
ऋतिक रोशन की फिल्म 'फाइटर' इन दिनों थिएटर्स में है और जनता की तारीफों के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर पैर जमाए रख पाने में जूझ रही है. डायरेक्टर सिद्धार्थ आनंद की 'फाइटर', फिल्मों की उस लंबी लिस्ट में आती है जिनमें भारत को पाकिस्तानी में घुसकर ऑपरेशन करते दिखाया गया है. ऋतिक और दीपिका पादुकोण की धांसू कास्टिंग और डायरेक्शन में सिद्धार्थ आनंद जैसा जबरदस्त डायरेक्टर होने के बावजूद 'फाइटर' जिस तरह धीमी गति से थिएटर्स में चल रही है, उससे सब हैरान हैं.
'फाइटर' के ट्रेलर को जिस तरह का रिस्पॉन्स मिला था, उससे लग रहा था कि पिछले साल आई 'पठान' की तरह, ये फिल्म भी नए साल की शुरुआत में ही बॉलीवुड के कई रिकॉर्ड पलट देगी. मगर 7 दिन में किसी तरह 142 करोड़ रुपये के करीब ही पहुंच सकी इस फिल्म का हाल देखकर एक ही सवाल उठता है कि 'फाइटर' जनता को लुभा क्यों नहीं पाई? शायद इसका जवाब फिल्म की कहानी में छुपा है.
कहा जाता है कि सिनेमा या कोई भी आर्ट फॉर्म अपने समय का आईना होता है. और कश्मीर की टेंशन में पाकिस्तान का हाथ होना, कारगिल युद्ध में भारत की पाकिस्तान पर जीत, दोनों देशों के बीच बनते बिगड़ते कूटनीतिक रिश्ते, आतंकी हमलों और आतंकी संगठनों को सरहद पार से मिल रही शय ने जनता के सेंटिमेंट पर बहुत असर डाला है. यही असर सिनेमा में यूं उतरा कि पाकिस्तान से बदला ले लेना कहानियों में देशभक्ति का थर्मामीटर बन गया. लेकिन पिछले एक दशक में ये थर्मामीटर बहुत ज्यादा यूज हुआ है. इतना कि शायद अब जनता को ऐसी फिल्मों का बुखार ही नहीं रहा!
पहले भी नहीं चलीं सीधा इंडिया-पाकिस्तान करने वाली फिल्में
2004 से 2014 तक करीब 25 हिंदी फिल्में ऐसी रिलीज हुईं जिनमें भारत-पाकिस्तान-आतंकवाद-रॉ-मिशन वाला फॉर्मूला कहानी में नजर आया. मगर इनमें से जो फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सलामत बचीं, उन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता है- वीर जारा, फना, अ वेडनसडे, एक था टाइगर, हॉलिडे और हैदर. इनमें से किसी भी कहानी ने डायरेक्ट इंडिया-पाकिस्तान कनफ्लिक्ट को एड्रेस नहीं किया था.
जहां 'हैदर' ने इस कनफ्लिक्ट का लोगों पर असर दिखाने की कोशिश की थी, वहीं वीर जारा-फना-एक था टाइगर लव स्टोरीज थीं, जिनमें दोनों देशों के डिफरेंस तो थे मगर 'बदले' वाली बात नहीं थी. 'हॉलिडे' और 'अ वेडनसडे' में कनफ्लिक्ट का जिक्र तो आया, मगर इनके चलने ये आतंकवादियों को जवाब देने के बारे में ज्यादा थीं. इन दोनों फिल्मों का कॉन्सेप्ट बहुत अलग था. 'हॉलिडे' में पहली बार 'स्लीपर सेल' का जिक्र आया, तो 'अ वेडनसडे' में आतंकवाद का जवाब दे रहे एक अकेले आम आदमी की कहानी थी.
मगर एक दशक में इन गिनी-चुनी कामयाब फिल्मों के बीच इंडस्ट्री में फ्लॉप फिल्मों का भी ढेर लग गया. खासकर वो जो डायरेक्ट इंडिया-पाकिस्तान वाले फंडे पर थीं. अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों, दीवार, सरहद पार, कुर्बान, 1971 और कॉन्ट्रैक्ट जैसी तमाम फिल्में फ्लॉप रहीं.
इसी फॉर्मूले पर नए आईडिया के साथ हिट हुए अक्षय कुमार
26/11 के हमलों के बैकग्राउंड पर बनी फिल्म 'बेबी' (2015) ने एक काल्पनिक आईडिया स्क्रीन पर उतारा कि भारत की एक स्पेशल फोर्स, मुंबई हमले के मास्टरमाइंड को एक दूसरे देश में जाकर उठा सकती है. काल्पनिक इसलिए क्योंकि तबतक असलियत में ऐसा कुछ नहीं हुआ था या फिर ऐसा कुछ होने की जानकारी पब्लिक में नहीं थी.
