Advertisement

घर बेचकर फिल्म बनाने वाला वो डायरेक्टर जिसने संवार दिया माधुरी दीक्षित, नाना पाटेकर का करियर

एन चंद्रा उन फिल्ममेकर्स में से थे जिनका सिनेमा 80s के अंत में एक फ्रेश बदलाव की तरह आया. चंद्रा ने 'अंकुश' और उसके बाद भी कई यादगार फिल्में बनाईं और नाना पाटेकर समेत कई कलाकारों को लैंडमार्क फिल्में दीं. मगर 'अंकुश' के बनने की कहानी एन चंद्रा के सिनेमाई प्यार की एक गजब कहानी है.

घर बेचकर फिल्म बनाने वाला वो डायरेक्टर जिसने संवार दिया माधुरी, नाना का करियर घर बेचकर फिल्म बनाने वाला वो डायरेक्टर जिसने संवार दिया माधुरी, नाना का करियर
सुबोध मिश्रा
  • नई दिल्ली ,
  • 03 अप्रैल 2025,
  • अपडेटेड 6:00 PM IST

80 का दशक बीत रहा था और अमिताभ बच्चन की पहचान बन चुकी 'एंग्री यंगमैन' वाली इमेज के तमाम वेरिएशन बड़े पर्दे पर फैले हुए थे. हर एक्शन हीरो सिस्टम से लड़ रहा था. कहानियों के हिसाब से बस ये सिस्टम बदल जाता था. कहीं वो सरकारी मशीनरी और करप्शन होता था, तो कहीं पर इलाके का डॉन या गांव के जमींदार टाइप लोग सिस्टम की भूमिका में थे. फिल्मों का लुक भी बदल रहा था और ग्लैमरस, चमचमाती सेटिंग वाली फिल्में ज्यादा बन रही थीं.  

Advertisement

ऐसे में एक फिल्म आई जिसमें पढ़-लिखकर छोटी-छोटी नौकरियां करने को मजबूर चार यंग लड़के खुद ही सिस्टम बन गए. उनकी एक साथी का गैंग रेप होता है और आरोपी सबूत ना मिलने के कारण बच निकलते हैं. हताश लड़की आत्महत्या कर लेती है और तब उसके ये चारों दोस्त उसका बदला लेते हुए, उसके हर एक गुनाहगार को मौत के घाट उतार देते हैं. 

'अंकुश' में नाना पाटेकर (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

इन लड़कों में से कहानी में जो चेहरा 'हीरो' की शक्ल में हाईलाइट हुआ, वो थे नाना पाटेकर. फिल्म थी 'अंकुश' (1986) और डायरेक्टर थे एन चंद्रा. वो उन फिल्ममेकर्स में से थे जिनका सिनेमा उस वक्त एक फ्रेश बदलाव की तरह आया. चंद्रा ने 'अंकुश' के बाद भी कई यादगार फिल्में बनाईं और नाना पाटेकर समेत कई कलाकारों को लैंडमार्क फिल्में दीं. मगर 'अंकुश' के बनने की कहानी एन चंद्रा के सिनेमाई प्यार की एक गजब कहानी है. 

Advertisement

घर और बहन-बीवी के गहने बेचकर बनाई 'अंकुश'
4 अप्रैल 1952 को जन्मे चंद्रशेखर नार्वेकर उर्फ एन चंद्रा ने अपने कई इंटरव्यूज में बताया है कि उन्हें सिनेमा में आने का ऐसा कोई खास एम्बिशन नहीं था. स्कूलिंग पूरी करने के बाद उन्हें बस एक नौकरी की तलाश थी तो उन्होंने एक फिल्म सेंटर से काम शुरू किया, जहां पहले उनके पिता नौकरी करते थे. उन्होंने शुरुआत क्लैपबॉय के तौर पर की थी, मगर धीरे-धीरे आगे बढ़ते गए और एडिटर के साथ-साथ असिस्टेंट डायरेक्टर भी रहे. 

