
फिल्म निर्देशक और पटकथा लेखक चंद्रप्रकाश द्विवेदी को केंद्र सरकार ने पद्मश्री से नवाजा है. वर्ष 1991 में दूरदर्शन पर आए धारावाहिक चाणक्य के निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने चाणक्य की मुख्य भूमिका खुद ही निभाई थी. इसने उन्हें घर-घर में जाना पहचाना चेहरा बना दिया. aajtak.in ने इस मौके पर उनसे लंबी बातचीत की.
सवालः पद्मश्री के आपके लिए क्या मायने हैं और यह आपकी रचनात्मकता को कितनी संतुष्टि देता है?
चंद्रप्रकाश द्विवेदी - कई बार हमें अपने अतीत के निर्णयों पर अविश्वास होने लगता है. खुद से सवाल करने लगते हैं कि क्या हमारा निर्णय सही था? क्या हम सही दिशा में चल रहे हैं? मैं उदाहरण के तौर पर कहना चाहूंगा कि मैं लगातार पीरियड फिल्में बनाने की कोशिश कर रहा हूं. इसमें मेरे साथी कहने लगते हैं कि यार, हमारे हिंदी सिनेमा में पीरियड का कुछ नहीं होना है, तुम क्यों इसके पीछे पड़े हो. मैंने सोचा कि लव स्टोरी या थ्रिलर कहानियां तो हर तीसरा व दूसरा डायरेक्टर बनाता ही है. हालांकि अब जब देखता हूं कि दर्शकों का इतिहास के प्रति झुकाव बढ़ा है. तब जाकर लगता है कि नहीं, जिस पर मैं चल रहा था, वो रास्ता कठिन जरूर है लेकिन गलत तो बिलकुल नहीं है. वहीं इस तरह के अवॉर्ड्स जब आपको मिलते हैं, तो और कुछ सालों तक आगे बढ़ने की एनर्जी व हिम्मत देते हैं.
सवालः आपको लगता है कि अवॉर्ड्स मिलने में देरी हुई? कोई शिकायत या अफसोस
चंद्रप्रकाश द्विवेदी - जाहिर सी बात है, कई लोग मुझसे ये भी कहते हैं. मैं उन्हें कहता हूं कि देर व जल्दी यह महज परसेप्शन हैं. मैंने कहीं से यही कविता सुनी है, जिसका भावार्थ आप समझ जाएंगी, किसी को भूलने के लिए एक उम्र कम है, पर एक भूल काफी है उम्र भर रूलाने की. यह बस मोमेंट की बात है, कई बार आप एक मोमेंट में पूरी जिंदगी जी लेते हैं, तो कई बार ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, तो जिंदगी खत्म हो जाती है. रही बात देर से मिलने कि तो मैं यही कहूंगा कि देर से मिलने का फायदा यही होता है कि आपको लगने लगता है कि मैं बहुत सारा काम कर सकता हूं. अगर पहले मिल जाता, तो लगता कि आपने पा लिया, जो आपको पाना था. फिर वहां से आप संतुष्ट हो जाते हैं और जो आर्टिस्ट संतुष्ट हो गया वहीं उसकी क्रिएटिविटी खत्म हो जाती है.
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सवालः हमारा देश अपने इतिहास को लेकर सेंसेटिव रहा है. आप पृथ्वीराज चौहान की मेकिंग के दौरान लोगों के रिएक्शन भी झेल चुके हैं. बतौर क्रिएटिव पर्सन कितना प्रेशर महसूस होता है
चंद्रप्रकाश द्विवेदी - मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि हम सबकी जिम्मेदारी है कि लोगों के सामने जो सही इतिहास है, उसे ही पेश किया जाए. इतिहास होता ही मत-मतांतर का है. एक कहानी को अलग-अलग नजरिये से देखा जाता है. जब हम फिल्में बनाते हैं, तो यह एक ऐतिहासिक उपन्यास है, यानी वहां जहां कही इतिहास मौन है, वहां हम अपना क्रिएटिव फ्रीडम लेते हैं. लेकिन वो लिबर्टी भी उसी दायरे में लेकर करें, मैं ऐसा सबसे कहता हूं कि ऐसा कुछ मत करो, जो उस काल का उल्लंघन करता हो. पृ्थ्वीराज को ही उदाहरण के रूप में लें, तो इसको लेकर कई मत हैं, आप किस मत को लेंगे. जब भी आप इतिहास उठाते हैं, और उसका उद्देश्य प्रतिमा खंडन है, तो ये मान लें कि आप गलत दिशा में चल रहे हैं. क्योंकि लोगों के मन में जो बैठा हुआ है, उसे आप तोड़ नहीं सकते हैं. एक मेकर की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे लोगों के सामने ऐसी हिस्ट्री पेश करे, जिसे हम कल्पना में देखा करते हैं. मैं बिलकुल भी प्रेशर फील नहीं करता हूं. बल्कि मैं तो कहूंगा कि हमारी हिस्ट्री इतनी रोचक है कि हिंदी फिल्मों के मसाले को फेल कर दें. कहानियां ऐसी-ऐसी हैं कि लोग हैरान हो जाए लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे लोगों को अपने इतिहास में विश्वास ही नहीं है. हम भेड़चाल का हिस्सा बनना चाहते हैं, हम वेस्ट के कल्चर से खासे प्रभाव होते हैं. एक वक्त टेलीविजन की दुनिया में ऐसा आ गया था कि आप किसी भी प्रोड्यूसर के ऑफिस जाएं, तो आपसे बस गेम ऑफ थ्रोन जैसे कॉन्सेप्ट की डिमांड करते हैं. क्या आप उनकी तरह वक्त, पैसे, डेडिकेशन, रिस्क लेने को तैयार हैं. क्यों सिर्फ कहने के लिए कहते हैं, अभी भी हमारे फिल्म मेकर उससे बाहर नहीं निकले हैं.
