
राजकुमार हिरानी की फिल्म देखनी हो, जिसमें शाहरुख खान हीरो हों, तो उम्मीदें अपने आप बहुत बढ़ जाती हैं. खासकर जब शाहरुख साल भर में ‘पठान’ और ‘जवान’ जैसी दो ब्लॉकबस्टर दे चुके हों और तीसरी फिल्म के साथ आ रहे हों. लेकिन ये फिल्म बिल्कुल अलग है और ये न ‘पठान’ है न ‘जवान’. जहां पिछली दो फिल्में मसालेदार एक्शन एंटरटेनर थीं, और ये वादा करती थीं कि आपको सीटियां-तालियां बजाने के लिए सीन पे सीन मिलते रहेंगे, वहीं ‘डंकी’ बिल्कुल अलग फिल्म है.
‘डंकी’ के लिए बड़े सवाल ये थे कि क्या इसमें सिग्नेचर हिरानी मोमेंट्स हैं? क्या कहानी की इमोशनल गहराइयों और ऊंचाइयों में इतना बैलेंस है कि दर्शक गोते खा सकें? क्या इसमें उस तरह की स्मार्ट-कॉमेडी है जैसी हिरानी की फिल्मों में होती है? और क्या शाहरुख और बाकी कास्ट अपने काम से आपको बांधे रख पाए रहे हैं?
हिरानी उन फिल्ममेकर्स में से हैं जो खुद ही अपना स्केल बन चुके हैं, उनकी हर नई फिल्म को उनके ही पिछले काम की कसौटी पर परखा जाना है. और हिसाब से, ‘डंकी’ बेस्ट राजकुमार हिरानी फिल्म तो नहीं है. लेकिन ये हिरानी की सबसे इमोशनल फिल्म है. ‘डंकी’ में किरदारों का जो कुछ दांव पर है, वो हिरानी के पिछले किरदारों के मुकाबले बहुत भारी है.
कहानी पंजाब के एक कस्बे की कहानी है जिसका सच में अस्तिव है लेकिन लालटू नाम काल्पनिक है. यहां तीन दोस्त हैं. मनु (तापसी पन्नू) का घर कुछ दुखद घटनाओं के बाद गिरवी रखा है. क्यों, कैसे? ये आप फिल्म में देखें. बल्ली (अनिल ग्रोवर) और बग्गू (विक्रम कोचर) अपनी मांओं को घिस-घिस कर कमाते-घर चलाते देखकर ऊब चुके हैं. लंदन का एक वीजा, इन सबकी लाइफ का गोल्डन टिकट बन सकता है. और इस आस में ये तीनों एक बार धोखा भी खा जाते हैं.
तब कहानी में एंटर होता है हीरो बंदा- हरदीप सिंह ढिल्लन उर्फ हार्डी. ये फौजी पठानकोट से लालटू सिर्फ कुछ घंटे के लिए आया है. यहां वो मनु से मिलता है और ठहर जाता है. क्यों, कैसे? जवाब फिल्म देगी. अब इस फौजी का मिशन इन तीनों को लंदन पहुंचाना है.
हार्डी को पता चलता है कि IELTS टेस्ट पास करने पर लंदन के स्टूडेंट वीजा आराम से मिल जाता है. अंग्रेजी के इस टेस्ट की तैयारी के लिए ये चारों अब 3 महीने में फर्राटेदार अंग्रेजी सीखने वाले गीतू गुलाटी (बोमन ईरानी) के इंस्टिट्यूट पहुंचते हैं. यहां उन्हें मिलता है सिद्धू (विक्की कौशल) जिसे जल्दी से जल्दी लंदन पहुंचना है. क्यों, कैसे? जवाब आपको पता ही है!
अंग्रेजों के आगे अंग्रेजी के टेस्ट में, लालटू के ये लाल चोक कर जाते हैं. जैसा कि हिरानी के पहले हीरो मुन्नाभाई ने फरमाया है- ‘सपना टूटा है तो दिल कहीं जलता है’. लेकिन इस बार आग सिर्फ दिल तक ही नहीं रुकती. ‘डंकी’ की कहानी का ये सबसे इमोशनल टर्न है. यहां से चारों किरदार तय करते हैं कि लंदन जाने के लिए ‘डंकी’ मारनी पड़ेगी. यानी गैरकानूनी रास्ता लेना पड़ेगा. मगर ये राह इतनी आसान नहीं है.
क्या इसे झेलकर ‘डंकी’ गैंग लंदन पहुंच पाएगा? और क्या उनके सपने पूरे हो जाएंगे? फिल्म में ये देखना, एक इमोशनल जर्नी है. लेकिन इस सफर से मुश्किल भी एक दूसरा सफर है. वो है अपनी जड़ों को लौटने का! क्या ऐसा मुमकिन है? क्या इस सफर का रिटर्न टिकट होता है? इसी उम्मीद की कहानी है ‘डंकी’.
इस जर्नी के बीच जो कुछ घटता है वो दिल तोड़ देने वाला है. ये जिंदगी की गणित का वो सवाल है जिसमें हासिल कुछ नहीं बचता. इस सफर से एक लव स्टोरी जरूर निकालकर आती है, मनु और हार्डी की. लेकिन उसका अंत भी सुखद तो नहीं कहा जा सकता. और यही चीज ‘डंकी’ को हिरानी की सबसे उदास फिल्म बनाती है.
हालांकि, फिल्म के अपने लाइट मोमेंट्स हैं. फर्स्ट हाफ में विक्की कौशल की एक अंग्रेजी स्पीच आपको बच्चन साहब का ‘आई लव इंग्लिश’ मोमेंट याद दिला देगी. उनके साथ अनिल ग्रोवर और विक्रम कोचर कॉमिक सीन्स की जान बनते हैं. हिरानी की बाकी फिल्मों की तरह कॉमेडी ‘डंकी’ का मजबूत पक्ष नहीं है. कई पंच और जोक बहुत रूटीन लगते हैं और लैंड नहीं होते. लेकिन जिन सीन्स में कॉमेडी जमती है, उनमें अच्छी जमती है.
अनिल ग्रोवर ‘डंकी’ में कमाल की खोज हैं, फर्स्ट हाफ में उनकी कॉमिक टाइमिंग कमाल की है. और सेकंड हाफ में इमोशनल सीन्स में उनकी पकड़ भी बेहतरीन है. विक्रम कोचर के खाते में कई बेहतरीन सपोर्टिंग रोल्स हैं. और ‘डंकी’ भी इस लिस्ट में एंट्री पाएगी.
तापसी पन्नू को ‘डंकी’ में अपनी इमोशनल रेंज दिखाने का पूरा मौका मिला है और वो इसमें बिल्कुल भी नहीं चूकतीं. हालांकि, कॉमिक पार्ट्स में उनके हिस्से बहुत चटख लाइनें नहीं आईं.
हार्डी के रोल में शाहरुख की डायलॉग डिलीवरी शुरुआत में थोड़ी डिस्टर्ब करती है. आवाज को जबरन गहरा बनाने की उनकी कोशिश कामयाब तो नहीं ही है. लेकिन 10-15 मिनट बिताने के बाद इसकी आदत हो जाती है. हार्डी, राजकुमार हिरानी के आइकॉनिक हीरोज की तरह नहीं है, ये एक बड़ी दिक्कत है. मुन्ना अपने सामने आई मुश्किलों को हर बार गन से नहीं डील करता था, मगर उसमें एक गैंगस्टर एटिट्यूड था. रैंचो हर रूम में सबसे स्मार्ट आदमी था. और पीके के डील करने के तरीके में, इस दुनिया से उसका एलियनपना झलकता था. हार्डी के किरदार में ऐसा कोई सिग्नेचर बिहेवियर नहीं है. वो हिम्मती जरूर है, लेकिन इस चीज को भी स्क्रीन पर स्थापित करने वाल एक सीक्वेंस की कमी फिल्म में लगती है.
मगर ‘डंकी’ को शाहरुख की सबसे दमदार परफॉरमेंसेज में गिना जाएगा. इमोशनल सीन्स में आप ‘एक्टर’ शाहरुख के फेस मसल्स को नए अंदाज में मूव करते नोटिस कर सकते हैं. हिरानी ने शाहरुख की इस खूबी को क्लोज-अप्स और हल्के लंबे टेक्स में पेश भी अच्छा किया है. ‘जवान’ में भले शाहरुख ने दो अलग-अलग उम्र के, अलग एक्सप्रेशन रेंज वाले किरदार किए, लेकिन हार्डी इस साल उनकी बेस्ट एक्टिंग परफॉरमेंस है.
