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साल 2018 में जब केजीएफ का पहला चैप्टर आया तो तूफान बन गया. साउथ की फिल्मों का क्रेज़ सुना था, लेकिन उसके लिए नॉर्थ इंडिया (हिन्दी बेल्ट) में यूथ का पागल हो जाना फिल्म को अलग लेवल पर ले गया. केजीएफ के पहले चैप्टर में एक डायलॉग था, जब रॉकी (यश) खदान के उस इंसान को मारता है, जो लोगों को सजा देता है. तब एक बच्चा रॉकी को देखकर कहता है, ‘कहते हैं ना हर पिक्चर में कोई एक होता है, तुझे देखकर मुझे ऐसा ही लगा.. कौन हीरो? नहीं विलेन’.
चार साल बीत गए हैं और अब ये विलेन ‘भगवान’ बन चुका है. केजीएफ का दूसरा चैप्टर आया है, जिसके लिए क्रेज़ पहले से भी ज्यादा और बड़ा है. फिल्म के इस माहौल ने एक साथ कई चीज़ों को ध्वस्त किया है, कोरोना काल के बीच लोगों के थियेटर जाने का डर. हिन्दी बेल्ट में हिन्दी फिल्मों का वर्चस्व और कमाई के रिकॉर्ड तो ध्वस्त हो ही रहे हैं.
फ़िल्म की कहानी बिल्कुल वैसी है, जैसी किसी भी फ़िल्म की होगी. गरीब लड़का रॉबिनहुड बना, उसने सबपर राज किया. बुरे काम करते हुए वो आम लोगों का भला करता रहा और मसीहा बन गया, अपने दुश्मनों को खत्म कर दिया. साथ में मां और प्यार का एंगल भी है. बस.. लेकिन खेल यहीं पलटता है क्योंकि इस कहानी के बावजूद इस फिल्म का भौकाल इसे KGF बनाता है.
पहले चैप्टर में रॉकी ने खदान पर कब्जा किया, लोगों को विलेन के राज से मुक्त करवा दिया. और मसीहा बन गया. चैप्टर-2 इसी मसीहा की कहानी है जहां खदान के आसपास रहने वाले 15 लाख लोग हैं, जिनका एक ही भगवान है रॉकी. जिसका मकसद सिर्फ सोना निकलवाना है. जिनके साथ छिपकर उसने खदान पर कब्जा किया, अब उनके लिए वह भगवान हो चुका है.
यश को केजीएफ ने नेशनल स्टार बना दिया और उसका पूरा रौब इस फिल्म में भी देखने को मिला है. जैसे रॉकी भाई ने पहले चैप्टर में अपना जलवा दिखाया, वही जलवा यहां भी है. कई सीन्स में एंट्री, फाइटिंग सीन और चुनौती का सामना करने वाला जज्बा फिल्म में देखने को मिला है. यही वजह है कि यश जब-जब स्क्रीन पर दिखे, तो लगा कुछ तो होगा. और हर बार बड़ा धमाका ही हुआ. एक्सप्रेशन से लेकर एक्शन तक, यश हर जगह छाए रहे.
फिल्म में एक डायलॉग है, ‘शुरू करवाने के लिए इसकी मां थी, लेकिन अब बंद कौन करवाएगा’. यश का स्टारडम ऐसा ही है, केजीएफ ने उन्हें जिस मुकाम पर पहुंचा दिया है. वो बाहुबली के प्रभास वाला है. शायद उससे भी बड़ा, क्योंकि प्रभास फिल्म में हीरो थे. यश यानी रॉकी विलेन वाला हीरो है और भारत की हिन्दी ऑडियंस जो मसाला फिल्मों की फैन है, उसका पसंदीदा कैरेक्टर यही होता है. केजीएफ के बाद यश जो भी कर रहे होंगे, उसपर सिर्फ साउथ नहीं बल्कि नेशनल ऑडियंस की नज़र होगी. बस उनके फैन्स को उम्मीद यही होगी कि प्रभास की तरह उनका हाल भी साहो और राधे-श्याम जैसा ना हो.
