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'कंगुवा' रिव्यू: जमकर लड़े-चीखे-चिल्लाए सूर्या फिर भी नहीं बचा पाए फिल्म, चूका 'एपिक' बनने का शानदार मौका

सूर्या के सामने विलेन के रोल में बॉबी देओल का आना भी ऑडियंस, खासकर हिंदी दर्शकों को लुभाने वाला फैक्टर था. लेकिन क्या 'कंगुवा' अपने उस वादे पर खरी उतर पाई जो प्रमोशंस में सूर्या और टीम करते नजर आ रहे थे? जवाब है तो सीधा और सपाट, लेकिन एक फिल्म और रिव्यू में कुछ तो अंतर होना चाहिए ना!

'कंगुवा' में सूर्या, बॉबी देओल 'कंगुवा' में सूर्या, बॉबी देओल
सुबोध मिश्रा
  • नई दिल्ली ,
  • 14 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 6:13 PM IST
फिल्म:कंगुवा
1/5
  • कलाकार : सूर्या, बॉबी देओल, दिशा पाटनी
  • निर्देशक :शिवा

साउथ से निकलकर पैन इंडिया नाम बनाने के एम्बिशन में कन्नड़-तेलुगू-मलयालम इंडस्ट्री के नए से नए स्टार्स भी आजकल जमकर कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में सूर्या जैसे बेहतरीन तमिल स्टार के पास हर वो वजह है कि वो पैन इंडिया लेवल का अटेम्प्ट करें. उनकी लेटेस्ट फिल्म 'कंगुवा' के टीजर, ट्रेलर और हर प्रमोशनल मैटेरियल में वो सारी चीजें भी नजर आ रही थीं जिनसे एक शानदार थिएट्रिकल एक्सपीरियंस डिलीवर करने की उम्मीद की जा सकती है. 

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सूर्या के सामने विलेन के रोल में बॉबी देओल का आना भी ऑडियंस, खासकर हिंदी दर्शकों को लुभाने वाला फैक्टर था. लेकिन क्या 'कंगुवा' अपने उस वादे पर खरी उतर पाई जो प्रमोशंस में सूर्या और टीम करते नजर आ रहे थे? जवाब है तो सीधा और सपाट, लेकिन एक फिल्म और रिव्यू में कुछ तो अंतर होना चाहिए ना! 

क्या है फिल्म का मसला?
'कंगुवा' की शुरुआत एक रिसर्च लैब फैसिलिटी जैसी जगह से होती है जहां से एक बच्चा फरार हो गया है. लैब के सिपाही उसे खोज रहे हैं. ये बच्चा जा टकराता है फ्रांसिस से जो अल्ट्रा कूल नजर आने की हाड़तोड़ मेहनत करता एक बाउंटी-हंटर है जो अच्छी खासी फीस लेकर पुलिस के लिए, अपराधियों का शिकार करता है. बच्चा अजीब है, बोलता-बतियाता नहीं है, लेकिन बीच-बीच में फिल्म दिखाती रहती है कि इसके पास कुछ सुपरपावर टाइप सीक्रेट शक्ति है. 

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फ्रांसिस को इस बच्चे से मिलकर एक अनोखा सा कनेक्शन फील होता है. अभी तक कहानी 2024 में चल रही है, लेकिन कनेक्शन दिखाने के लिए चली जाती है साल 1070 में. यहां आपको मिलती है पांच द्वीपों की कहानी. इन्हीं में से एक द्वीप पेरुमाची का योद्धा है कंगुवा. रोमन साम्राज्य की एक नौसेना टुकड़ी इन द्वीपों को कब्जा लेना चाहती है. और इसके लिए कंगुवा से निपटना जरूरी है. पांचों में से एक द्वीप, अरथी पर राज करता है उधिरन (बॉबी देओल), जिसकी पेरुमाची से नहीं बनती. 

रोमन प्लान ये है कि कंगुवा को ठिकाने लगाने के लिए, उधिरन का यूज किया जाए. इसी खेल के बीच में फंसा है एक बच्चा. क्यों फंसा है, कैसे फंसा है, इसका जवाब फिल्म में देखना ही बेहतर होगा (अगर आप देखने वाले हैं तो). इस बच्चे से कंगुवा एक वादा करता है और यही वादा 2024 में उनके फिर से मिलने की वजह है. 

कैसी है फिल्म?
किसी फिल्म से निकलने के बाद अगर आपको दिल्ली के ट्रैफिक के बीचों बीच फंसे होना शांतिपूर्ण लगने लगे, तो इसका मतलब आप समझ सकते हैं. थिएटर्स से ये रिक्वेस्ट है कि 'कंगुवा' का शो चलते वक्त हॉल के दरवाजे बंद रखें, वरना अंदर से आ रही आवाजें सुनकर बाहर मौजूद लोगों में भगदड़ मच सकती है. फिल्म में हर आदमी सुरों के उस स्केल पर बातचीत का रहा है जो हारमोनियम में भी नहीं आता. और फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर इस शोर को एक अकल्पनीय स्केल की अभूतपूर्व उंचाइयों पर ले जाता है. 

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इस फिल्म में इतना चीखना चिल्लाना है कि इस पूरे शोर का असर सिर्फ मेंटली ही नहीं फील होता, बल्कि फिजिकली आपको डिस्टर्ब करता है. मैंने ये फिल्म हिंदी डबिंग में देखी है और टीवी पर आने वाली सबसे बुरी डब फिल्मों के गोल्ड स्टैण्डर्ड को पूरी टक्कर देती है. बल्कि कुछेक जगह तो आगे भी निकल जाती है. जब किसी फिल्म के गाने में 'गोबर की गर्मी' मेटाफर के तौर पर इस्तेमाल हो तो समझ जाना चाहिए कि हिंदी डबिंग या तो AI के भरोसे हुई है, या किसी निहायत नए इंटर्न से करवाई गई है. 

हालांकि, दूसरे पॉइंट के लिए मैं माफी मांगता हूं क्योंकि 'कंगुवा' की हिंदी, नए-नए हिंदी लिखने वाले इंटर्न से भी खराब है. हो सकता है कि ऑरिजिनल वर्जन में फिल्म का एक्सपीरियंस इतना बुरा ना हो. लेकिन अगर किसी फिल्म का बेस्ट एक्सपीरियंस उसके ऑरिजिनल वर्जन में ही है तो 'पैन इंडिया' का क्या करें? कूड़े में डाल दें?!

थोड़ी-मोड़ी अच्छी बातें, दिक्कतों की भरमार 
ऐसा भी नहीं है कि 'कंगुवा' में कुछ भी अच्छा नहीं है. फिल्म के सारे क्रिएटिव आईडिया बहुत दमदार थे. मगर स्क्रीनप्ले ने इन्हें किसी लायक नहीं छोड़ा. डायरेक्टर शिवा ने 1070 का जो संसार क्रिएट किया है उसमें तमाम चीजें बहुत सोच समझकर डिजाईन की हुई लगती हैं. दूर-दराज में लोगों के कम्युनिकेशन के तरीके, भयानक लगती ट्राइब्स के बिहेवियर, उनका रहन-सहन और उनका लाइफस्टाइल क्रिएट करने में समय खर्च किया हुआ नजर आता है. 

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'कंगुवा' के विजुअल्स में कुछेक जगह आपको लैग-फ़्लक्चुएशन दिख सकता है, पर इसके बावजूद अधिकतर हिस्सों में विजुअल्स कमाल के लगते हैं. हजार साल पुरानी कहानी में हर ट्राइब का टीला, जहाज, कपड़े और उनके इलाके के विजुअल अलग हैं. हर लैंडस्केप की अपनी डिटेल्स हैं. 'कंगुवा' में टेक्निकली वो सबकुछ है जो इसे एक तगड़ी 'पैन इंडिया' एपिक बना सकता था. मगर फिल्म सबसे बेसिक जगह पर चूकती है- राइटिंग. 

फिल्म के पहले 20-30 मिनट में सूर्या के मॉडर्न अवतार को कूल दिखाने की कोशिश अझेल है. ऐसा लगता है कि थोड़ी देर में मेकर्स स्क्रीन पर मैसेज लिखकर ऑडियंस से रिक्वेस्ट करने लगेंगे कि 'प्लीज फ्रांसिस को अल्ट्रा कूल मान लीजिए.' शायद टीम को एक बेसिक सी बात याद नहीं रही कि अगर कूल दिखने पर इतना जोर लगाना पड़ रहा है, तो 'कूल' नहीं है. 

बॉबी देओल को ठीक से यूज ही नहीं किया गया. उनका लुक इतना भयानक है, मगर उनके किरदार में भारी गले से डायलॉग बोलने और तलवार से काट-पीट मचाने के अलावा और कुछ है ही नहीं. इतनी काटपीट तो अपनी फिल्म का हीरो ही बिना किसी लॉजिक के किए जा रहा है, तो फिर विलेन का लोड क्यों लेंगे दर्शक. किसी भी किरदार को पूरी तरह स्क्रीनप्ले ने खोला ही नहीं. 

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'कंगुवा' की मां या कोई और मजबूत महिला किरदार कहानी में है ही नहीं. हालांकि एक सीन में महिलाओं को योद्धा बनने का मैसेज देने की कोशिश बहुत डंडामार तरीके से की गई है, मगर तभी हमारा हीरो कह देता है 'तुम सभी योद्धाएं हो' और एक हिंदी भाषी दर्शक 'आंय??' बोलकर रह जाता है. वो तो शुक्र है कि सूर्या की एक्टिंग में इतना दम है कि उस एक धागे के सहारे मैंने किसी तरह थिएटर में इस चक्रवात का सामना किया! 

एक्शन है दमदार, मगर लेंग्थ की मार
फिल्म में एक से बढ़कर एक एक्शन सीक्वेंस भी हैं. ये हैं तो दमदार, मगर इतने लंबे हैं कि आप इनके खत्म हो जाने की दुआ करने लगते हैं. एक मगरमच्छ फाइट का सीक्वेंस अच्छा है, क्लाइमेक्स फाइट भी अच्छी है और सूर्या का इंट्रो फाइट सीक्वेंस भी दमदार था, मगर ये खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे. इसका हर्जाना फिल्म ने इमोशनल फ्रंट पर चुकाया है. फिल्म के हीरो का एक बच्चे से कनेक्शन, जो बहुत इमोशनल और अपीलिंग होना चाहिए था और जिसपर पूरी कहानी का दारोमदार है... वोआपको फील ही नहीं होता. इसी वजह से ये फिल्म सबसे ज्यादा थकाऊ लगती है. फिल्म के अंत में एक और पॉपुलर तमिल स्टार का कैमियो भी है. वो तो आप फिर भी झेल सकते हैं, मगर सबसे बड़ा दुःख एमदम लास्ट में आता है जब स्क्रीन पर बताया जाता है कि अभी इसका पार्ट 2 भी आएगा!

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कुल मिलकर 'कंगुवा' में एक अनोखा संसार क्रिएट करने की मेहनत, क्रिएटिव आईडिया और विचार तो पूरा नजर आता है. मगर कोई भी क्रिएटिव आईडिया बिना राइटिंग के सपोर्ट के वैसा ही लगता है जैसी 'कंगुवा' लग रही है. फिल्म देखने का फैसला आपको ये सोचकर लेना पड़ेगा कि खराब राइटिंग पचा पाने का आपका हाजमा कितना तगड़ा है. 

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