यप और कांग्रेस से मुन्ना सिंह चुनावी ताल ठोक रहे हैं. वीर विक्रम सिंह के सबसे बड़ी चुनौती उनके परिवार से ही मिल रही है, उनके चचेरे भाई सूर्य प्रताप सिंह उर्फ सूर्या भैया बागी रुख अपनाए हुए हैं.
बदायूं में विरासत बचाने की चिंता
बदायूं जिले की कई विधानसभा सीट पर नेताओं के बेटे चुनावी मैदान में उतरे हैं, जो अपने परिवार की सियासी विरासत बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. सहसवान सीट पर राष्ट्रीय परिवर्तन दल से उतरे कुणाल यादव के सामने अपने पिता पूर्व विधायक व बाहुबली नेता डीपी यादव की सियासी विरासत बचाने की चुनौती है. कुणाल यादव के खिलाफ बीजेपी से डीके भारद्वाज, सपा से बृजेश यादव, बसपा से हाजी मुसर्रत अली और कांग्रेस से राजवीर सिंह मैदान में है. बृजेश यादव के पिता ओमकार सिंह यादव विधायक और मंत्री रह चुके हैं. वहीं, बिल्सी विधानसभा सीट पर महान दल के अध्यक्ष केशव देव मौर्य के बेटे चंद्र प्रकाश यादव सपा के टिकट पर चुनावी मैदान में है, जिनके खिलाफ बीजेपी से हरीश चंद्र, बसपा से ममता शाक्य और कांग्रेस से अंकित चौहान उतरे हैं.
शेखुपर सीट पर सपा से हिंमाशू यादव सपा से चुनावी मैदान में उतरे हैं, उनके पिता आशीष यादव 2012 में विधायक रह चुके हैं. आशीष यादव को राजनीति अपने पिता बनवारी सिंह यादव से विरासत में मिली थी. उन्होंने भी राजनीतिक विरासत अपने बेटे हिमाशूं को सौंप दी है तो दातागंज विधानसभा सीट पर कैप्टन अर्जुन यादव चुनावी मैदान में उतरे हैं, जिनकी मां चेतना सिंह यादव पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष हैं. वहीं, बरेली की कई सीटों पर सियासी विरासत बचाने के लिए दिग्गज नेताओं के परिवार के सदस्य उतरे हैं.