
आयुष्मान खुराना हर नए किरदार में जैसे अपने टैलेंट का एक नया लेवल बड़े पर्दे पर लेकर आते हैं. उनके किरदारों में से किसी एक को सबसे दिलचस्प कहना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन 2019 में आई 'ड्रीम गर्ल' में वो जब स्क्रीन पर लड़की की आवाज में फोन पर बतियाते नजर आए, तो जनता को खूब मजा आया.
लड़की की आवाज में फोन पर लड़कों से बात करना, रियल लाइफ में कई लोगों ने बतौर प्रैंक देखा-सुना होगा. मगर 'ड्रीम गर्ल' में आशिकों के टूटे दिलों को मरहम लगाती 'पूजा' के अवतार में आयुष्मान को इतना पसंद किया गया कि ये फिल्म अबतक उनके करियर की सबसे कमाऊ फिल्म भी है.
अब, आने वाले शुक्रवार को इसका सीक्वल 'ड्रीम गर्ल 2' थिएटर्स में रिलीज होने को तैयार है. फिल्म का ट्रेलर 2 हफ्ते पहले रिलीज किया जा चुका है. पिछली बार से कहानी आगे बढ़ाते हुए डायरेक्टर राज शांडिल्य ने इस बार सबसे नया काम ये किया है कि अबतक सिर्फ फोन पर ही रहा आयुष्मान का फीमेल अवतार 'पूजा', अब रियल में स्क्रीन पर उतर आया है. यानी इस बार आयुष्मान सिर्फ पूजा बनकर फोन पर बातें नहीं कर रहे, बल्कि लड़की के गेटअप में खुद पूजा बने नजर आ रहे हैं. बहुत लोग ट्रेलर देखकर, लड़की के रोल में उतर आने के लिए आयुष्मान की तारीफ भी कर रहे हैं. लेकिन 'ड्रीम गर्ल 2' के इस पूरे सेटअप में एक बहुत बड़ी दिक्कत है.
क्रॉस-ड्रेसिंग की बहस और हिंदी फिल्में
किसी व्यक्ति का, किसी दूसरे जेंडर से जुड़े गेटअप में तैयार होना क्रॉस-ड्रेसिंग कहा जाता है. जैसे एक पुरुष का महिला के कपड़ों में तैयार होना, या एक महिला का पुरुष की तरह तैयार होना. बहुत से ट्रांसजेंडर लोग अपनी जेंडर आइडेंटिटी को एक्सप्रेस करने के लिए क्रॉस-ड्रेसिंग करते हैं और उनके लिए ये एक इमोशनल चीज होती है. लेकिन ड्रामा या परफॉरमेंस के लिए क्रॉस-ड्रेसिंग का इतिहास बहुत पुराना है, सिनेमा से भी कहीं पुराना.
प्राचीन ग्रीस से लेकर शेक्सपियर के दौर यानी सोलहवीं शताब्दी तक में इसका जिक्र मिलता है. वेस्टर्न कल्चर में क्रॉस-ड्रेसिंग से जुड़ी एक आर्ट फॉर्म भी है, जिसे 'ड्रैग' कहा जाता है. ड्रैग का मकसद जेंडर आइडेंटिटी को तोड़कर अपनी विट या शख्सियत की मजबूती को दिखाना हो सकता है. यानी ये डिस्प्ले करना कि आपकी शख्सियत जेंडर डिफाइन करने वाले कपड़ों तक सीमित नहीं है. लेकिन इसी क्रॉस ड्रेसिंग का इस्तेमाल ऐसी कॉमेडी करने के लिए भी होता है, जिसमें भद्दापन और फूहड़ता हो सकती है. इसे कुछ हिंदी फिल्मों से समझा जा सकता है.
अमोल पालेकर की 'दायरा' (1996) में निर्मल पांडे ने एक ट्रांसवेस्टाइट (Transvestite) थिएटर एक्टर का किरदार निभाया, जो स्टेज पर महिला किरदार निभाता है. उसे एक ऐसी महिला (सोनाली कुलकर्णी) से प्यार हो जाता है जो गैंग-रेप सर्वाइवर है और अब अपनी पहचान छुपाने के लिए क्रॉस ड्रेसिंग कर के, पुरुष की तरह रहती है.
इस इमोशनल लव स्टोरी में शानदार काम करने के लिए निर्मल पांडे को फ्रांस के एक फिल्म फेस्टिवल ने, 'बेस्ट एक्ट्रेस' कैटेगरी में अवार्ड भी दिया था. इसी तरह एक उदाहरण कमल हासन का भी है. 'चाची 420' (1997) में कमल का किरदार अपनी बेटी से मिलने के लिए, चाची का गेटअप बनाता है. मराठी सिनेमा में 'जोगवा' (2009), 'नटरंग' (2010) और 'बालगन्धर्व' (2011) में क्रॉस ड्रेसिंग करने वाले पुरुषों को पूरे सम्मान के साथ, बाकी किरदारों की तरह बराबरी से ट्रीट किया गया है.
क्रॉस ड्रेसिंग को कॉमिक रिलीज के लिए इस्तेमाल करने का सबसे बड़ा उदाहरण 'लावारिस' (1981) फिल्म का 'मेरे अंगने में' गाना है. इस गाने में अमिताभ बच्चन एक पार्टी में रंग जमाने के लिए पहले सूट फिर साड़ी पहनी महिला बने नजर आते हैं. 'गोलमाल रिटर्न्स' में अजय देवगन, तुषार कपूर और श्रेयस तलपड़े क्रॉस ड्रेसिंग करते नजर आए थे.
एक महिला के रूप में तीनों जैसे दिख रहे थे उसे अजीब कहना सबसे सटीक होगा. क्रॉस ड्रेसिंग को सबसे हल्के तरीके से कॉमेडी के लिए यूज करने का आरोप 'द कपिल शर्मा शो' पर खूब लगता रहा है. इस शो पर कई बार तो महिला बने पुरुष एक्टर्स ने ऐसे एक्ट किए, जो महिलाओं के लिए बेहद भद्दे थे.
एक फिल्म में जब पुरुष किरदार क्रॉस ड्रेसिंग करते हैं, तो ये याद रखा जाना चाहिए कि उस पर्टिकुलर समय के लिए वो जो कुछ कर रहे हैं, वो एक महिला के तौर पर कर रहे हैं. इसलिए वो अगर महिलाओं के तौर-तरीकों-बर्ताव का भद्दा मजाक बनाते हैं तो ये असल में महिलाओं को अपमानजनक लगता है.
कॉमेडी के लिए स्त्री-विरोधी विजुअल लैंग्वेज का इस्तेमाल एक बेहद आलस भरा और नॉन-क्रिएटिव तरीका है. ऊपर से क्रॉस ड्रेसिंग को हल्की कॉमेडी के तौर पर दिखाया जाना ट्रांसजेंडर कम्युनिटी की भावनाओं को भी ठेस पहुंचाने वाला होता है. इस तरह देखने पर 'ड्रीम गर्ल 2' की दिक्कतें काफी बड़ी हो जाती हैं.
'ड्रीम गर्ल' से 'ड्रीम गर्ल 2' तक कैसे बदली कहानी?
पहली बार आयुष्मान ने जब बड़े पर्दे पर 'पूजा' की आवाज निकाली तो वो बेरोजगारी पर एक तंज था. 'ड्रीम गर्ल' में करम (आयुष्मान) को तमाम पढ़ाई लिखाई के बाद भी कोई नौकरी नहीं मिलती और उसके पिता पर एक बड़ा लोन है जिसे चुकाना बहुत जरूरी है. तब वो 'मीठी बातों' के जरिए फोन पर पुरुषों का दिल बहलाने वाले एक कॉल सेंटर जा पहुंचता है. जैसा कि छोटे शहरों में अक्सर होता है, रामलीला और रासलीला में महिला किरदार पुरुष निभाते हैं.
