
'सिस्टम एक नाव की तरह है चौधरी. सबको पता है इसमें छेद है. और तू उनमें से है जो नाव को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. तू मरेगा चौधरी...' जनता से जमकर तारीफें बटोर रही वेब सीरीज 'पाताल लोक 2' का ट्रेलर इसी डायलॉग से शुरू हुआ था. शो में आपको ये डायलॉग तब मिलता है जब आखिरी एपिसोड खत्म होने के करीब होता है.
शो के लीड किरदार हाथीराम चौधरी (जयदीप अहलावत) को ये डायलॉग, विर्क (अनुराग अरोड़ा) ने बोला है. विर्क, 'पाताल लोक' के पहले सीजन में आउटर जमुना पार थाने का एस.एच.ओ. हुआ करता था. मगर वो बहुत पहले सिस्टम का खेल समझ चुका था और हाथीराम की भाषा में समझा जाए तो इस खेल की 'गोटियां फिट करने में' बहुत तेज था. सीजन 2 में विर्क ए.सी.पी. बनकर नारकोटिक्स डिपार्टमेंट में पहुंच चुका है. मगर हाथीराम अभी भी इंस्पेक्टर ही है.
'पाताल लोक 2' का आखिरी एपिसोड खत्म करते हुए आपके चेहरे पर एक बार मुस्कराहट जरूर आई होगी. लेकिन शो के एंड में क्या आपने उस डायलॉग पर एक बार फिर से ध्यान दिया, जहां से शो का ट्रेलर शुरू हुआ था? क्या हाथीराम सच में 'सिस्टम' की डूबती नाव बचा रहा था? या फिर वही इस सिस्टम की नाव का वो छेद है, जो इसके डूबने की वजह बन सकता है? नाव, नाव में छेद और नाव के रक्षक का ये मेटाफर है क्या जिसपर ये पूरा शो टिका हुआ है? ऐसा करते हैं, दोनों सीजन में 'सिस्टम' के काम करने और हाथीराम के किरदार की गहराई में उतारकर देखते हैं. सवाल का जवाब वहीं छिपा है...
क्या है 'सिस्टम'?
अगर 'पाताल लोक' शो के सन्दर्भ में देखा जाए तो 'सिस्टम' सिर्फ वो कानून व्यवस्था नहीं है, जिसकी जिम्मेदारी पुलिस की है. ये एक ईकोसिस्टम है, फूड-चेन जैसा, जहां हर ऊपर वाला अपने नीचे वाले को खाने के लिए तैयार बैठा है. पहले शो की शुरुआत में हाथीराम ने कहा था कि लुटियंस दिल्ली, जहां अधिकतर पॉलिटिशियन रहते हैं, वो स्वर्ग लोक है. 'जहां के केस वहीं के वहीं दबा दिए जाते हैं. पुलिस वाला क्या इन्वेस्टिगेट करेगा, क्या नंबर कमाएगा.'
बड़े बिजनेस मैन और प्रभावशाली लोग राजधानी के जिन इलाकों में रहते हैं जैसे- प्रीत विहार, बसंत विहार, महरौली, नोएडा वगैरह; वो धरती लोक है. 'यहां कभी-कभी पाताल लोक के कीड़े घुस जाते हैं और धरती लोक के आदमी को काट लेते हैं. फिर होते हैं कांड- आरुषी कांड, निठारी कांड... और पुलिस वालों को नंबर मिलते हैं कांड की इन्वेस्टिगेशन के', ऐसा इंस्पेक्टर हाथीराम का मानना है.
इस चेन में सबसे नीचे आता है आम लोअर-मिडल क्लास या मजदूर आदमी. आपको याद होगा कि 'पाताल लोक' के पहले सीजन का पहला एपिसोड शुरू ही उस डायलॉग से हुआ था, जिसमें हाथीराम इस तबके की तुलना कीड़ों से करते हुए कहता है- 'किस कीड़े ने किसका मर्डर किया, किसने किसकी साइकिल चुराई, किसने किसकी घरवाली को पीट दिया, किसकी घरवाली भाग गई, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता.'
हाथीराम खुद को 'पाताल लोक का परमानेंट निवासी' इसीलिए कहता है क्योंकि उसका थाना 'आउटर जमुना पार' (काल्पनिक नाम) उसी इलाके में है जहां दिहाड़ीदार मजदूर और छोटे-मोटे क्राइम करने वाले अपराधी ज्यादा हैं. लेकिन हाथीराम की प्रॉब्लम ये है कि 15 साल से नौकरी में होने के बावजूद वो विर्क या अंसारी की तरह आगे नहीं बढ़ पा रहा.
वो इसी 'पाताल लोक' के केस सॉल्व करने में लगा रहता है, जहां से ना प्रमोशन जैसा कुछ मिलने वाला है और ना किसी ऐसे व्यक्ति का कृपापात्र बनने का मौका मिलने वाला है जो उसका करियर आगे बढ़ा सके. वो यहां फंसा हुआ है और कहानी बस घिसटती जा रही है. यही इस शो का यूनिवर्स है, यही 'सिस्टम' है. यही वो नाव है जिसपर सवार लोग संसार की अराजकताओं और अपराधों की दुर्गंध से भरी वैतरणी को पार करके मोक्ष के ठाठ भोगते हैं.
हाथीराम की जांच और सिस्टम की आंच
'पाताल लोक' मूल रूप से एक पुलिस प्रोसीजरल ड्रामा है, जिसका फोकस इन्वेस्टिगेशन पर होता है. पहले सीजन में हाथीराम के हिस्से एक जर्नलिस्ट की हत्या की साजिश का केस आया था. दूसरे सीजन में वो एक गायब हुए दिहाड़ी मजदूर को खोजने निकला है. दोनों ही मामलों में एक बात कॉमन है कि हाथीराम के सीनियर्स उसे इन्वेस्टिगेशन सौंपने लायक नहीं समझते. और दोनों ही केस 'स्वर्ग लोक' यानी पॉलिटिक्स से कनेक्ट होते हैं.
पहले सीजन में उसे बड़ा केस इसलिए मिला था क्योंकि सीबीआई के उसके सीनियर किसी ऐसे ऑफिसर को केस सौंपना चाहते थे जो इन्वेस्टिगेशन कर ही ना पाए और उनकी साजिशें दबी रहें. दूसरे सीजन में हाथीराम की इन्वेस्टिगेशन नागालैंड के पॉलिटिकल लीडर की हत्या से जुड़ने लगती है. हाथीराम का जूनियर इमरान अंसारी अब उसका सीनियर बन चुका है और वही इस 'हाई-प्रोफाइल' केस की जांच कर रहा है. जब वो हाथीराम को अपने साथ जांच में शामिल करने की कोशिश करता है तो दिल्ली पुलिस के डीसीपी कहते हैं- 'ये कोई बंदोबस्त ड्यूटी नहीं है.' लेकिन अंसारी के दोबारा जोर देने पर फाइनली हाथीराम को 'स्वर्ग लोक' के केस की इन्वेस्टिगेशन का मौका मिलता है.
दोनों ही कहानियों में हाथीराम सबूत जुटाने के लिए कुछ लोगों के दफ्तर में चोरी से घुसता नजर आता है. उसकी इन्वेस्टिगेशन का एक बड़ा हिस्सा तब आगे बढ़ता नजर आता है जब वो पहले से सस्पेंड चल रहा है या फिर ऑफिशियली छुट्टी पर है. आप उसे चित्रकूट में एक पत्रकार की आई डी पर, धोखे से एक प्रेस कांफ्रेंस में घुसते हुए देखते हैं. अपराध स्वीकार करवाने के लिए या सबूत जुटाने के लिए वो लोगों को पीटने, उनपर दबाव बनाने, रिश्वत देने या किसी भी दूसरे हथकंडे का इस्तेमाल करने के लिए तैयार है. जबकि कानून के हिसाब से ये गलत है. इस तरह से जुटाए गए सबूत किसी कोर्ट केस में स्वीकार्य भी नहीं होते. ऐसा नहीं है कि हाथीराम को ये नहीं पता, मगर उसका असली फोकस केस सॉल्व करना है ही नहीं. उसकी तलाश कुछ और है. वो अपनी नैतिकता के पैमाने पर खरा उतरना चाहता है.
दूसरे सीजन में नागालैंड पहुंचा हाथीराम ऐसे सवालों के जवाब खोजता नजर आता है, जो 'स्वर्ग लोक' और 'धरती लोक' में रह रहे किरदारों के लिए मुश्किल खड़ी कर रहे हैं. हाथीराम की जिज्ञासा को शांत करने के लिए यहां के खिलाड़ी बार-बार उसके आगे ऐसे लोगों की लाशें फेंक दे रहे हैं, जो उनके लिए 'कीड़े' हैं. जिनकी जान की कोई कीमत नहीं है.
