
आज से 58 साल पहले वो भी गर्मियों के ही दिन थे जब सुपरस्टार मनोज कुमार दिल्ली के एक गांव में आए थे. आज जब ये बात यहां लिखी जा रही है तब भी गर्मियों के ही दिन हैं लेकिन आज मनोज कुमार जा चुके हैं. मगर जब मैं आपको दिल्ली के इस गांव में लेकर चलूंगी तब शायद आपको लगे ही ना कि मनोज कुमार जा चुके हैं. यहां के लोगों के जेहन में मनोज कुमार की यादें आज भी जिंदा हैं. ये लोग तो यहां तक कहते हैं कि इस गांव को कोई हिस्सा ऐसा है ही नहीं जहां मनोज कुमार के कदम ना पड़े हों.
इस गांव में वो पेड़ भी है जिसे मनोज कुमार का पेड़ कहा जाता है. इस गांव में वो घर भी है जहां मनोज कुमार ने बाजरे की रोटी और सरसों का साग खाया था. इस गांव में वो बच्चे भी हैं जो आज बूढ़े हो चुके हैं लेकिन जिनसे मनोज कुमार ने खूब लाड किया और खूब बातें कीं. इस गांव का नाम है नांगल ठाकरां. उत्तर-पश्चिम दिल्ली में पड़ने वाला ये गांव कनॉट प्लेस से लगभग 40 किमी दूर है. इस गांव में मनोज कुमार की यादों से जुड़े कई ऐसे संदूक हैं जिनके खुलने पर जो यादें ताजा होती हैं वो मनोज कुमार को शायद हमेशा ही जिंदा रखेंगी.
क्यों पसंद आया मनोज कुमार को दिल्ली का ये गांव?
गर्मी अपने पूरे तेवर दिखा रही है. मौसम विभाग ने लू का अलर्ट जारी कर दिया है. मगर इस गर्मी में भी दिल्ली के नांगल ठांकरा गांव में आपको हवा के ठंडे झोंके मिलेंगे. यहां दूर-दूर तक आपको खेत ही खेत नजर आएंगे. एक बार को तो ऐसा भी होगा शायद कि आप दिल्ली में ही हैं इस बात पर भी यकीन नहीं कर पाएंगे. मगर मैं गारंटी देती हूं कि इस गांव में जाकर आपको गर्मी में भी ठंडक ही महसूस होगी. ऐसी ही ठंडक शायद सन् 1966 में महसूस हुई थी सुपरस्टार मनोज कुमार को. वो दिल्ली के इस गांव में आए और फिर अपनी फिल्म उपकार की शूटिंग के लिए इस गांव को ही चुन लिया. बताया जाता है कि उनके कैमरापर्सन दिल्ली आए थे और एक ऐसा गांव ढूंढ रहे थे जहां धान के खेत हों. तब उन्हें किसी ने नांगल ठाकरां गांव के बारे में बताया. यहां वह झुम्मन चौधरी से मिले. फिर वह मनोज कुमार को यहां लाए. उस वक्त भी गांव में दूर-दूर तक धान, गेहूं औऱ सरसों के खेत थे और आज भी ये नजार खूब दिखता है. मनोज कुमार को भी ये गांव बहुत पसंद आया. वह भी इस गांव के ही एक किसान झुम्मन चौधरी से मिले और उनसे कहा कि इस गांव में शूटिंग करनी है. गांव के घर, खेत, हल और बैल की जरूरत होगी. बस फिर क्या था. गांव वालों ने पूरी मदद की और शूटिंग शुरू हो गई.
जब मनोज कुमार ने कहा-घर की छत ना टूट जाए
फिल्म 1967 में रिलीज हुई. आज इस बात को 58 साल हो चुके हैं, मगर इस गांव में आज भी ऐसे लोग हैं जो मनोज कुमार और फिल्म की शूटिंग के किस्से सुनाते थकते नहीं हैं. इस गांव में मैंने ये किस्से भी सुने और वो दरो-दीवार भी देखें जहां मनोज कुमार ने सिर्फ फिल्म की शूटिंग ही नहीं की बल्कि बाजरे की रोटी औऱ सरसों का साग भी खाया. वैसे तो इस गांव के प्रगतिशाली किसान रवींद्र कुमार कहते हैं कि इस गांव को कोई हिस्सा ऐसा है ही नहीं जहां मनोज कुमार के पैर ना पड़े हों, लेकिन फिर वो उस घर में ले जाते हैं जहां दिन-रात उपकार फिल्म की शूटिंग हुई थी. इस समय इस घर के मालिक हैं महेंद्र सिंह. उस समय उनके दादा जी से मनोज कुमार ने उनके घर में शूटिंग की इजाजत ली थी. उस वक्त महेंद्र सिंह की उम्र 14 साल थी. आज उन दिनों को याद करके महेंद्र सिंह बताते हैं,' डेढ़-दो महीने तक दिन-रात इसी घर में फिल्म की शूटिंग चली थी. मनोज कुमार हमारे ही घर आकर कई बार खाना भी खाते थे. बाजरे की रोटी और सरसों का साग उन्हें काफी पसंद आता था. हर दिन शूटिंग देखने इतने लोग आते कि जमीन से लेकर छत तक भीड़ ही भीड़ जमा हो जाती थी. एक बार तो मनोज कुमार ने खुद ही उनके दादा जी से कहा भी था, 'इतने लोग शूटिंग देखने आ रहे हैं आपके घर की तो छत पर भी पैर रखने की जगह नहीं है कहीं छत टूट ही ना जाए' दादा जी और मनोज कुमार के बीच अच्छी दोस्ती हो गई थी तो दादा जी ने भी पलटकर जवाब दिया- तू अपनी शूटिंग कर, बाकी कोई चिंता ना कर, ये हमारी छत है बहुत मजबूत है.'
जिस घर से मनोज कुमार ने लिए थे दो जोड़ी बैल
एक सुपरस्टार की इतनी सहजता और गांव वालों की इतनी आत्मीयता के साथ बनी ये फिल्म आज भी लोगों के दिलों पर राज करती है. कोई 15 अगस्त और 26 जनवरी का मौका नहीं होता जब इस फिल्म का सुपरहिट गाना 'मेरे देश की धरती सोना उगले' ना बजे. इसी गांव में रहती हैं सुदेश. उन्होंने वो वक्त नहीं देखा जब इस गांव में फिल्म की शूटिंग हुई थी, लेकिन जिस घर में वो शादी करके आई वहां इस फिल्म की शूटिंग के कई किस्से दर्ज हैं. बताती हैं, 'मेरे ससुराल से ही वो बैलों के जोड़े लिए गए थे जो फिल्म में दिखाए गए हैं. यही नहीं जिस स्कूल में फिल्म की शूटिंग हुई उस गांव के हेडमास्टर भी मेरे ससुर जी थे. मेरे पति भी फिल्म के स्कूल वाले सीन में नजर आते हैं.' ये किस्से सुनाते हुई खुशी और गर्व एक साथ उनके चेहरे पर नजर आता है. और ये भी कहती हैं कि इस गांव को अहसास उस फिल्म को बार-बार देखने के लिए मजबूर करता है. हम तो अक्सर बच्चों से ये फिल्म लगवाकर आज भी देखते रहते हैं.'
इस गांव में आज भी है मनोज कुमार का पेड़
सबसे खास बात ये है कि आज बेशक मनोज कुमार इस दुनिया को अलविदा कहकर जा चुके हैं लेकिन दिल्ली के इस गांव में एक ऐसा पेड़ है जो आज भी उनके जिंदा होने का अहसास बचाकर रखे हुए है. इस पेड़ को आज भी गांव वाले मनोज कुमार का पेड़ कहते हैं. ये पीपल का पेड़ खुद इस गांव में शूटिंग के दौरान मनोज कुमार ने लगाया था. गांव के किसान रवींद्र कुमार ने जब ये पेड़ दिखाया तो एक अलग ही खुशनुमा सा अहसास दिल में कैद हो गया. ऐसी निशानियां छोड़कर जाने वाले मनोज कुमार को भला कोई कैसे भुला सकता है.
किसान की वो कहानी आज भी जिंदा है
1967 में आई ये फिल्म मनोज कुमार ने ही लिखी थी और उन्होंने ही इसे डायरेक्ट किया था. ये दो भाइयों की कहानी है. इनमें से एक भारत का रोल मनोज कुमार ने ही किया था. दूसरा भाई पुरान जिसका किरदार प्रेम चोपड़ा ने निभाया था. दोनों भाई जिंदगी के अलग-अलग रास्ते चुनते हैं. भारत पढ़ा-लिखा होने के बाद भी गांव में रहकर खेती करता है और पुरान शहर में ही रहना चाहता है. ये फिल्म मनोज कुमार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सलाह पर बनाई थी. उस समय देश गहरे अन्न संकट से जूझ रहा था. ऐसे समय में किसान कितना अहम रोल अदा कर सकते हैं ये फिल्म में बखूबी दिखाया गया है.