करम भी बचपन से इस तरह के किरदार निभाता आ रहा है इसलिए उसे लड़की की आवाज में बात करना आता है. इसी टैलेंट को वो अपनी बेरोजगारी दूर करने के लिए इस्तेमाल करता है. क्लाइंट्स के साथ उसकी रेपुटेशन कुछ ज्यादा अच्छी हो जाती है और वो सभी अब 'पूजा' से मिलना चाहते हैं, जिसका रियल लाइफ में कोई अस्तित्व ही नहीं है. यही कहानी में कन्फ्यूजन की जड़ बनता है और सिचुएशन कॉमेडी भरी हो जाती है.
लेकिन 'ड्रीम गर्ल 2' का ट्रेलर जो कहानी कह रहा है, वो पहली फिल्म से बिल्कुल अलग है. इस बार करम, क्रेडिट कार्ड बिल न चुका पाने जैसी वजहों के लिए पूजा बना नजर आ रहा है. उसकी गर्लफ्रेंड का पिता उसे जब कमाकर पैसे अरेंज करने को कह रहा है तब वो पूजा का रूप ही बना ले रहा है. और ट्रेलर में ही वो पूजा बनकर नाईट क्लब जैसी जगह पर डांस करता नजर आ रहा है. एक सीन में तो उसे एक रात के लिए किसी से शादी करने का ऑफर भी मिल रहा है. और वो पैसों के लिए ये करने को राजी भी हो जाता है.
सबसे बेसिक चीज तो ये है कि करम का पूजा बनकर लोगों के साथ ये सब करना अपने आप में एक फ्रॉड ज्यादा है. ऊपर से पूजा का किरदार अभी ट्रेलर में ही कई जगह कैरिकेचर भरा नजर आ रहा है. सिर्फ ट्रेलर में ही कई पुरुष किरदार, क्रॉस ड्रेसिंग कर लड़की बने आयुष्मान के पीछे जिस तरह नजर आते हैं, वो अपने आप में बहुत गलत है. जैसा कि अभी हमने ऊपर डिस्कस किया, यहां करम भले पुरुष है, लेकिन पूजा बनने के बाद वो महिला है. क्या एक महिला को पूजा जैसे हाल में बड़े पर्दे पर दिखाया जाना 'बैड टेस्ट' में नहीं आता?
ट्रेलर में ही पूजा को एक लड़के से शादी के बाद, सुहागरात की सिचुएशन में दिखाया गया है. पूजा, जो असल में तो करम है, डरी-सहमी है कि ये लड़का उसके साथ जाने क्या करेगा. क्या इस तरह की सिचुएशन में किसी महिला किरदार को स्क्रीन पर इमेजिन किया जा सकता है?
'ड्रीम गर्ल' में जैसे पूजा सिर्फ एक आवाज थी, वैसी सिचुएशन में सीक्वल के लिए भी बहुत क्रिएटिव प्लॉट सोचे जा सकते थे. लेकिन क्रॉस ड्रेसिंग को थिएटर में कॉमेडी के लिए इस्तेमाल करने से बचा जा सकता था. क्रॉस ड्रेसिंग आर्ट को जेंडर की बाउंड्रीज से मुक्त तो करता है, लेकिन इसे अगर सावधानी से डील न किया जाए तो ये बहुत डिस्टर्बिंग भी हो जाता है. ट्रेलर से तो 'ड्रीम गर्ल 2' की कहानी, इस लकीर के उस तरफ नजर आती है. अब देखना ये है कि फिल्म में पूरे नैरेटिव के साथ ये मामला कैसा लगता है.
हो सकता है बड़े पर्दे पर आयुष्मान के इस एक्ट को जस्टिफाई करने के लिए फिल्म में आपको कोई मैसेज टाइप सीन मिले. शायद 'ड्रीम गर्ल 2' के अंत में आयुष्मान का किरदार कहे कि एक महिला बनकर उसने जो कुछ महसूस किया, उससे समझ आया कि मर्दों ने महिलाओं के लिए माहौल कितना भयानक बना रखा है. लेकिन क्या इससे, उनका स्क्रीन पर महिला बनकर ऐसा कुछ करना जस्टिफाई हो जाएगा, जो महिलाओं का ऐसा मजाक बनाता हो? देखते हैं, फिल्म इस सवाल का कोई जवाब दे भी पाती है या सबकुछ बस 'एक फिल्म ही तो है' मोड में एक बार फिर से सह लिया जाएगा!