सवालः पिछले 30 सालों में भारत में माइथॉलजी और महापुरुषों पर बहुत सी फिल्में बनने के बावजूद लोग कहते हैं मॉर्डन रिएलिटी इतनी ईमानदार नहीं है. लोग ये भी कहते हैं कि हम अपनी जमीन खोते जा रहे हैं. कल्चर, रिलीजन से दूर होते रहे हैं. आपका क्या सोचना है. क्या ये जिम्मेदारी फिल्म और टीवी की है?
चंद्रप्रकाश द्विवेदी - मैं तो इसका विपरित सोचता हूं. मैं तो हमेशा कहता हूं कि हमारे सिनेमा का दुर्भाग्य यह रहा कि मैं अपनी जमीन को खो दिया है. मैं यह नहीं कहता कि आप अपनी फिल्म को विदेश में कैसे शूट करते हैं, इसके हजारों कारण होते होंगे लेकिन सच्चाई तो यही है कि आप अमेरिका में जो शूट करते हैं, तो उसकी रिलेटिबिलिटी क्या है. पुष्पा नाम की जो फिल्म आती है, वो क्यों इतनी सक्सेसफुल है, क्योंकि उसमें जमीन की सुगंध है. आप उस फिल्म में एक कैरेक्टर को दिखाओ, जिसे हम चॉकलेट हीरो कहते हों. क्या हिंदी फिल्मों में हमें यथार्थवादी किरदार दिखते हैं, जवाब होगा नहीं. ये जमीनी कहानी, रूटेड कहानियां लोगों ने हमेशा से पसंद की है. लगान के जब पोस्टर लगे थे, तो कुछ लोगों का कहना था कि एक धोती वाले को नहीं देख सकते हैं, यहां तो 11-11 एक्टर धोती पहने हैं. फिल्म ने इतिहास रचा, हमें शर्मिंदगी होने लगी. पता नहीं हम अपने पास्ट और हमारे कल्चर को लेकर इतने अपराधबोध में क्यों हैं. हमारे पूर्वज धोती पहनते थे, तो पहनते थे. इसमें शर्म की क्या बात है. आज भी प्रोडक्शन डिजाइन की बात होती है, तो क्यों अमेरिका या वेस्ट कल्चर का रेफरेंस दिया जाता है. हम उस सभ्यता का हिस्सा नहीं हैं. अगर बाहूबली, पुष्पा जैसी फिल्मों का उत्सव मना सकते हैं, तो फिर क्यों हम रूटेड फिल्में बनाने से हिचकिचाते हैं. हम इतने वेस्ट से इंफ्लुएंस हो चुके हैं कि अपने पास्ट को लेकर शर्मिंदगी होती है. रही बात हर आर्ट फॉर्म एक मकसद के साथ आती है, हम किसी कहानी या किरदार को लेकर आते हैं, तो इसके पीछे एक मकसद होती है ताकि हम लोगों को कुछ सीखाते हुए एंटरटेन करें.
मेरा मानना है कि विश्व में जो सबसे पहला नाटक लिखा गया कि उस कहानी का सार यही था कि जिस कहानी के रचियता स्वंय ब्रह्मा जी हैं उनका भी विरोध हुआ. देवासुर संग्राम का कहना था कि उनकी कहानी में उन्हें सही नहीं दिखाया गया है. जहां-जहां शो हुए वहां दानवों ने हंगामा किया. नाट्य की परंपरा में विरोध हमेशा से रहा है लेकिन उन विरोध में संवाद रहा है, अब तो संवाद नहीं है, चारों दिशा से अभिप्राय आते हैं. ऐसे अभिप्राय, जो लॉजिकल या वेल स्डटीड नहीं होती हैं. आप बिना कुछ जाने समझे बोलते जाते हैं. उदाहरण के तौर पर जब पृथ्वीराज का टीजर आया, तो कईयों ने यह सवाल उठाया कि संयोगिता को पीछे क्यों बैठाया गया. उसे तो आगे होनी चाहिए. भई, क्या आपको नहीं लगता कि हमने इस पर विचार किया होगा. और किसी ने यह जानने की कोशिश की कि रासो ने क्या लिखा है. वे रासो पढ़ेंगे, तो उन्हें पता चलेगी कि पृथ्वीराज रासों में संयोगिता पीछे बैठी है. हो यह गया है न, बिना किसी अभ्यास, अध्ययन, चिंतन के आपके पास वाट्सऐप या सोशल मीडिया के साधन जो हैं, वो अब हथियार बन गए हैं. लोग बस इसे लेकर टूट पड़ते हैं.