एक्टिंग डिपार्टमेंट में सबसे बड़ा इक्का साबित हुए विक्की कौशल. उनका लुक और ड्रंक सीन सीधा आपको ‘मसान’ की याद दिला सकता है. फर्स्ट हाफ को विक्की के आने के बाद से एक अलग ही लिफ्ट मिलती है. ‘संजू’ के बाद हिरानी को विक्की की परफॉरमेंस ने एक और बेहतरीन किरदार दिया है.
अब लौटते हैं उन सवालों पर जिनका जवाब बतौर दर्शक ‘डंकी’ से मिलना चाहिए था. फिल्म में सिग्नेचर हिरानी मोमेंट्स हैं जरूर, मगर कहानी की इमोशनल गहराई ज्यादा समय चाहती थी और फोकस वहीं ज्यादा है. सेकंड हाफ थोड़ा स्लो जरूर लगता है, लेकिन ये स्पीड इमोशन्स को हाईलाइट करने के लिए घटाई गयी लगती है.
लेकिन पूरी फिल्म में कुछेक जगह ठहराव की कमी लगती है. जैसे शमशान के एक सीन में, जहां शाहरुख भावुक होकर बोल रहे हैं. वो बहुत जल्दी प्ले आउट होता है. हिरानी की फिल्मों की ख़ासियत रही है कि लगातार कुछ न कुछ घटता रहता है. इमोशन के बाद कॉमेडी, फिर रोमांस, फिर मैसेज, फिर गाना… लगातार कुछ न कुछ चलता रहेगा. मगर ‘डंकी’ में ये चीज नहीं है, इसकी वजह भी कहानी का इमोशन ही है.
फिल्म के रोमांटिक एंगल को भी हिरानी का बेस्ट तो नहीं कहा जा सकता. उन्होंने लव स्टोरीज इससे बेहतर क्रिएट की हैं. इसमें एक नुकसान इसलिए भी पहुंचा है कि मनु और हार्डी रोमांस एक्सप्रेस करने की सिचुएशन में ही नहीं हैं. फिर भी ये बेहतर हो सकता था. लेकिन शायद हिरानी खुद इस बात से कॉन्शस थे कि कहानी ज्यादा स्लो डाउन न हो जाए.
इमोशनल सीन्स में रोंगटे खड़े करने वाली ताकत जरूर है. और गाने इसमें बहुत हेल्प करते हैं. ‘डंकी’ को हिरानी की फिल्मों में बेस्ट म्यूजिक एल्बम कहना सही रहेगा. जबकि म्यूजिक के मामले में उनकी फिल्में बहुत मजबूत कभी नहीं मानी गईं. मगर कहानी को ग्रेविटी देने के मामले में ‘डंकी’ के गाने अच्छे हैं.
फिल्म का सोशल मैसेज, किरदारों केव जर्नी में कहीं खो जाता है. डंकी मारने की मुश्किलों को तो फिल्म दिखाती है, मगर इसमें हुए नुकसान को अलग से हाईलाइट करने वाला एक मोनोलॉग टाइप सीन मिसिंग लगा. जैसे कॉलेज में मुन्नाभाई और रेंचो ने दिया था. हिरानी को इस कमी की भरपाई करने के लिए अंत में एक मोंटाज का सहारा लेना पड़ा जिसमें असल जिंदगी से डंकी मारने वालों की दुर्दशा की खबरें-तस्वीरें थीं. मगर किरदारों की हालत से अगर आप मैसेज समझ पाएंगे तो ये गहरा असर करेगा.
‘डंकी’ में हिरानी और शाहरुख ने एक इमोशनल कहानी डिलीवर करने का वादा किया था, जो पूरा किया गया है. कॉमेडी और रोमांस और बेहतर हो सकेगा था. मगर अपने इमोशनल कोर में फिल्म बाकी चीजों को, एक्टर्स के दमदार काम के साथ सॉलिड अंदाज में डिलीवर करती है. ये परफेक्ट फैमिली एंटरटेनर है. लेकिन सिनेमाई जादू पर सीटियां-तालियां मारने वालों को थोड़ी ठंडी लगेगी.