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Chamkila Review: इमोशंस के समंदर में खूब गोते लगवाएगी फिल्म, Diljit Dosanjh ने लूटा दिल, कमाल हैं Parineeti Chopra

इम्तियाज अली ने अपनी नेटफ्लिक्स फिल्म में न सिर्फ चमकीला की कहानी बताई है, बल्कि सोच को ये खाद भी उपलब्ध करवाई है कि ये कहानी जानना जरूरी क्यों है. इस तरह के 'मास' कलाकारों का होना जरूरी क्यों है. दिलजीत की एक्टिंग ने हमेशा लोगों का दिल जीता है मगर 'चमकीला' को उनकी बेस्ट परफॉरमेंस कहना गलत नहीं होगा.

'चमकीला' के ट्रेलर में दिलजीत दोसांझ, परिणीति चोपड़ा 'चमकीला' के ट्रेलर में दिलजीत दोसांझ, परिणीति चोपड़ा
सुबोध मिश्रा
  • नई दिल्ली ,
  • 12 अप्रैल 2024,
  • अपडेटेड 4:55 PM IST
फिल्म:चमकीला
4/5
  • कलाकार : दिलजीत दोसांझ, परिणीति चोपड़ा, राहुल मित्रा, सैमुएल जॉन
  • निर्देशक :इम्तियाज अली

दुनिया के बेस्ट डायरेक्टर्स के फिल्ममेकिंग पर दिए बयानों को एक साथ निचोड़ा जाए तो सार ये निकलता है कि एक फिल्ममेकर को स्क्रिप्ट, एक्टर, कैमरा, सेट्स, म्यूजिक और बाकी सब कुछ, अपने बेस्ट लेवल पर तैयार कर लेना है और फिल्म लेकर बैठ जाना है. उसके बाद इंतजार करना होता है एक जादू होने का. ये जादू कभी घटता है, तो अक्सर नहीं भी घटता. मगर जब ये घटता है और स्क्रीन पर उतर आता है, तो कुछ ऐसा होता है जिसे लिखने या बताने से बेहतर है कि महसूस किया जाए. तो मुद्दे की बात ये है कि इम्तियाज अली की 'चमकीला' में ये जादू घट गया है. 

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'जिस वजह से चमका वो, उस वजह से टपका'
भोजपुरी भाषी समाज से आने के नाते मैंने गानों में आर्ट में अश्लीलता की बहस खूब देखी है. अपनी मिट्टी से हजार किलोमीटर दूर मुझे बड़ा कर रहे मेरे पेरेंट्स में मैंने ये डर देखा है कि कहीं से मुझे अपने कल्चर के 'वैसे' गानों का एक्सेस न मिल जाए, जिसने भोजपुरी को ढेर सारे 'लोकप्रिय' गायक दिए हैं. जिनके नाम उस इलाके से बाहर भले ही शायद सबको न पता हों. मगर वो अपने सुनने वालों के लिए खुदा से कम नहीं हैं. इन पर शाश्वत आरोप रहा है कि ये 'अश्लील' हैं. 

मगर वो औलाद ही क्या जिसने अपने पेरेंट्स को गच्चा नहीं दिया! भोजपुरी से तो बचा लिया गया, मगर मेरी पैदाइश के इलाके से मेरे हिस्से आई पंजाबी ने काफी कच्ची उम्र में ही एक गाना मेरे कानों में डाल दिया- 'तेरी मां दी तलाशी लेनी, बापू साड्डा गुम हो गया.' पंजाबी सिंगर 'चमकीला' से ये मेरा पहला इंट्रो था. पूरा नाम- अमर सिंह चमकीला. वो सिंगर जिसके बारे में, 'चमकीला' के एक गाने में उसके आलोचक कह रहे हैं- 'गंदा सा बंदा है, सोशल दरिंदा है.' ये आलोचना इतनी तगड़ी थी कि माना जाता है इसी की वजह से सिर्फ 27 साल की उम्र में उसकी हत्या कर दी गई.

