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Budget 2022:'फायर' की उम्मीद थी, बॉलीवुड के लिए 'फ्लावर' निकला निर्मला का बजट!

कोरोना की वजह से लगे लॉकडाउन में पिछले दो सालों से इंडस्ट्री आर्थिक नुकसान झेल रही है. लगातार शूटिंग रद्द और थिएटर खुलने को लेकर कंफ्यूजन ने कई मेकर्स को करोड़ों का नुकसान पहुंचाया है. ऐसे में इस साल बजट से इंडस्ट्री के लोगों को काफी उम्मीदें थीं.

शूटिंग सेट शूटिंग सेट
नेहा वर्मा
  • मुंबई,
  • 01 फरवरी 2022,
  • अपडेटेड 1:45 PM IST
  • एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के लिए भी इस साल बजट में कुछ नहीं
  • पिछले दो सालों से भारी आर्थिक मंदी से गुजर रही है एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री

पिछले दो सालों से आर्थिक तंगी झेल रही फिल्म इंडस्ट्री इस साल बजट से काफी उम्मीदें लगा बैठी थी. एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का मानना था कि पिछले दो सालों में रहे नुकसान को देखते हुए शायद सरकार उनके फेवर में कुछ स्पेशल अनाउंसमेंट करेगी. हालांकि बजट सुनने के बाद इंडस्ट्री निराश है.

ऐसे में पुष्पा फिल्म का यह फेमस डायलॉग सटिक बैठता है कि इस साल के बजट में फायर की उम्मीद लिए बैठे बॉलीवुड वालों को फ्लावर मिला है. आजतक डॉट इन से वर्कर्स और प्रोड्यूसर एसोसिएशन ने अपनी निराशा जाहिर की है. 

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बजट में अक्सर एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को किया जाता है नजरअंदाज - बीएन तिवारी

Federation of Western India Cine Employees (FWICE) के प्रेसिडेंट बीएन तिवारी का कहना है, बजट में अक्सर बॉलीवुड इंडस्ट्री को नजरअंदाज कर दिया जाता है. शायद ही कभी फिल्म इंडस्ट्री के फायदे पर कोई बजट रहा हो. मैं चाहता हूं कि हमारे वर्कर्स के लिए सोचें और उनके लिए कुछ करें. हमारे जितने भी अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर हैं, उसके लिए कोई न कोई सुविधा होनी चाहिए, जिस पर अभी तक ध्यान नहीं दिया गया है. न सेंट्रल और न ही स्टेट गर्वनमेंट ने फिल्म इंडस्ट्री का सोचा है. इस साल कहीं, तो हमारा जिक्र हो. लेबर कोर्ट जो बना है, उसमें हमारे वर्कर्स के बारे में सोचा जाए और उनके लिए कुछ किया जाए. इस कोरोना के दौरान हमारे कितने वर्कर्स बेरोजगार हो गए और कितनों ने तो भुखमरी से अपनी जान गंवा दी. आज भी 50 प्रतिशत लोग बेरोजगार बैठे हैं, जैसे-तैसे काम चला रहे हैं. उनके लिए कोई सुविधा नहीं है. सरकार हर बार बजट निकालती है, पता नहीं किसके लिए बनाती है. हमलोग भी इसी देश में रहते हैं और टैक्स भी देते हैं. सरकार को लगता है कि फिल्म इंडस्ट्री का मतलब बस बड़े-बड़े हीरो-हीरोइन ही हैं, जो वर्कर्स हैं उनके बारे में वे जानते ही नहीं हैं. सरकार से दरख्वास्त है कि वे जानें कि जो इंडस्ट्री का बैकबोन हैं, कैमरे के पीछे काम करने वाले लोग, वो अभी तकलीफ में हैं. उनके हक के लिए सोचा जाए.

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तिवारी आगे कहते हैं, इस कोरोना ने इंडस्ट्री को बहुत नुकसान पहुंचाया है. मैं चाहता था कि हमारे वर्कर्स की इंश्योरेंस की बात की जाए, उनके मेडीक्लेम का देखा जाए. उनके लिए वो तमाम सुविधाएं मुहैया कराई जाए, तो उन्हें इस तरह की महामारी में संभलने का मौका मिले. उनके लिए कोई फंड ही नहीं है. हमारे लिए तो कोई फंड ही नहीं होता है. जब पिछली बार जब लोगों की हेल्प के लिए बीस लाख करोड़ का बजट आया था, उसमें 20 हजार का बजट नहीं था फिल्म इंडस्ट्री के वर्कर्स के लिए. इसलिए मैं चाहता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री को भी बजट में शामिल किया जाए, यह सबसे बड़ी इंडस्ट्री है. लेकिन इस साल भी हमें पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है. हर साल मैंने प्रधानमंत्री और चीफ मिनिस्टर को लेटर भेजा है और अपनी मांगे रखी हैं. पिछले तीन साल से मांग ही तो रहा हूं और तीन रुपये तक नहीं मिले हैं. 

