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Jalsa Review: शॉक.. थ्रिल.. सस्पेंस की ट्रिपल डोज, विद्या बालन-शेफाली शाह का कमाल

Jalsa Review: विद्या बालन और शेफाली शाह की जोड़ी दर्शकों के बीच में जलसा लेकर आई है. होली के मौके पर दर्शकों को असल में कितना 'जलसा' हुआ है, ये हमारा रिव्यू बता देगा.

Jalsa Review: Vidya Balan and Shefali Shah Jalsa Review: Vidya Balan and Shefali Shah
सुधांशु माहेश्वरी
  • नई दिल्ली,
  • 18 मार्च 2022,
  • अपडेटेड 6:57 AM IST
फिल्म:जलसा
3.5/5
  • कलाकार : विद्या बालन, शेफाली शाह
  • निर्देशक :सुरेश त्रिवेणी

द कश्मीर फाइल्स का बॉक्स ऑफिस पर धाकड़ कलेक्शन चल रहा है. अक्षय कुमार की बच्चन पांडे के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. फिल्म कलेक्शन को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं. लेकिन द कश्मीर फाइल्स की इस सुनामी के बीच एक और डायरेक्टर हैं जिन्होंने बढ़िया खेला किया है. बॉक्स ऑफिस कलेक्शन की रेस से बाहर रहने के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजन पर अपनी फिल्म को रिलीज कर दिया है. नाम है जलसा और डायरेक्टर हैं सुरेश त्रिवेणी. विद्या बालन और शेफाली शाह की फिल्म है, ट्रेलर को लेकर चर्चा थी, अब रिलीज भी हो गई है. जानते हैं क्या बनाया है...

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कहानी

माया मेनन ( विद्या बालन) पेशे से पत्रकार है. सच्चाई को अपनी पहचान बताने वाली माया मुश्किल सवाल पूछने के लिए जानी जाती है. सामने फिर चाहे कोई कोर्ट का जज खड़ा हो या फिर कोई दूसरी हस्ति, पत्रकारिता के प्रति उसकी निष्ठा और ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं खड़ा करता. लेकिन उसके इसे बेहतरीन करियर में जबरदस्त मोड़ आ जाता है. एक एक्सीडेंट होता है....हिट एंड रन वाला. देर रात में स्पीड में आती गाड़ी एक लड़की को टक्कर मार देती है. ये लड़की मेड रुकसाना (शेफाली शाह) की बेटी है जो माया मेनन के घर पर खाना बनाने का काम करती है. खाना तो बनाती है ही, माया के बच्चे का भी पूरा ध्यान रखती है. एक तरीके से घर जैसे रिश्ते हैं.

लेकिन रुकसाना की बेटी का ये एक्सीडेंट माया की जिंदगी को उथल पुथल से भर देता है. काम पर ध्यान नहीं है, गलती ना करने वाली पत्रकार गलती करने लग जाती है. अब माया की ये चिंता सिर्फ रुकसाना की बेटी के प्रति उसका प्यार है? रुकसाना की बेटी को किसने टक्कर मारी है?  क्या माया कुछ छिपा रही है या रुकसाना के मन में कुछ चल रहा है? सवाल तो और भी कई उठ सकते हैं, लेकिन सब का जवाब जलसा देखने के बाद ही मिलेगा.

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कहानी में जबरदस्त ठहराव 

देर रात बैठकर ये फिल्म देखी है, सोने के पूरे चांस थे. लेकिन आप तक रिव्यू पहुंचाना था तो फोन पर फिल्म देखने बैठ गए. 2 घंटा 6 मिनट की फिल्म है. आधा घंटा बीता....एक घंटा हुआ...फिर दो घंटा और फिल्म खत्म हुई. नींद नहीं आई, बोरियत भी महसूस नहीं हुई. आंखे लगातार स्क्रीन पर लगी रहीं. मतलब सिर्फ ये है कि डायरेक्टर सुरेश त्रिवेणी अपने काम फुल नंबर से पास हो लिए हैं. कहानी में जबरदस्त ठहराव है. कोई रोलर कोस्टर राइड नहीं है, लेकिन फिर भी देखने में मजा काफी आता है. बढ़िया बात तो ये है कि कई सारी घटनाओं को एक साथ दिखाया है, लेकिन रायता नहीं फैला. बड़ी ही नजाकत से सबकुछ एक धागे में पिरोकर परोस दिया है.

विद्या-शेफाली का कमाल, दूसरे कलाकार गजब

अब जलसा की इस कहानी ने इसलिए इतना बांधकर रखा क्योंकि फिल्म के कलाकार दर्शकों को 126 मिनट तक बांधे रखने में कामयाब हो गए. बात विद्या बालन की करते हैं, बेहतरीन अदाकारी का नमूना एक बार फिर पेश किया है. एक किरदार के ही इतने शेड्स दिख गए हैं कि पूरी फिल्म में विद्या छाई रही हैं. अब विद्या अगर छा गई हैं तो शेफाली शाह ने दर्शकों के दिल में गहरी छाप छोड़ी है. मतलब कुछ समय पहले तक उन्हें हम दिल्ली क्राइम और फिर ह्यूमन जैसी सीरिज में देख रहे थे. दोनों ही किरदार थोड़े 'Elite' टाइप के थे. लेकिन अब देखिए, एक मेड के किरदार में भी ऐसा बखूबी ढल गई हैं कि उनकी तारीफ करे बिना रहा नहीं जा सकता. जलसा में माया के अलावा एक और पत्रकार दिखाई गई हैं-Vidharti Bandi. उनका काम भी आप नजरअंदाज नहीं कर पाएंगे.

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माया का फिल्म में जो बच्चा दिखाया गया है, वो रोल सूर्या कसीभटला ने निभाया है. उम्र में छोटे हैं, लेकिन जिस अंदाज का किरदार निभा गए हैं, फिल्म खत्म होने के बाद उनके बारे में सर्च करने को मजबूर हो जाएंगे. फिल्म में जिस लड़की का एक्सीडेंट हुआ है- कशिश रिजवान, उनका रोल छोटा है लेकिन कहानी उसी के इर्द-गिर्द घूमती है.

एक फिल्म में हर इमोशन, डायरेक्टर पास

जलसा की ताकत उसकी कहानी में दिखी, एक्टिंग में दिखी, लेकिन इस सब को सही तरीके से परोसने का काम डायरेक्टर सुरेश त्रिवेणी ने किया है. मतलब फिल्म देखते हुए कभी आप एकदम शॉक हो जाएंगे....फिर एक मोमेंट के बाद फील आएगा कि कुछ बड़ा होने वाला और फिर कुछ जानने की अचानक से इच्छा तेज हो जाएगी. ये सब होगा क्योंकि कहानी एक साथ कई सारे इमोशन जनरेट कर जाएगी. और ये इमोशन ही आपको अंत तक कहानी के साथ बांधकर रखेंगे. एक बात जरूर है कि फिल्म में एक किरदार ऐसा डायलॉग बोलता है- मैं पत्रकार नहीं बन सकता क्योंकि मैं सच्चा आदमी हूं. बिना किसी कारण के सिर्फ अटेंशन के लिए पत्रकारिता पेशे पर ही सवाल खड़े कर देना समझ से परे लगता है.

खैर ये तो हमारी निजी टिप्पणी है. लेकिन मेकर्स की बेहतरीन कहानी के लिए, एक्टर्स की शानदार अदाकारी के लिए, इस फिल्म का एक बार देखना तो जरूर बनता है.

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