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उत्तराखंड: जहां सिर्फ ब्राह्मण-ठाकुर जाति वाले CM बने, कांग्रेस क्यों खेल रही दलित कार्ड?

उत्तराखंड की राजनीति में ब्राह्मण-ठाकुर वाला फैक्टर हमेशा से हावी रहा है. चाहे बीजेपी हो या फिर कांग्रेस, दोनों ही दल इस समीकरण को हमेशा साधना चाहते हैं. लेकिन इस बार देश की सबसे पुरानी पार्टी ने दलित कार्ड चला है, क्या है मायने, जानते हैं.

कांग्रेस नेता हरीश रावत कांग्रेस नेता हरीश रावत
सुधांशु माहेश्वरी
  • नई दिल्ली,
  • 10 फरवरी 2022,
  • अपडेटेड 3:35 PM IST
  • कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में सक्रिय दलित फैक्टर
  • यशपाल आर्य की कांग्रेस वापसी से बदले समीकरण
  • 22 साल से ठाकुर-ब्राह्मण वाली राजनीति हावी

उत्तराखंड की सत्ता पर कांग्रेस और बीजेपी का ही कब्जा रहा है. दोनों ही पार्टियों ने मुख्यमंत्री पद के लिए किसी 'ठाकुर' पर विश्वास जताया है या फिर 'ब्राह्मण' को अपनी पसंद माना है. राज्य में पिछले 22 साल से यही ट्रेंड देखने को मिला है. सूबे में चुनाव कोई भी रहा हो, समीकरण कितने भी बदले हों, लेकिन सत्ता की कमान ठाकुर और ब्राह्मण के हाथ में ही रही. इसका कारण भी काफी सरल है. इस पहाड़ी राज्य में 35 फीसदी ठाकुर हैं तो वहीं 25 फीसदी ब्राह्मण मतदाता रहते हैं. ऐसे में हर चुनाव में इस चुनावी गणित को साधने का प्रयास रहता है. अब देखना ये है कि 2022 के चुनाव में क्या यह ट्रेंड टूटेगा या फिर पुरानी परंपरा ही दोहराई जाएगी?

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कांग्रेस क्या देगी पहला दलित सीएम?

पिछले साल लक्सर विधानसभा क्षेत्र में परिवर्तन यात्रा को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा था कि मेरे जीवन में ऐसा भी क्षण आए जब एक गरीब शिल्पकार का बेटा उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बन सके. दलित वर्ग ने हमेशा हमारी पार्टी का साथ दिया है. उनके समर्थन की वजह से केंद्र और राज्यों में हमारी सरकार बनी है. मौका मिलेगा तो उनकी आकांक्षाओं को जरूर पूरा किया जाएगा. रावत के बयान बाद ही सियासी अटकलों तेज हो गई थीं. 

यशपाल आर्य की घर वापसी, क्या मायने?

हरीश रावत के दलित सीएम के दांव के बाद ही उत्तराखंड राजनीति के सबसे बड़ा दलित चेहारा माने जाने वाले यशपाल आर्य ने भी कांग्रेस में अपनी घर वापसी की. पांच साल बीजेपी में बिताने के बाद वे कांग्रेस में शामिल हो गए. ऐसे में कांग्रेस के दलित सीएम वाले दांव को जबरदस्त मजबूती मिल गई है. अब उनके उस बयान के मायने इसलिए भी ज्यादा माने गए क्योंकि उत्तराखंड कांग्रेस के लिए वे दलित समाज के सबसे बड़ा चेहरा हैं. 

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हालांकि, कहा जा रहा है कि सूबे में कांग्रेस वापसी करती है तो एक बार फिर हरीश रावत के सिर पर सीएम का ताज सज सकता है. वहीं, हरीश रावत अगर दलित सीएम पर कायम रहते हैं तो ऐसे में वे खुद ही इस रेस से बाहर हो जाएंगे, लेकिन यह तो चुनाव नतीजे के बाद ही पता चल सकेगा. 

उत्तराखंड के समीकरण क्या हैं?

उत्तराखंड के राजनीतिक समीकरण समझना भी जरूरी है क्योंकि इस राज्य ने अपने 22 साल के इतिहास में देखे जरूर ठाकुर- ब्राह्मण वाले सीएम हैं, लेकिन दलित समुदाय का हमेशा से ही निर्णायक वोट रहा है. उत्तराखंड में अनुसूचित जाति की आबादी 18.50 फीसदी के करीब है. 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य में अनुसूचित जाति की जनसंख्या 18,92,516 है. उत्तराखंड के 11 पर्वतीय जिलों में दलित आबादी 10.14 लाख है जबकि तीन मैदानी जिलों देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में 8.78 लाख है. सूबे में सबसे सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति वर्ग की आबादी हरिद्वार जिले में 411274 है.

SC आरक्षित सीटों पर नजर

इसके अलावा राज्य की 70 विधानसभा सीटों में से 13 SC समुदाय के लिए आरक्षित रही हैं. इसमें आठ सीटें तो गढ़वाल क्षेत्र से आती हैं, वहीं पांच सीटें कुमाऊं क्षेत्र से निकलती हैं. ऐसे में उत्तराखंड की पुरोला, थराली, घनशाली, राजपुर रोड, ज्वालापुर, भगवानपुर, झबरेड़ा, पौड़ी, गंगोलीहाट, बागेश्वर, सोमेश्वर, नैनीताल, बाजपुर सीट SC समुदाय के लिए आरक्षित हैं. 2017 में जब बीजेपी को यशपाल आर्य का पूरा साथ मिला था, तब इन्हीं 13 सीटों पर पार्टी को जबरदस्त फायदा रहा था. आंकड़े बताते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में इन 13 सीटों में से 10 पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी. लेकिन अब यशपाल आर्य की घर वापसी हो गई है, ऐसे में कांग्रेस को पूरी उम्मीद है कि गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र में पार्टी पिछले चुनाव की तुलना में ज्यादा अच्छा प्रदर्शन करेगी.