2014 की फिल्म 'हॉलिडे' में, आर्मी ऑफिसर के रोल में नजर आए अक्षय कुमार, स्लीपर सेल वाला आईडिया कहानी में पब्लिक के सामने लेकर आए थे. 'बेबी' का आईडिया और भी ज्यादा एक्साइटिंग था और ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही. मगर इसमें इंडियन स्पेशल फोर्स का ऑपरेशन पाकिस्तान में नहीं था. 'बेबी' के कुछ महीने बाद, अगस्त 2015 में कबीर खान की फिल्म 'फैंटम' आई, जिसके हीरो सैफ अली खान पाकिस्तान में घुसकर 26/11 का बदला लेते नजर आए थे.
यही कबीर खान, एक महीने पहले 'बजरंगी भाईजान' और अपनी पिछली फिल्म 'एक था टाइगर' (2012) में, दोनों देशों में भाईचारा बढ़ाने का मैसेज देकर दो बड़ी हिट फिल्म निकाल चुके थे. मगर पाकिस्तान में घुसकर, अंडर कवर ऑपरेशन को अंजाम देने वाली 'फैंटम' फ्लॉप हो गई.
घर में घुसकर मारने वाला 'न्यू इंडिया'
2019 में आई 'उरी' भारत-पाकिस्तान वाले प्लॉट पर बनी बहुत बड़ी फिल्म है. 2016 में भारतीय सैनिकों ने, पाकिस्तानी इलाके में घुसकर, आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक की. आतंकी हमलों की खबरों को रूटीन में ला चुकी भारतीय जनता के लिए ये बिल्कुल किसी जबरदस्त थ्रिलर फिल्म जैसा मामला था. ऑपरेशन सेंसिटिव था, तो इसकी कोई इमेज सामने नहीं आई.
विक्की कौशल की 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक' ने इसी खाली जगह को भरा और जनता की इमेजिनेशन को विजुअल्स दिए. इस बात से हर फिल्म क्रिटिक सहमत था कि विक्की की फिल्म ने इस तरह के आर्मी ऑपरेशन की सारी टेक्निकल डिटेल्स को बड़ी मजबूती के साथ पर्दे पर दिखाया था. 'उरी' ने 245 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन किया और ब्लॉकबस्टर साबित हुई.
उसी बीच, सर्जिकल स्ट्राइक वाले ऑपरेशन के बाद, एक ट्रेंड ये भी शुरू हुआ कि पाकिस्तान को छकाने वाले पुराने भारतीय इंटेलिजेंस ऑपरेशन और मिशन भी बड़े पर्दे पर याद किए जाने लगे. 'द गाजी अटैक' (2017) ने पाकिस्तानी नेवी की पनडुब्बी पी.एन.एस. गाजी के रहस्यमयी तरीके से डूबने को, इंडियन ऑपरेशन का काल्पनिक ट्विस्ट देते हुए पेश किया और हिट साबित हुई.
आलिया भट्ट की 'राजी' (2018) ऐसे ही एक ऑपरेशन की कहानी थी, जिसे बॉक्स ऑफिस पर भी कामयाबी मिली. इन फिल्मों की कामयाबी से कई फिल्ममेकर्स ने शायद ये आईडिया लगाया कि कहानी में किसी तरह इंडियन इंटेलिजेंस या आर्मी को पाकिस्तान की झंड करते दिखा दिया जाए, तो फिल्म का हिट होना पक्का है. मगर इस बीच लॉकडाउन ने भी एक खेल किया.
इंडिया-पाकिस्तान करने वाले कंटेंट की बाढ़
घर में कैद हो चुके लोगों ने ओटीटी पर खूब कंटेंट देखा. 'राजी', 'उरी' जैसी थिएटर्स में रिलीज हुई फिल्में तो ओटीटी पर देखी ही गईं. मगर इसी बीच 'गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल', 'शेरशाह', 'भुज' और 'स्टेट ऑफ सीज' जैसी फिल्मों में इंडिया-पाकिस्तान-आतंकी हमला-इंटेलिजेंस जैसी बातें कहानी में खूब आईं. और यही चीजें 'द फैमिली मैन', 'स्पेशल ऑप्स', 'मुंबई डायरीज 26/11', 'अवरोध' और कई वेब सीरीज में भी दोहराई गईं. ये फॉर्मूला अब सेचुरेशन पर पहुंच गया. 2004 से 2014 तक ये फॉर्मूला जहां करीब 25 छोटी-बड़ी चर्चित फिल्मों में था, वहीं सिर्फ लॉकडाउन के बाद से इसे करीब 15 से ज्यादा फिल्मों और वेब सीरीज में फिट किया जा चुका है.
नतीजा ये हुआ कि पिछले दो साल में सिर्फ पाकिस्तान को विलेन बनाकर आने वाली कई फिल्में फ्लॉप हो गईं. लॉकडाउन के बाद आई अक्षय कुमार की 'बेल बॉटम' फ्लॉप रही. बॉक्स ऑफिस पर अक्षय कुमार की 'सूर्यवंशी' भले 200 करोड़ के करीब पहुंच गई हो मगर उसे भी उम्मीद से कम परफॉर्म करने वाला माना जाता है. फिल्म में अगर 'सिंघम' (अजय देवगन) और 'सिम्बा' (रणवीर सिंह) के कैमियो वाला नॉवेल्टी फैक्टर न होता तो न जाने फिल्म का क्या होता.
ट्रेंड को गौर से देखने पर पता चलता है कि इंडिया-पाकिस्तान कनफ्लिक्ट पर डायरेक्ट बात करने वाली फिल्में वैसे भी कम ही चली हैं. फिल्म की कहानी का मेन मुद्दा कुछ और हो, और ये कनफ्लिक्ट बीच में आए तो ऑडियंस पचा ले जाती है. सबसे बड़ा उदाहरण 'वीर जारा' और 'गदर' जैसी लव स्टोरीज हैं. लेकिन लॉकडाउन के बाद सीधा इसी कनफ्लिक्ट पर बात करने वालीं कई फिल्में लाइन से फ्लॉप हो गईं. इसमें सिद्धार्थ मल्होत्रा की 'मिशन मजनूं', विद्युत् जामवाल की 'IB 71', ट्रेलर से चर्चा में आई '72 हूरें' और जॉन अब्राहम की 'अटैक', परिणीति चोपड़ा की 'कोडनेम तिरंगा', अर्जुन कपूर की 'इंडियाज मोस्ट वांटेड' और कंगना रनौत की 'तेजस' जैसी फिल्में शामिल हैं. ओटीटी रिलीज होने की वजह से 'स्टेट ऑफ सीज' और 'भुज' का हिट-फ्लॉप नहीं तय किया जा सकता, मगर इन फिल्मों को भी जनता से कुछ खास रिस्पॉन्स नहीं मिला था.
'फाइटर' से क्या गलती हुई?
ऋतिक रोशन और दीपिका पादुकोण की 'फाइटर' का ट्रेलर आप फिर से देख सकते हैं. ट्रेलर में इंडिया-पाकिस्तान वाले मुद्दे पर फिल्म को बेचने की कोशिश बहुत जोर से की गई और डायलॉग्स में पूरा फोकस इसी पर था. सोशल मीडिया से लेकर फिल्म के ट्रेलर तक पर इस तरह के कई रिएक्शन थे कि अब ये मामला 'ओवर' हो रहा है. हालांकि, 'फाइटर' के रिव्यू कहते हैं कि फिल्म में पाकिस्तान बैशिंग जैसी चीज नहीं थी और इसकी कहानी, प्लॉट में दिखाए गए मिशन पर ही फोकस्ड रही. मगर ट्रेलर से अधिकतर लोगों को यही लगा कि ये इंडिया-पाकिस्तान फॉर्मूले को भुनाने वाली फिल्म है.
जबकि इसी से पहले आई 'गदर 2' के ट्रेलर ने भी इतना ज्यादा भारत-पाकिस्तान नहीं किया था. उसका फोकस सनी देओल की तारा सिंह के रोल में वापसी, फिल्म की लव स्टोरी और पहली फिल्म के कॉलबैक पर ज्यादा था. 'पठान' की कहानी में शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण के किरदार सरहद के दोनों तरफ से थे, मगर ट्रेलर ने इस पॉइंट को बेचने की कोशिश नहीं की थी.
भारत-पाकिस्तान वाला मुद्दा हमेशा खबरों में किसी न किसी तरह बना रहता है. सोशल मीडिया पर भी अब ये एकदम कैजुअल बातचीत में घुस आता है. ऊपर से पिछले कुछ साल से फिल्में भी इसे खूब घिस चुकी हैं, ऐसे में बार-बार इसी एक एंगल से फिल्म को एक्साइटिंग बताना बहुत मुश्किल है. अब ये जनता के लिए भी बोरिंग होता जा रहा है. ऐसे में अब फिल्ममेकर्स को इस मुद्दे को भुनाने की बजाय, ठोस कहानियों पर फोकस करना चाहिए, जिनके बीच में दोनों देशों का ये कनफ्लिक्ट एक सॉलिड ट्विस्ट का काम करे.