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एक हैरानी की बात है कि पंजाबी की शान कहे जाने वाले, लेजेंड सिंगर गुरदास मान भी 1980 के करीब ही उभर रहे थे, उसी समय चमकीला भी चमकना शुरू कर रहा था. आज मान साहब कल्ट हैं, क्लासिक हैं और चमकीला की कहानी कहने वाला कोई नहीं. मैंने खुद गुरदास मान की लाइफ पर, उनके किस्सों पर काफी कुछ लिखा है. मगर हैरानी ये है कि मुझे भी कभी चमकीला की कहानी इस तरह जानने की इच्छा नहीं हुई. 

शायद समाज की मशीनरी, चमकीला जैसे 'अश्लील' और 'अनैतिक' कलाकारों को इसी तरह आम याद्दाश्त से साफ कर देती है. इम्तियाज अली ने अपनी नेटफ्लिक्स फिल्म में न सिर्फ चमकीला की कहानी बताई है, बल्कि सोच को ये खाद भी उपलब्ध करवाई है कि ये कहानी जानना जरूरी क्यों है. इस तरह के 'मास' कलाकारों का होना जरूरी क्यों है. यहीं पर 'चमकीला' चमकती है.

'चमकीला' की कहानी का सफरनामा 
फिल्म शुरू ही होती है चमकीला और उसकी पत्नी अमरजोत की हत्या से. थोड़ी देर पहले जिन आर्टिस्ट की परफॉरमेंस के लिए लोग उतावले हो रहे थे, अगले कुछ मिनट फिल्म में उनकी लाशें एक जगह से दूसरी जगह उतारी-रखी जा रही हैं जैसे ये कभी इंसान रहे ही न हों. जैसे इनसे सहानुभूति दिखाने पर कोई खतरा है. आगे के सीन्स में एक डिस्टर्ब करने वाले चुप्पी का शोर सुनाई देता रहता है. 

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ऐसा लगता है कि हत्या करने वालों का मकसद ही यही था, और वो कामयाब हो गए हैं. पुलिस वाले परेशान हैं कि किसी 'दो कौड़ी के' सिंगर की जान चले जाने से उनके सिर पर आफत आ गई है. आप हैरान होते हैं कि वो दो लाशें आखिर कितना बड़ा बोझ हैं सबपर! एक पुलिस ऑफिसर केस की जांच करने आता है और फिर शुरू होती है चमकीले की कहानी. वो फैक्ट्री में जुराबें बनाता दिखता है. कुएं किनारे बैठकर रियाज करता दिखता है. फिर एक नामी सिंगर के यहां नौकरों जैसे काम करता दिखता है. मगर फिर एक तुक्का उसे स्टेज पर पहुंचा देता है और चमकीला ऐसा चमकता है कि पंजाबी के बाकी सारे सूरज चांद उसके आगे फीके लगते हैं. 

इस बीच उसे साथ मिलता है अमरजोत कौर उर्फ बब्बी का. अखाड़ों में गाती इन दोनों की जोड़ी को देखना ही फिल्म में एक अलग सा, दुनिया से हटकर फील देता है. जिन मुश्किलों और हालातों का सामना ये दोनों करते हैं, उसमें ये जिस तरह एक-दूसरे को देख रहे हैं वो अपने आप में रिलेशनशिप गोल्स है. इनकी कहानी सुन रहे ऑफिसर को इनसे सहानुभूति महसूस हो रही है, मगर इनके गानों से वो नाखुश ही है. उसका कहना है कि 'दुनिया में ज्यादातर लोग गंदे और बुरे हैं. ज्यादातर लोगों को कचरा पसंद है, तो क्या करें? दे दें उन्हें?!' 

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चमकीला अपनी कहानी में हर जगह अपने गानों को लेकर बागी होता नहीं दिखता, वो इस 'अश्लीलता' के आरोप पर कहीं भी कुछ खास जवाब नहीं देता. सिवाय एक इंटरव्यू के, जहां वो कहता है, 'इस दुनिया में ज्यादातर छोटे लोग हैं, मेरे जैसे. आप जैसे कम हैं. और छोटे लोगों को यही सब पसंद आता है, क्योंकि वो यही सब देख रहे होते हैं. इसीलिए मेरे गाने चलते हैं.' बात बहुत सादगी से बाहर निकलती है, मगर आपको बहुत तेज धंस जाती है. एंटरटेनमेंट की दुनिया में मास और क्लास का बंटवारा याद आ जाता है. 