कभी ये हथियार छोड़कर, नई जिंदगी का ख्वाब देख रहे 3 युवा हैं, जिन्हें 'आतंकवादी' की इमेज में फ्रेम कर दिया गया है. कभी ये एक ड्रग डीलर है, जो वैसे भी समाज के लिए किसी काम का नहीं. दो महत्वपूर्ण किरदार- एक दिहाड़ीदार मजदूर और नाजायज रिश्ते से जन्मी एक यंग लड़की, भी इस कहानी में 'कीड़े' ही हैं जो 'स्वर्ग लोक' के रूटीन कामकाज में खलल पैदा कर रहे हैं. वे भी इसीलिए मारे गए हैं. जब इन्वेस्टिगेशन गंभीर होने लगती है तो दो पुलिस ऑफिसर भी कीड़ों की तरह, दरारों से 'स्वर्ग लोक' में घुसकर परेशानी पैदा करने लगते हैं. और अब तो आप जानते ही हैं कि 'सिस्टम' ने जिसे कीड़ा समझ लिया, उसका क्या होने वाला है!
दिक्कत ये है कि हाथीराम 'पाताल लोक का परमानेंट निवासी' है. वो 'सिस्टम' द्वारा, जिज्ञासा शांत करने के लिए फेंकी गई हड्डियों का स्वाद नहीं लेना जानता. उसे उन जिंदगियों की परवाह है, जिन्हें सिस्टम कीड़ा समझता है. वो जानना चाहता है कि हड्डी फेंकने वाले हाथ किस-किस के हैं. वैसे तो आउटर जमुनापार थाने के एस.एच.ओ. ने हाथीराम को समझाया था कि 'हम पालतू कुत्ते हैं चौधरी. तुम, मैं, ए.सी.पी. अंसारी हम सब. और कुत्ते की वफादारी सिर्फ अपने मालिक से होती है, दूसरे कुत्तों से नहीं.'
लेकिन कही हुई बात मान ले, वो हाथीराम चौधरी कहां! सिस्टम की नाव मस्त चल रही थी, बिना हिचकोले खाए लेकिन हाथीराम उसमें छेद बन चुका है. उस छेद से नाव में बदबूदार पानी भरने लगा है. इतना नहीं भरा है कि नाव डूब जाए. पर इतना जरूर भर गया है कि सड़ांध आने लगी है. स्वर्ग लोक के वासियों को अपने कर्मों की ये बात बेचैन कर रही है. मगर हाथीराम की जिद का कोई इलाज नहीं मिल रहा, तो अब एक नई ट्रिक निकाली गई. 'स्वर्ग लोक' के एक देवता ने ये सुविधाजनक सत्य जाहिर कर दिया है कि उनका सिस्टम असल में जनता की उन्नति के लिए ही डिजाईन किया गया है. इसलिए सिस्टम को सुचारू रूप से चलाने के लिए कीड़ों का मरना एक अनिवार्यता है.
'पाताल लोक' के पहले सीजन में चौधरी की इन्वेस्टिगेशन से शॉक होने वाले डीसीपी भगत ने कहा था- 'ये सिस्टम जो है ना चौधरी, दूर से देखने में सड़ा-गला, कचरे का ढेर लगता है. लेकिन अंदर घुस के समझोगे ना तो अच्छे से तेल पिलाई गई मशीनरी है. हर पुर्जे को मालूम है उसे क्या करना है. और जिसको नहीं पता होता, उस पुर्जे को बदल दिया जाता है. लेकिन ये सिस्टम कभी नहीं बदलता.'
कहानी खत्म हो रही है, हाथीराम भी थक गया है. बीवी के ताने और घर की परेशानियां जिस आदमी का पुलिस की नौकरी से मोहभंग नहीं करवा सकीं, उसे सिस्टम ने थका दिया. वो बोल रहा है 'मैं नौकरी छोड़ रहा हूं यार, मेरा हो गया.' ये पुर्जा खुद ही सिस्टम की मशीनरी से निकल जाने को तैयार है. सवाल ये है वो अब क्या करेगा? चौधरी ने तो कह दिया है 'जो हनुमान जी करवाएंगे.' अब इंतजार हम लोगों को करना है कि आगे क्या होगा...