ये सब काम करते हुए चंद्रा अच्छी कमाई कर रहे थे और मुंबई में एक घर ले चुके थे. लेकिन बाय चांस फिल्मों में आए चंद्रा का दिल फिल्मों में रम चुका था. फाइनली गुलजार की फिल्म 'मेरे अपने' से इंस्पायर होकर उन्होंने भी अपनी पहली फिल्म बनाने का फैसला किया. 'अंकुश' यही फिल्म थी. लेकिन चंद्रा ये नहीं चाहते थे कि फिल्म बनाते हुए कोई उनकी क्रिएटिविटी को बदलने की कोशिश करे और इसका एक ही तरीका था- फिल्म प्रोड्यूस भी खुद की जाए. 

इसका उपाय निकालते हुए चंद्रा ने अपना घर बेच दिया और जो पैसे आए, वो फिल्म में लगा दिए. बाद में और जरूरत पड़ी तो चंद्रा ने अपनी बहन और पत्नी के गहने बेचकर पैसों का जुगाड़ किया. बजट लिमिटेड था इसलिए उन्होंने तय किया कि किसी भी एक्टर को 10 हजार से ज्यादा फीस नहीं देंगे. चंद्रा ने 'अंकुश' की कहानी, मराठी सिनेमा के पॉपुलर स्टार रविंद्र महाजनी को दिमाग में रखते हुए लिखी थी लेकिन वो बड़े स्टार थे और 10 हजार में उनका आना मुश्किल था. तो उनकी जगह चंद्रा ने नाना पाटेकर को लिया जो 'गमन' (1978) से डेब्यू करने के बाद एक ब्रिटिश टीवी सीरीज और 'आज की आवाज' (1984) में सपोर्टिंग रोल कर चुके थे. 

Advertisement

नाना की फीस तो बजट में थी ही, लेकिन जब 'अंकुश' के लिए फिर से पैसे की कमी पड़ी तो नाना ने अपना घर गिरवी रखकर, चंद्रा को दो-ढाई लाख रुपये दिए. फाइनली 12 लाख में फिल्म बनकर तैयार हुई और जब ये रिलीज हुई तो कई थिएटर्स में दो-दो हफ्ते हाउसफुल रही. 'अंकुश' ने 95 लाख का बिजनेस किया और छोटे बजट की बड़ी ब्लॉकबस्टर बनी. यहां से जनता को नाना पाटेकर के रूप में एक नया हीरो मिला जो बिल्कुल आम आदमी जैसा था. लेकिन वो उन बगावतों को पूरा करने की हिम्मत रखता था, जो आम आदमी करना चाहता है. 'अंकुश' को एक और चीज के लिए भी जाना जाता है- इस फिल्म का गाना 'इतनी शक्ति हमें देना दाता' एक प्रार्थना की तरह कई स्कूलों में गाया जाता है. 

'अंकुश' के डिफरेंट अंदाज ने कैसे बनाई चंद्रा की पहचान
लिमिटेड बजट में फिल्म बनाने के लिए चंद्रा ने मुंबई और आसपास की ही रियल लोकेशंस पर, कम समय में असरदार तरीके से शूट किया. फिल्म के एक्शन सीन्स बहुत रॉ थे मगर इनमें स्टाइल भरपूर था. फिल्म में चमचमाती हुई ग्लैमरस दुनिया नहीं थी बल्कि मुंबई, अपने पूरे मिडल क्लास स्ट्रगल के साथ इस फिल्म में थी. 'अंकुश' में जिंदगी की भद्देपन भरी रियलिटी पर्दे पर थी और इससे जनता ने बहुत रिलेट किया. उस समय ये अंदाज आर्ट फिल्मों तक लिमिटेड था और इन फिल्मों को मेनस्ट्रीम फिल्मों से अलग रखकर देखा जाता था. 

Advertisement

एन चंद्रा ने बाद के इंटरव्यूज में बताया कि वो अपनी फिल्म में जीवन एकदम सच्चा और रियल दिखाना चाहते थे लेकिन कहानी का ट्रीटमेंट उन्हें प्रॉपर मेनस्ट्रीम सिनेमा वाला रखना था. ये मिक्स ही एन चंद्रा के सिनेमा की पहचान बना. ये पहचान उनकी फिल्मों के विजुअल, लोकेशन, स्टाइल और किरदारों के बुनावट में आपको अलग से दिख जाती है. 'अंकुश' के बाद चंद्रा ने अगली जो फिल्में बनाईं वो भी हिट्स बनने के साथ-साथ आइकॉनिक बनीं. 