इस साल भी हमें दरकिनार कर दिया गया है, निराशाजनक- जेडी मजीठिया

इंडियन फिल्म्स एंड टेलीविजन प्रोड्यूसर्स काउंसिल (IFTPC)  टीवी विंग के चेयरमैन जेडी मजीठिया का कहना है, इस साल सरकार को तो हमारी तरफ ज्यादा ध्यान देना चाहिए था क्योंकि इस बार सबसे ज्यादा कोई घाटे में हैं, तो वो है, हम प्रोड्यूसर्स. सबसे ज्यादा नुकसान हम झेल रहे हैं. पिछले दो सालों में एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को भारी नुकसान हुआ है. टैक्स की बात करूं, तो इसमें थोड़ी रियायत मिलनी चाहिए थी. वहीं हम चाहते हैं कि हमें भी एक इंडस्ट्री का स्टेटस का दर्जा केवल पेपर पर ही न मिले. अब उसके एक्जीक्यूशन का वक्त है. ऐसी आपातकालीन स्थिति में हम प्रोड्यूसर्स सरवाइव नहीं कर पाते हैं. अगर इंडस्ट्री स्टेटस लागू किया जाता, तो बैंक फंडिंग और बाकी इनवेस्टमेंट्स के दौरान चीजें थोड़ी आसान हो जाएंगी. इसके अलावा बैकबोन सपोर्ट भी मिलेगा. चीजें और भी ज्यादा सेफ और सिक्योर हो जाएंगी. लेकिन हम तो बजट में कहीं थे ही नहीं.  

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1998 में मिला था इंडस्ट्री का दर्जा 

फिल्म ऐंड टेलीविजन डायरेक्टर असोसिएशन के प्रेसिडेंट अशोक पंडित का कहना है,  गर्वनमेंट को तो हम इंडस्ट्री स्टेटस के एक्जीक्यूशन को लेकर कई बार अप्रोच कर चुके हैं. बता दें, सुषमा स्वाराज के वक्त 1998 में हमें इंडस्ट्री का दर्जा मिला था. लेकिन वह महज पेपर तक रह गया है. इस साल भी बजट में इसका जिक्र नहीं किया गया है. 

इस बार के बजट में बॉलीवुड की नहीं मिला है इन्विटेशन 

IMPHA(इंफा) के प्रेसिडेंट टीपी अग्रवाल का कहना है, हैरानी की बात है कि इस साल तो हमें बजट में बुलाया ही नहीं गया है.किसी भी इंडस्ट्री बॉडी को नहीं बुलाया गया था. मतलब आपने तो हमें अपने यहां शामिल करने तक का नहीं सोचा, तो फिर बजट में क्या ही उम्मीद की जाए. यह काफी हस्यास्पद वाली स्थिती है कि आप ऐसी इंडस्ट्री को इग्नोर कर रहे हैं, जो इकोनॉमी में एक अच्छा खासा रोल प्ले करती है. खैर, इस बार का बजट केवल वोटिंग बैंक को रिझाने के लिए तैयार किया गया है. बुरा यह लगता है कि इस साल तो हमें सबसे ज्यादा सपोर्ट की जरूरत थी. इंडस्ट्री के एक्सीक्यूशन के लिए हम कई बार हम प्रपोजल भेज चुके हैं. लेकिन कभी कोई रिस्पॉन्स नहीं मिला. इंडस्ट्री स्टेटेस से हमारा स्ट्रक्चर और भी ज्यादा ऑर्गनाइज हो जाएगा. कम रेट पर इंट्रेस्ट आता है, तो उसकी कॉस्ट नीचे आती है. यहां 18-30 प्रतिशत इंट्रेस्ट पर मार्केट चलती है. पिछले दो सालों में जो बड़ी फिल्में रिलीज हुई हैं, उन्हें केवल इंट्रेस्ट के कॉस्ट में ही कितना लॉस हुआ है, उसका पता कर लें. इंडस्ट्री स्ट्रक्चर हो जाए, तो फंडिंग कंट्रोल में होगी, लॉसेस कम होते हैं. एक इंडस्ट्री का पेमेंट स्ट्रक्चर ठीक होता है. पिछले दो सालों में जितनी इंडस्ट्री को जितना नुकसान हुआ है, न इस साल हमें टैक्स में छूट मिली है और नहीं इंडस्ट्री के एक्जीक्यूशन को लेकर कोई बात कही गई है. निराशाजनक... 

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