सवालों में सवाल, सोसाइटी लाजवाब 
इम्तियाज ने सवाल उछाले नहीं हैं, आपको एक जीते-जागते-गाते इंसान की जिंदगी स्क्रीन पर दिखा दी है. उसे देखते हुए सवाल आप खुद से करने लगते हैं. एंटरटेनमेंट पर नैतिकता का प्रश्नचिन्ह अक्सर लगता ही रहा है. मगर ये तय कौन करेगा कि नैतिक-अनैतिक क्या है? इस द्वंद्व को सेटल कैसे किया जाएगा? हिंसा की ताकत से?! आप सोचते रहते हैं... चमकीला गाता रहता है. आखिर तक, जबतक वो गा सकता है. 

इस कहानी में कई रोंगटे खड़े करने वाले मोमेंट्स आते हैं. और कहानी में आती है अमरजोत. स्वभाव रुई के फाहे जितनी कोमल और आवाज में पहलवान जैसा दम. चमकीले के ऊंचे सुरों को बराबर मैच करती अमरजोत. उनकी लव स्टोरी देखते हुए आपको क्लासिक रोमांटिक फिल्ममेकर इम्तियाज याद आने लगते हैं. परिणीति ने इस किरदार को क्या कमाल ही जी लिया है. अबतक उन्होंने बागी तेवर वाली शहरी लड़की के किरदार ज्यादा निभाए हैं. मगर 'चमकीला' में उनका काम देखने के बाद आपको वो परिणीति याद आएंगी जिन्हें शुरुआत से ही दमदार परफॉर्मर माना है. 

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एक दिल-जीत परफॉर्मर और किरदारों की परिणीति 
दिलजीत की एक्टिंग ने हमेशा लोगों का दिल जीता है मगर 'चमकीला' को उनकी बेस्ट परफॉरमेंस कहना गलत नहीं होगा. खुद एक अच्छे गायक और ग्लोबल सेलेब्रिटी दिलजीत ने ये किरदार इस तरह निभाया है कि आपको चमकीला ही दिखता है. यहां तक कि गाने गाते हुए भी उनके लहजे में, उनके तौर में दिलजीत नहीं चमकीला ही दिखता है. उनके एक्टिंग टैलेंट का एक पहलू चमकीला के रोल में बहुत खुलकर सामने आया है. उनके एक्सप्रेशन द्वंद्व को, उलझन को बहुत सहजता से डिस्प्ले करते हैं. वो जैसे ही गाना शुरू करने के लिए माइक के आगे तुम्बी करते हैं, उनकी आंखों में कुछ अलग सा नजर आता है. आप उन्हें एक दूसरी दुनिया में जाते हुए देखते हैं. 

पूरी फिल्म में बहुत सारे ऐसे सीन हैं, जहां दिलजीत के पास डायलॉग हो सकते थे मगर उनके एक्सप्रेशन ही चमकीला की मनोस्थिति को आपके सामने रख देते हैं. एक डायरेक्टर के तौर पर इम्तियाज को दिलजीत से ये सबसे बड़ी सहूलियत मिली होगी, शायद इसीलिए वो इंटरव्यूज में कहते आ रहे हैं कि दिलजीत के बिना ये फिल्म बन ही नहीं सकती थी. दोनों लीड एक्टर्स के अलावा राहुल मित्रा, सैमुएल जॉन और अंजुम बत्रा जैसे सपोर्टिंग एक्टर्स ने भी अपने रोल को पूरी ईमानदारी से निभाया है जो आपको लगातार बांधे रखता है. 