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सवालः क्रिटिक कहते हैं हिंदुत्व व राष्ट्रवाद की बात होती है आजकल. सिनेमा पर ये कितना और कैसे असर डालता है?
चंद्रप्रकाश द्विवेदी - आप बताएं कि कौन सी फिल्में ऐसी हैं, जो नेशनलिस्ट हैं. वो किसी न किसी इश्यू को अड्रेस ही कर रही हैं न. दर्शक दिल से बताएं कि क्या वे फिल्में नहीं बननी चाहिए थी. यह इतनी मजेदार बात है कि एक स्क्रिप्ट चार से लिखी गई है कि टायलेट बननी चाहिए, यह कितनी मजेदार बात है कि भारत एक नागरिक नरेंद्र मोदी का इंतजार कर रहा है, जो लोगों को बताएं कि तुम्हें टायलेट की जरूरत है. उस विषय को लेकर कोई फिल्म बनाता है, तो लोग उसे नेशनलिस्ट कहने लगते हैं. आप बताएं कि यह नेशनलिस्ट भी क्यों नहीं होना चाहिए. लोग किसका एजेंडा लें, अमेरिका का या इंग्लैंड का.. लोग अपने देश के मुद्दों की बात न करें. एयरलिफ्ट में क्या एजेंडा रही होगी, उड़ी में ऐसा नहीं हुआ था. मुझे यह कहने में संकोच नहीं है कि एक वक्त था, जब रिव्यूवर आंतकित करते थे मेकर्स को. जबसे ये फेसबुक व सोशल मीडिया आया है, उन्होंने औकात दिखा दी है क्रिटिक्स को. जिसे एक या दो स्टार मिलते हैं, वैसी फिल्म बॉक्स ऑफिस के रेकॉर्ड्स तोड़ रही हैं. आपके रिव्यू का सम्मान है लेकिन आप कोई ब्रह्म वाक्य नहीं लिख रहे हैं. यह मान लें. जब मैंने चाणक्य बनाई थी, तो मुझे भी नेशनलिस्ट का आरोप लगा, मैं भाजपाई या संघी हूं. आज चाणक्य कल्ट माना जाता है.
सवालः आरोप लगते हैं कि गवर्नमेंट अपने फेवरेट लोगों को अवॉर्ड देकर फेवर करती हैं.
चंद्रप्रकाश द्विवेदी - मैं यह बात बता दूं, जब मुझे पिंजर के लिए अवॉर्ड मिला, तो उस वक्त किसकी सत्ता थी, कांग्रेस ही थी न. जब मैंने चाणक्य बनाया तो उस वक्त भी कांग्रेस की सरकार थी. मैंने उनके बीच में खड़े रहकर बनाया है. उनका विरोध झेला है. जब मैंने मोहल्ला के लिए झगड़ा किया, तो उस वक्त भाजपा की सरकार थी. मेरा कहने का मतलब यही है कि आपकी जमीन मजबूत है और आप सच बोल रहे हैं, तो कोई सरकार आपको बाध्य नहीं कर सकती है. रही बात अवॉर्ड देकर फेवर करने की, तो उसका कारण यही है कि लोग बाहर रहकर बातें कर रहे होते हैं. मैं ऐसा नहीं कहूंगा कि निर्णय प्रभावित नहीं होते हैं. मुझे एक बात बताएं, अगर किसी एक अभिनेता, निर्देशक को अगर अवॉर्ड मिल जाए, तो उनकी राजनैतिक दिशा और गतिविधी कैसे बदल जाएगी. ये जरूर होता है कि आपने जिन लोगों के साथ काम किया होता है, तो आप कोशिश करते हैं कि उन्हें एक पुरस्कार मिले लेकिन ज्यूरी में एक व्यक्ति तो होता नहीं है. कई बार लोगों ने बेशर्मी से ऐसे निर्णय लिए हैं, तो काफी कांट्रोवर्सियल भी रहे हैं. भई मेरा तो अनुभव है कि इंफोर्मेशन ऐंड ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्टर के पास इतना समय तक नहीं होता कि वे आपके डिसीजन को देखें. यह काम समिति कर रही होती है, अगर कमिटी ने कोई गलती की है, इसमें सरकार कहां से जिम्मेदार हो गई. हमारे लिए सबसे आसान है सरकार को गाली देना.