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फिल्म वध में संजय मिश्रा और नीना गुप्ता एक पति-पत्नी के किरदार में नजर आ रहे हैं. संजय इसे अपने करियर का सबसे डिस्टर्बिंग किरदार मानते हैं. अपने इस किरदार से उन्हें बाहर निकलने में लगभग एक महीने से भी ज्यादा लग गए थे. साथ ही संजय ने यह भी बताया कि आखिर फिल्म की तुलना क्यों श्रद्धा-अफताब मर्डर मिस्ट्री से की जा रही है.
फिल्म में आपका किरदार बहुत ही डार्क है. इससे निकलने में कितना वक्त लग गया था? इसके जवाब में संजय कहते हैं, 'बहुत ही डिस्टर्बिंग किरदार रहा है. मुझे याद है ग्लावलियर की गलियों में हमारी शूटिंग हुई थी. यकीन मानो, वो गली, वो घर और सौरभ सचदेवा इन तीनों को याद कर मैं कांपता रहता था. इस तरह की फिल्म मैंने पहली बार की है. मुझे लेकर ऐसा किरदार सोचा गया है, यह भी मेरे लिए बड़ी बात थी. एक महीने की शूटिंग थी और सच कहूं, मेरी तबीयत खराब होने लगी थी. इस तरह की सोच आपको मानसिक रूप से विचलित कर देते हैं. आंखों देखी, कड़वी हवा में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. आप इस किरदार में इतना इनवॉल्व हो जाते हो कि नॉर्मल आप रह ही नहीं पाते हैं. बाहर निकलने के लिए काफी टाइम लगा, लगभग एक महीने लग गए थे.'
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अफताब और श्रद्धा के केस के बाद यह डिबेट बढ़ी है कि फिल्मों में ऐसी ब्रूटल चीजों को ग्लोरीफाई किया जाता है. इस पर अपनी राय देते हुए संजय कहते हैं. 'देखो, जो सोसायटी में होता है, वो ही कला में भी दिखता है. समाज की झलक तो आपको परदे पर दिखेगी ही. हालांकि जब हमारी फिल्म की शूटिंग चल रही थी, उस समय ये केस नहीं आया था. मुझे नहीं लगता कि ऐसा पहली बार हुआ है. बचपन में भी मैंने ऐसे कई नृशंस हत्या का जिक्र सुना है. अब इसे जैसे रिलेट करना चाहें, वो आप कर सकते हैं. हालांकि मैं सफाई दे दूं कि इसका कोई कनेक्शन नहीं है. हां, ये ऐसे वक्त में आई है, जब इस तरह के केसेस निकलकर सामने आ रहे हैं. यह कहानी मर्डर मिस्ट्री से ज्यादा फैमिली पर फोकस करती है. मेरे नजरिये से यह कहानी एक पति-पत्नी के लाइफ में होने वाले स्ट्रगल को खूबसूरती से दिखाने की कोशिश की गई है. रही बात किरदारों के ग्लोरीफाई के, इस फिल्म को देखने के बाद शंभुनाथ मिश्रा कहीं से भी ग्लोरीफाई होता नहीं दिखेगा. उसने पीछा छुड़ाया है, हालांकि उसका पीछा छुड़ाने का तरीका बहुत डरावना है.'