माधुरी दीक्षित और अनिल कपूर को भी दिए आइकॉनिक रोल 
'अंकुश' के बाद चंद्रा की अगली फिल्म 'प्रतिघात' (1987) थी जिसमें पॉलिटिक्स और जीवन का भद्दापन एक बार फिर से बड़े पर्दे पर था. इस फिल्म की कहानी में भी रेप का मुद्दा था और जिस अंदाज में उसका प्रतिशोध लिया गया, वो दर्शक कभी नहीं भूल सकते. सुजाता मेहता के लीड रोल वाली इस फिल्म में भी चंद्रा ने नाना पाटेकर को एक महत्वपूर्ण रोल में रखा था. 'प्रतिघात' हिट होने के बाद चंद्रा ने वो फिल्म बनाई जो हिंदी सिनेमा की आइकॉनिक फिल्मों में से एक है- तेजाब (1988). 

'तेजाब' में उन्होंने माधुरी दीक्षित को लिया जो तबतक कई फिल्मों में काम कर चुकी थीं मगर 'दयावान' (1988) के अलावा उनकी कोई फिल्म खास नहीं चली. और 'दयावान' की कामयाबी भी फिल्म के हीरो यानी विनोद खन्ना के खाते में ज्यादा गई. 'तेजाब' में चंद्रा ने माधुरी को ऐसी लड़की के रोल में रखा जो मजबूरी में डांसर बनी है और एक गैंगस्टर के खौफ में जी रही है. इस फिल्म में एक्टिंग और 'एक दो तीन' गाने की परफॉरमेंस ने माधुरी को वो मंच दिया जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा की सबसे टॉप एक्ट्रेस बनाया. 

Advertisement

'कर्मा', 'चमेली की शादी' और 'मिस्टर इंडिया' जैसी हिट्स देकर आ रहे अनिल कपूर 'तेजाब' के हीरो बने. हिंसा की राह पर चल पड़े एक अच्छे-खासे पढ़े लिखे लड़के मुन्ना के रोल ने अनिल कपूर को 'बेस्ट एक्टर' का पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड दिलाया. 

सनी देओल के करियर की बड़ी हिट्स में से एक, कल्ट फिल्म माने जाने वाली 'नरसिम्हा' के डायरेक्टर एन चंद्रा ही हैं. चंद्रा की 'युगांतर' 90s के दौर में मिथुन चक्रबर्ती की सॉलिड परफॉरमेंस लेकर आई. नाना पाटेकर और माधुरी दीक्षित के करियर में गिनी जाने वाली सबसे दमदार फिल्मों में से एक 'वजूद' (1996) भी चंद्रा की ही फिल्म है. इस फिल्म से नाना पाटेकर का किरदार आज भी याद किया जाता है. 

चंद्रा ने मसाला और कॉमेडी फिल्मों में टाइपकास्ट हो चुके गोविंदा को 'शिकारी' (2000) में पहला नेगेटिव किरदार दिया. इसी फिल्म से उन्होंने करिश्मा कपूर को उनके ग्लैमरस किरदारों से अलग एक एक्शन पैक रोल दिया. हालांकि, बाद के दिनों में चंद्रा ने कुछ ऐसे एक्स्परिमेंट किए जिन्हें लोगों ने उनके सिनेमा से बहुत अलग पाया. 2000s की शुरुआत में आईं 'स्टाइल' (2001) और 'एक्सक्यूज मी' (2003) आइकॉनिक कॉमेडी फिल्में मानी जाती हैं. इनके डायरेक्टर 'चंद्रा' ही थे. 

2003 में उनकी फिल्म 'कगार' में पुलिसवालों की जिंदगी का एक बेहद रियल और झन्नाटेदार चित्रण नजर आया. अपनी आखिरी फिल्म 'ये मेरा इंडिया' (2009) में चंद्रा ने मुंबई के समाज से जुड़े कुछ कनफ्लिक्ट दिखाने की कोशिश की मगर इसे उनकी कमजोर फिल्मों में गिना जाता है. बदलते दौर में चंद्रा और उनके जैसे डायरेक्टर इंडस्ट्री छोड़ते चले गए मगर एक दौर में उन्होंने अपने क्राफ्ट से बॉलीवुड को एक नया स्टाइल दिया, जो आगे चलकर कई फिल्मों के लिए इंस्पिरेशन बना. 

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement