
डीएसपी सिल्वा की कार में प्राण त्यागने से ठीक पहले तक भी लहूलुहान हो चुके 'डॉन' (1978) की अकड़ नहीं ठंडी पड़ी थी. 'तेजाब' के गाने 'सो गया ये जहां' में, एक ही कार में ट्रेवल करते अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित के बीच उनकी बीती यादों की टेंशन एकदम साफ नजर आई थी.
'पीकू' में बाप-बेटी के रोल में नजर आ रहे अमिताभ बच्चन और दीपिका पादुकोण की इरफान खान से नोंकझोंक देखकर हर किसी के चेहरे पर मुस्कराहट आ जाती है. कुल मिलाकर बात ये है कि कार की सवारी कई फिल्मों में बड़ी महत्वपूर्ण सिचुएशन का हिस्सा रही है. लेकिन क्या आपने कभी ये ध्यान दिया है कि अक्सर फिल्मों में कार के अंदर शूट हुए सीन्स में आगे की सीटों के हेडरेस्ट गायब होते हैं? कई फिल्मों में ऐसा नहीं भी होता. सवाल ये है कि आखिर ये कब होता है और कब नहीं होता? आइए बताते हैं...
सीट से हेडरेस्ट गायब होने का राज
1970s के दौर तक जो फिल्में आती थीं उनमें आपको अक्सर आगे वाली सीटों के साथ हेडरेस्ट नहीं नजर आएगा. ऐसा इसलिए क्योंकि तबतक अधिकतर कारों में बेंच सीट आया करती थीं, जिनमें हेडरेस्ट होता ही नहीं था. फिर कारों में अगली सीटें कैप्टन स्टाइल की आने लगीं यानी ड्राईवर और पैसेंजर की सीटें जुड़ी हुई नहीं अलग थीं. उधर 1968 में यूएस में कार बनाने वालों के लिए कार में हेडरेस्ट देना अनिवार्य हो गया और धीरे-धीरे कैप्टन सीट के साथ हेडरेस्ट हर कार में आने लगे. लेकिन कारों में हेडरेस्ट के साथ फिल्ममेकर्स के लिए एक नई समस्या भी आ गई थी.
बेंच स्टाइल की सीट्स वाली कारों के अंदर फिल्म के सीन शूट करना आसान था क्योंकि तब कार के अगले हिस्से से शूट करने पर पिछली सीटों पर बैठे एक्टर का चेहरा भी दिख जाया करता था. लेकिन जब हेडरेस्ट आए, तो ये काम मुश्किल हो गया. इसका इलाज ये निकाला गया कि सीन की जरूरत के हिसाब से सीट्स से हेडरेस्ट हटाए जाने लगे.
अगर 'पीकू' (2015) की बात करें तो इस फिल्म का एक बड़ा हिस्सा कार के अंदर शूट हुआ है. कार में अमिताभ पीछे बैठे थे, इरफान ड्राइव कर रहे थे और दीपिका आगे की पैसेंजर सीट पर उनके बगल में थीं. कहानी के हिसाब से आगे बैठे इरफान और दीपिका को कई बार पीछे बैठे अमिताभ की तरफ देखना था. ऐसे में अगर हेडरेस्ट लगे होते तो इनका एक दूसरे से नजरें मिलाकर बात करना मुश्किल होता और सीन का असर खत्म होता. इसलिए 'पीकू' में आपको कार की सीट पर हेडरेस्ट नहीं नजर आएंगे.
हर बार नहीं हटाए जाते हेडरेस्ट
फिल्म में कार के अंदर सीन शूट करते हुए हेडरेस्ट हटाने की जरूरत हमेशा नहीं पड़ती. पुराने दौर ही नहीं, मॉडर्न फिल्मों में भी कई बार ऐसा मौका आता है जब बिना हेडरेस्ट वाली कार इस्तेमाल होती है. जैसे- एक टैक्सी ड्राईवर और पैसेंजर के पंगे पर सेट फिल्म 'टैक्सी नंबर 9211' (2006) में नाना पाटेकर और जॉन अब्राहम एक टैक्सी में ट्रेवल कर रहे हैं. ये टैक्सी एक प्रीमियर पद्मिनी कार है, जिसमें बेंच सीट होती है और हेडरेस्ट होते ही नहीं.
कई बार फिल्म में सीन ही इस तरह के होते हैं कि कार में दो ही किरदार होते हैं और दोनों आगे की सीट्स पर अगल-बगल बैठे होते हैं. हेडरेस्ट से कोई नुक्सान नहीं होता, इसलिए हटाए भी नहीं जाते. जैसे 'खिलाड़ी 786' के कार वाले सीन में अक्षय कुमार और असिन आगे वाली सीट्स पर ही हैं. इसलिए हेडरेस्ट नहीं हटाए गए.
हेडरेस्ट वाली समस्या का एक दूसरा इलाज ये भी है कि अगर दो किरदार ड्राइव-सवारी वाली भूमिका में हैं तो उन्हें एक लाइन में ना बिठाया जाए. इस तरह ड्राइवर और सवारी दोनों को कैमरा आसानी से कैप्चर कर सकता है. जैसे 'संदीप और पिंकी फरार' (2021) में किया गया.
हालांकि, इसी फिल्म में जब गाड़ी के बाहर खड़ी परिणीति चोपड़ा, ड्राइविंग सीट पर बैठे अर्जुन कपूर से बात कर रही हैं, तो अर्जुन की सीट का हेडरेस्ट हटाया गया है.
सीन देखते हुए आपको इसकी वजह भी समझ आ गई होगी. इस सीन में कार की पिछली सीट पर रखे कैमरे से अर्जुन के सिर के पिछले हिस्से के साथ-साथ घबराई हुई परिणीति का चेहरा भी दिख रहा है, जो सीन का मूड सेट कर रहा है. यानी फिल्मों में कार के अंदर के सीन्स में हेडरेस्ट का होना या ना होना पूरी तरह सीन की जरूरत पर निर्भर करता है.