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वैसे इन आरक्षित सीटों पर जो वोटर है, वो काफी सक्रिय माना जाता है. 2002 से 2017 तक के विधानसभा चुनावों पर नजर डालें, तो इस क्षेत्र की हर सीट पर हमेशा सर्वधिक मतदान देखने को मिला है. 2002 के विधानसभा चुनाव में SC सीटों पर 56.39 फीसदी मतदान रहा था. इसके बाद 2007-2012 और फिर 2017 में ये लगातार बढ़ता गया. इस बार फिर इन 13 सीटों पर बढ़िया मतदान की उम्मीद लगाई जा रही है.

दलित वोट बैंक किसके साथ?

उत्तराखंड का ये वो सियासी समीकरण है जिस पर हर पार्टी की नजर रहती है. दलित वोट बैंक पर कांग्रेस और बसपा का ही राज रहा है. 2017 के चुनाव में जरूर बीजेपी ने इसमें बड़ी सेंधमारी की थी. दलित वोटबैंक को लेकर त्रिकोणीय भिड़ंत दिख रही. 2007 के विधानसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो बसपा ने दलित वोट के दम पर 8 सीटें जीती थीं. तब पार्टी का वोट शेयर 11.76 फीसदी रहा था. फिर 2012 में पार्टी की सीटें जरूर 3 रह गईं, लेकिन वोट शेयर 12.28 फीसदी पर पहुंच गया. 2017 में बसपा खाता भी नहीं खोल सकी थी. 

सूबे में बसपा का सियासी ग्राफ डाउन हुआ है. कांग्रेस दलित सीएम का दांव चलकर इस समुदाय के बीच अपनी उपस्थिति को मजबूत करना चाहती है. कांग्रेस की यह रणनीति सफल होती है तो सत्ता में आने की राह आसान हो सकती है. सांसद प्रदीप टम्टा और यशपाल आर्य  को छोड़कर कांग्रेस के पास कद्दावर दलित चेहरे नहीं हैं. दोनों ही पहाड़ी राज्य के बड़े नेता हैं, कई चुनाव जीत चुके हैं. अब अगर दलित दांव चला गया है तो इन चेहरों की अहम भूमिका हो सकती है. 

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AAP से कांग्रेस का दलित कनेक्शन

उत्तराखंड का चुनाव इस बार त्रिकोणीय माना जा रहा है. बसपा के सियासी ग्राफ डाउन होने के बाद आम आदमी पार्टी ने तेजी से अपने पैर पसारे हैं. खुद को एक विकल्प के तौर पर पेश करने वाली आम आदमी पार्टी ने दलिट वोटबैंक साधने की तैयारी में है. वहीं, बसपा भी अपने पुरानी रणनीति के तहत दलित-मुस्लिम के गठजोड़ के साथ आगे बढ़ रही है. मैदानी जिलों में दलितों और मुसलमानों की आबादी लगभग 50 फीसदी के करीब है और 22 सीटों पर उनकी निर्णायक है. ऐसे में इन दोनों ही पार्टियों की सक्रियता से माना जा रहा है कि कांग्रेस ने भी दलित कार्ड चला है. 

कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई भी वजह

उत्तराखंड कांग्रेस में एक अंदरूनी लड़ाई भी चल रही है जिसने हरीश रावत को दलित कार्ड चलने पर मजबूर कर दिया. ये बात किसी से नहीं छिपी है कि उत्तराखंड कांग्रेस में प्रीतम सिंह 'नंबर 2' माने जाते हैं. वे खुद को सीएम दावेदार के तौर पर देखते हैं. लेकिन उनकी कुर्सी के बीच में सबसे बड़ी रुकावट हरीश रावत हैं, जिनके साथ उनके रिश्ते जगजाहिर हैं. कांग्रेस ने इसीलिए किसी भी चेहरे के सीएम कैंडिडेट घोषित नहीं किया बल्कि सामूहिक नेतृत्व में चुनावी मैदान में उतरी है. हरीश रावत का 'दलित सीएम' का दांव भी इसी मद्देनजर माना जा रहा है.

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लेकिन इस दलित समीकरण के बीच उत्तराखंड राजनीति में हावी अभी भी ब्राह्मण-ठाकुर वाला फैक्टर ही है. दोनों बीजेपी और कांग्रेस ने अपने जो उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, उससे साफ हो जाता है कि पहाड़ी राज्य में ब्राह्मण-ठाकुर वाली राजनीति हावी रहने वाली है. इस बार बीजेपी की तरफ से 60 फीसदी से ज्यादा ब्राह्मण-ठाकुर उम्मीदवार उतारे गए हैं, वहीं कांग्रेस ने भी 62 फीसदी से ज्यादा प्रत्याशी ठाकुर-ब्राह्मण समीकरण को ध्यान में रखकर उतारे हैं.

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