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जाकिर हुसैन की अनसुनी दास्तान: ज‍िसे मां ने समझा था मनहूस, अब्बा को बचाने के ल‍िए मांगी भीख

संगीत मैस्ट्रो जाकिर हुसैन भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी ख्याति दूर दूर तक फैली है. जाकिर के अचीवमेंट्स से तो आप वाकिफ होंगे लेकिन ये शायद ही कोई जानता होगा कि उनका बचपन कितनी मुफ्लिसी में बीता है. आपको बताते हैं उनके बारे में अनकहे किस्से...

जाकिर हुसैन जाकिर हुसैन
बिश्वजीत
  • नई दिल्ली,
  • 16 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 5:52 PM IST

तबला मैस्ट्रो जाकिर हुसैन का सोमवार सुबह 73 साल की उम्र में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में निधन हो गया. उनका जाना संगीत जगत के लिए अपूर्णीय क्षति है. परिवार और फैंस गमगीन है. उनका संगीत और तबले की थाप हर चाहनेवालों की दिल में गूंजती रहेगी. 

उनके सराहनीय काम, अचीवमेंट्स और अवॉर्ड्स से तो शायद आप वाकिफ होंगे लेकिन क्या आप जानते हैं कैसे वो दि ग्रेट 'जाकिर हुसैन' बने? मुफ्लिसी के दिनों में बीते बचपन के बावजूद उन्होंने कैसे संगीत की दुनिया में अपना परचम लहराया और नाम कमाया? आइये हम आपको बताते हैं उनके बारे में कुछ ऐसी बातें, जिनसे शायद ही कोई वाकिफ होगा. 

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मां ने समझा 'मनहूस'

जाकिर हुसैन ने अपनी किताब “ZAKIR HUSSAIN: A Life in Music” में इस किस्से का जिक्र किया है. जाकिर ने बताया कि उनके जन्म के समय पिता की सेहत इस कदर खराब थी कि तबला वादक को मनहूस समझा जाने लगा था. और ऐसा कोई और नहीं बल्कि उनकी मां का मानना था. 

जाकिर ने कहा था, ''जिस समय मेरा जन्म हुआ, उस समय मेरे पिता दिल की बीमारी से पीड़ित थे और बहुत अस्वस्थ थे. किसी ने मेरी मां से कहा था कि मैं एक बदकिस्मत बच्चा हूं क्योंकि मेरा जन्म परिवार के लिए इस सबसे दुखद समय के साथ हुआ था. मेरे पिता, जिन्हें हम अब्बा कहते थे, उस समय इतने गंभीर रूप से बीमार थे कि उनके कई साथी और दोस्त उन्हें अंतिम विदाई देने आए थे. इनमें राज कपूर, नरगिस और अशोक कुमार शामिल थे, जिन्होंने बेवफा में अभिनय किया था. एक ऐसी फिल्म जिसका संगीत अब्बा ने ही दिया था.''

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''जब मुझे घर लाया गया तो मेरी मां ने मुझे ब्रेस्टफीड नहीं कराया. उन्हें वास्तव में लगता था कि मैं मनहूस हूं. और इसलिए परिवार की एक करीबी दोस्त (जो हमारे पास माहिम दरगाह के मोहल्ले में रहती थी) ने मेरी देखभाल की. ​​दुख की बात है कि मुझे उस दयालु महिला का नाम याद नहीं है. लेकिन वो शुरुआती कुछ हफ्तों के लिए मेरे लिए एक तरह से सरोगेट मां बन गई थी. आप सोच कर सकते हैं कि ये सामान्य नहीं था क्योंकि भारतीय परिवार में सबसे बड़े बेटे को आमतौर पर राजकुमार की तरह माना जाता है.''

ज्ञानी बाबा ने दिया जाकिर हुसैन नाम

जाकिर अपनी किताब में इस बात का जिक्र करते हैं कि कैसे ज्ञानी बाबा ने उनकी जिंदगी में बड़े बदलाव किए. उनकी वजह से उन्हें बदकिस्मत से तकदीरवाला माना गया. 

जाकिर ने कहा था, "मुझे बताया गया कि मेरे जन्म के तुरंत बाद ज्ञानी बाबा नाम के एक पवित्र व्यक्ति हमारे दरवाजे पर प्रकट हुए. उन्होंने मेरी मां को उनका नाम बावी बेगम पुकारा. किसी को नहीं पता था कि उन्हें उनका नाम कैसे पता चला, लेकिन किसी तरह उन्होंने जान लिया. मेरी मां उनसे मिलने बाहर गईं और ज्ञानी बाबा ने उनकी ओर देखा और कहा- 'तुम्हारा एक बेटा है. अगले चार साल उसके लिए बहुत खतरनाक हैं, इसलिए उसका अच्छे से ख्याल रखो. वो तुम्हारे पति को बचा लेगा. बच्चे का नाम जाकिर हुसैन रखना.'

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''हुसैन मेरा पारिवारिक नाम नहीं है. मेरा उपनाम कुरैशी या अल्लारखा कुरैशी होना चाहिए था. लेकिन ज्ञानी बाबा ने जोर देकर कहा कि मुझे जाकिर हुसैन कहा जाना चाहिए. उन्होंने ये भी कहा कि मुझे पैगंबर के पोते हजरत इमाम हुसैन का फकीर बनना चाहिए. एक फकीर का कर्तव्य मुहर्रम के दौरान सात घरों में जाकर भीख मांगना है. इसका उद्देश्य विनम्रता सीखना है. फकीर को जो कुछ भी मिला है उसे अपने से गरीब लोगों को देना चाहिए.''

घर-घर जाकर भीख मांगते थे जाकिर

जाकिर ने आगे कहा, ''इसलिए, जब मैं छोटा था तो मुहर्रम के दौरान मेरी मां मुझे हरा कुर्ता पहनाती थी, मुझे एक झोला देती थी और हम अपने मोहल्ले में घर-घर जाकर भीख मांगते थे. लोग मुझे थोड़े पैसे या कुछ मिठाइयां देते थे. मुझे जो भी दिया जाता था, वो सीधे मस्जिद या माहिम दरगाह में चला जाता था. जब मैं बड़ा हुआ, तो मैंने भारत में रहते हुए इस प्रथा को जारी रखा. यहां तक कि जब हम 1960 के दशक में नेपियन सी रोड पर चले गए, तो मैं मुहर्रम के वक्त माहिम वापस चला जाता था, और जब मैं अमेरिका चला गया, तो कई सालों तक अम्मा ने मेरे घर पर ये तपस्या जारी रखी. 

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ज्ञानी बाबा ने अम्मा को एक और बात बताई थी कि वो मेरा ख्याल रखें, और निश्चित रूप से, मेरे जीवन के पहले चार साल में, मैं बीमार पड़ता रहा. मैं गलती से केरोसिन पी लेता था, या मेरे शरीर पर बिना किसी कारण के फोड़े हो जाते थे. या मुझे अचानक तेज बुखार हो जाता था, शायद ये टाइफाइड या कुछ और था. लेकिन दिलचस्प बात ये थी कि मेरी हालत जितनी खराब होती गई, मेरे पिता उतने ही बेहतर होते गए. जैसा कि ज्ञानी बाबा ने भविष्यवाणी की थी, चार साल बाद अब्बा स्वस्थ और तंदुरुस्त हो गए और उस समय तक मेरी सेहत भी अच्छी हो गई थी. इस तरह मेरा नाम अब्बा पड़ा.

जाकिर ने देश का नाम अंतर्राष्ट्रिय लेवल पर भी ऊंचा किया है. वो कई बार ग्रैमी अवॉर्ड जीत चुके हैं. उन्हें पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री से भी सम्मानित किया जा चुका है.

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