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कैसे बढ़ी फिल्म की चमक
'चमकीला' की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इम्तियाज ने कहीं भी अपने हीरो को, उसपर लगे आरोपों की टक्कर में नहीं खड़ा किया है. इमेज वाइटवॉश करने की कोई कोशिश नहीं दिखती है. चमकीला की कमियां भी जस की तस कहानी में नजर आती हैं. वो पूरी फिल्म में, सिंगर बनने के अपने सपने को पूरे दिल से जी रहा है और संगीत की धुन में खोया हुआ है. बाकी सब जो चल रहा है, वो उसके सपने में बस एक खलल है. उसे बस अपने गीत के बोल से सामने बैठी जनता को खुश कर देना है. वो अपनी ऑडियंस का गुलाम है. 

इम्तियाज ने चमकीला की कहानी कहने में वो सारे टूल्स यूज कर लिए हैं जो उनके सामने थे. एनीमेशन से लेकर कार्टून तक को उन्होंने कहानी आगे बढ़ाने के लिए और चमकीला के गीतों का माहौल रीक्रिएट करने के लिए यूज किया है. फिल्म जिस तरह 'बाजा' गाने के साथ ओपन होती है, वो अपने आप में ही एक मुकम्मल फिल्म है. 

ए.आर. रहमान के म्यूजिक और इरशाद कामिल के लिरिक्स ने 'चमकीला' को एक एपिक स्टोरीटेलिंग बना दिया है, जिससे ध्यान हटा पाना मुश्किल है. और जिस तरह फिल्म एंड होती है, ये आपको एक सन्नाटे में छोड़ देती है. आप खुद ही खुद से सवाल करते और उनके जवाब खोजते रहते हैं. 'चमकीला' में ग्रेट फिल्म होने का एक बहुत बड़ा गुण है- इस कहानी में ऑडियंस के लिए एंट्री लेना जितना आसान है, इसमें धंसे रहना जितना आसान है, इससे बाहर आना उतना ही मुश्किल. 

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स्टोरीटेलिंग के स्पीड ब्रेकर 
कुछ लोगों के लिए 'चमकीला' देखने का एक्सपीरियंस, इस चीज से थोड़ा डिस्टर्ब होगा कि फिल्म में चमकीला जो रियल गाने हैं वो खूब यूज हुए हैं और ये ठेठ पंजाबी में हैं. अगर आपको पंजाबी आती है तो इस फिल्म का पूरा रस ले पाएंगे. अपनी तरफ से इम्तियाज ने इस समस्या को समझा है और उन गानों के हिंग्लिश यानी हिंदी-इंग्लिश मिक्स अर्थ स्क्रीन पर लिखे मिलते हैं. मगर इन्हें उसी स्पीड से पढ़ पाना थोड़ा मुश्किल तो होगा ही. केवल सबटाइटल्स के भरोसे देखने पर, इंग्लिश में कई पंजाबी एक्सप्रेशन्स के अर्थ थोड़े अजीब भी लगते हैं. नैरेटिव की पेस बहुत अच्छी मैनेज की गई है और चमकीला के हर दौर को दिखाने की पेस, उसके इमोशन के हिसाब से परफेक्ट सेट हुई है. 

कुल मिलाकर 'चमकीला' इम्तियाज अली के खाते में एक बहुत बेहतरीन फिल्म बनकर जुड़ गई है. हालांकि पंजाबी बोली का असर कुछ लोगों को कहानी से डिसकनेक्ट महसूस करवा सकता है. मगर फिर भी कहने में घुसने के बाद इसे समझ पाना मुश्किल नहीं है. कहानी के इमोशन, ड्रामा, रोमांस और विडम्बनाएं बहुत बेहतरीन तरीके से उतरे हैं. 

दिलजीत और परिणीति का काम इतना शानदार है कि आप पूरी फिल्म बस उन्हें ही देखते रह सकते हैं. ये एक ऐसी फिल्म है जिसे जितना देखना है, उतना ही महसूस करना है. कहानी चमकीला की जरूर है, मगर एक आर्टिस्ट और समाज के बीच होने वाले एक्सचेंज को समझने के लिए, उसे एप्रिशिएट करने के लिए 'चमकीला' जरूर देखनी चाहिए. 

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