पहले चैप्टर से कितना अलग चैप्टर 2
पहले और दूसरे चैप्टर में कई किरदार एक ही हैं, लेकिन इस बार कुछ नए लोगों की भी एंट्री हुई है. प्रकाश राज इस बार कुर्सी पर बैठकर कहानी बता रहे हैं, रवीना टंडन देश की प्रधानमंत्री बनी हैं. रवीना ने एक ग्रे-शेड सीरियस पॉलिटिशयन का किरदार निभाया है, जो सख्त है. वो सख्ती रवीना के चेहरों पर नज़र भी आती है. उनका कैरेक्टर आपको किसी से मिलता-जुलता भी लग सकता है, जो आपको फिल्म देखने पर खुद ही पता लग जाएगा.
संजय दत्त की तलाश हुई पूरी, शानदार है पंच
लेकिन फिल्म की अगर कोई जान है, तो इस बार भी विलेन ही है. रॉकी भाई पहली फिल्म में विलेन कहलाए गए, लेकिन गरुड़ा का किरदार हर किसी को याद रहा. अब अधीरा आया है, यानी संजय दत्त. संजय दत्त की एंट्री से लेकर क्लाइमेक्स की फाइट तक विलेन आपके दिल-ओ-दिमाग पर छाया रहता है. संजय दत्त की एंट्री आग की लपटों में होती है और सबसे बेहतरीन पंच उनके पास हैं तो आते ही उनकी बौछार भी होती है. जैसे ‘तुम्हारे भगवान का खून तो निकलता है ना..’
कानूनी पचड़ों से पूरी तरह मुक्त होने के बाद संजय दत्त फिल्मी दुनिया में अपना जो रुतबा फिर से पाना चाहते थे. शायद उनकी तलाश पूरी हो गई है. अधीरा के किरदार में संजय दत्त बहुत ज्यादा सही लगे हैं, अग्निपथ (नई वाली) का कांचाचीना भी यहां मात खाता है. डायलॉग डिलिवरी, एग्रेशन और संजय दत्त की स्पेशल वॉक स्क्रीन पर अपना पूरा जलवा बिखेरती है.
डायरेक्टर प्रशांत नील ने पहली फिल्म की तरह ही यहां भी बेहतरीन काम किया. यश की स्क्रीन प्रेजेंस, वीएफएक्स, शॉट और कहानी में अलग-अलग टाइम पर आने वाले मोड़ आपको सीट से उठने ही नहीं देंगे. यही डायरेक्टर की जीत भी है. हल्की-सी कमी जहां दिखी, वो डायलॉग राइटिंग की है. क्योंकि बीच-बीच में ऐसा दिखेगा कि फिल्म को बहुत ज्यादा क्राउड फ्रेंडली बनाने के चक्कर में टपोरी भाषा वाले डायलॉग बहुत ज्यादा आ रहे हैं, जो फिल्म में ही बहुत क्लीशे लगते हैं. हालांकि, इसका एक कारण डबिंग/ट्रांसलेशन हो सकता है. क्योंकि ओरिजनल लैंग्वेज में जो डायलॉग फिट और बेहतरीन लग रहे हैं, उनका वैसा मज़ा ट्रांसलेशन/डबिंग में मिस हो सकता है.
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लेकिन इनका असर दिखता है, यही कारण है कि नोएडा जैसे शहर के मल्टीप्लेक्स में भी हर पांच-दस मिनट में सीटिंयां, तालियां लगातार बजती रहीं. कोरोना काल के बाद मल्टीप्लेक्स, सिंगल थियेटर और फिल्म बिजनेस की दुनिया के लोगों को जिस फिल्म का इंतज़ार था, वह यही फिल्म है. जो हर रिकॉर्ड तोड़ेगी और शायद जैसे-जैसे लोग देखेंगे तो इसका प्रचार थिएटर एक्सपीरियंस के लिए ही होगा.
फिल्म का क्लाइमेक्स बेहतरीन है, जहां बिना शर्ट-फटे, बॉडी दिखाए या किसी को हवा में उड़ाए. हीरो और विलेन में बेहतरीन फाइट सीक्वेंस चल रहा है. और हां.. फिल्म खत्म हो तो उठकर मत जाना. क्रेडिट्स के बाद भी रुकना.