Advertisement

देशभक्ति से कहीं आगे, एक्शन का डबल डोज, मल्ली, मानुष और माटी के लिए जंग ने RRR को बनाया 'बाहुबली'

राम और भीमा को तो राजामौली ने लिया ही है, इसे सीताराम राजू और कोमराम भीम से भी जोड़ा है. ये दोनों तकरीबन साथ-बड़े हुए, भारत की आजादी के लिए लड़े लेकिन दोनों एक दूसरे से कभी नहीं मिले. कहा जा रहा है कि RRR में यह बताने की कोशिश भी है कि ये दोनों मिले होते तो अंजाम क्या होता. फिल्म में बड़े फलक पर एक बड़ी सोच को आकार देने की कोशिश की गई है.

RRR RRR
अमित राय
  • नई द‍िल्ली ,
  • 04 अप्रैल 2022,
  • अपडेटेड 10:58 AM IST

राम की कई परिभाषाएं हैं, जिसमें अनंत शक्ति और अनंत धैर्य हो उन्हें राम कहा गया. जिसमें अनंत क्षमाशीलता, अनंत करुणा हो वो राम कहलाए. जो पिता की अनुचित मांग को भी मान ले उन्हें राम माना गया. राजामौली की RRR में भी एक राम है और उसकी पत्नी है सीता. 

जिसमें अतुलित बल हो, असीम शक्ति हो उसे भीम कहा गया. राम के लिए साध्य और साधन की दोनों की सुचिता जरूरी है लेकिन भीम के लिए साध्य अहम है. भीम के इरादे स्पष्ट हैं. इसका कारण रामायण और महाभारत में युगों के अंतर को माना जा सकता है.  

Advertisement

राम और भीमा को तो राजामौली ने लिया ही है, इसे सीताराम राजू और कोमराम भीम से भी जोड़ा है. ये दोनों तकरीबन साथ-बड़े हुए, भारत की आजादी के लिए लड़े लेकिन दोनों एक दूसरे से कभी नहीं मिले. कहा जा रहा है कि RRR में यह बताने की कोशिश भी है कि ये दोनों मिले होते तो अंजाम क्या होता. फिल्म में बड़े फलक पर एक बड़ी सोच को आकार देने की कोशिश की गई है.  

राजामौली ने दो मिथकीय पात्र उठाए हैं. दो अलग-अलग कहानियां ली हैं. फिर दोनों को इतने करीने से जोड़ा है कि पता ही नहीं चलता, दोनों जब मिलते हैं तो नाटकीयता से, रोमांच से, बिछड़ते हैं तो एक कसक, एक छटपटाहट रह जाती है.  

The Kashmir Files पर चर्चाओं के बीच Twinkle Khanna का मजाकिया अंदाज, बनाएंगी Nail File!

Advertisement

भारत के नाट्यशास्त्र में कहा गया है कि जब नायक से दर्शक का औदात्य स्थापित हो जाए, जब दर्शक खुद नायक बन जाए, जब वह खुद में नायक का अक्स देखने लगे तो वही नाट्य की पराकाष्ठा होती है. यहां तो दो नायकों से औदात्य स्थापित होता है. दोनों नायकों में खुद का अक्स दिखने लगता है. ऐसा लगता है कि राम और भीमा नहीं हम खुद हम लड़ रहे हैं, उनकी जीत हमारी जीत हो जाती है, उनकी हार से मन दुखी हो जाता है. दर्शकों की तालियां, जय श्रीराम के नारे यह दिखाते हैं कि फिल्म आम दर्शकों का दिल जीतने में सफल रही है. RRR का एक-एक सीन कुछ कहता है. अगली सीन के लिए एक प्लॉट तैयार कर जाता है. 

कहानी 1920 के आसपास की है जब भारत पर अंग्रेजों की हुकूमत चलती थी. शिकार पर निकले गवर्नर की पत्नी को एक गोंड की लड़की मल्ली भा जाती है. हुनर का इनाम उसे ऐसा मिलता है कि उसकी आजादी फिल्म का आधार बन जाती है. उसकी कातर आंखें, मां की चीत्कार, '15 रुपये से कम होती है एक इंडियन के जान की कीमत' यह अंदर तक झकझोर देने वाले दृश्य हैं. जो बेटियों के बाप हैं वो ये दर्द ज्यादा महसूस करते हैं. तार्किकता में यकीन रखने वाले सवालों में उलझ जाते हैं, कि ऐसा क्या है? लेकिन राजामौली का यह कमाल है कि उन्होंने एक बेटी की जिंदगी को अस्मिता का सवाल बना दिया. उस बच्ची के आजाद होने की ललक में भारत की आजादी दिखने लगी. 

Advertisement

मानुष यानी मल्ली को आजाद कराने का बीड़ा उठाता है भीमा. इसका रोल निभाया है जूनियर एनटीआर ने. भीमा को न देश की समझ है न गुलामी का ज्ञान, अपनी दुनिया में मस्त रहने वाला आदिवासी. वह भेड़िए की तलाश में शेर से दो-दो हाथ कर सकता है. उसकी आंखों में आंखें डालकर बात कर सकता है, चिंघाड़ सकता है, उसे काबू में करके माफी मांग सकता है कि 'तुम्हें नुकसान पहुंचाना हमारा मकसद नहीं'. जो हिंदू से मुसलमान बन सकता है. जो दोस्ती के लिए जान दे सकता है लेकिन दोस्त से दुश्मन बने शख्स को इतना नुकसान नहीं पहुंचा सकता कि उसकी जान चली जाए. भीमा में दिलेरी, प्यार है, करूणा और संवेदना है.   

चेक रिटर्न मामले में कोर्ट ने फिल्म डायरेक्टर Rajkumar Santoshi को सुनाई एक साल की सजा

राम (राम चरण) की अलग शख्सियत है. वह अपने बॉस के आदेश पर हजारों की भीड़ से अकेले भिड़ सकता है. अंग्रेजों के इशारे पर हिंदुस्तानियों की जान ले सकता है. भुजाएं फड़कती रहती हैं. वह कभी धीमी, कभी तेज आंच पर धधकता रहता है. शरीर कम आंखें ज्यादा बोलती हैं. उसके मन में कुछ पकता रहता है. उसका व्यक्तित्व इंटरवल तक नायक और खलनायक के बीच झूलता है, लेकिन उसका लक्ष्य बड़ा है. उसे साधन की शुचिता की परवाह नहीं है. उसे लक्ष्य की परवाह है. वह बंदूकों के बल पर बदलाव चाहता है. 

Advertisement

बैकफ्लैश में कहानी कई बार जाती है लगता है कि कुछ है, जो अनजाना है, अनदेखा है लेकिन बहुत देर तक ये सस्पेंस कायम रहता है. कौतूहल बना रहता है. दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि आखिर है क्या? आखिर वह अवसर की तलाश में क्यों है? आखिर क्यों एक बड़ी लड़ाई अकेले लड़ने के बाद भी उसे वह हासिल नहीं होता जो वह चाहता है. वह क्यों ऐसा टारगेट चाहता है जिसका हल उसे अंग्रेजों की आंखों का तारा बना दे. आखिर वह उस आदिवासी को गिरफ्तार करने का टास्क क्यों लेता है? 

सूत्र बिखरे पड़े हैं, अंधेरे में तीर चलाने जैसा हाल है. चूहे-बिल्ली का खेल चल रहा है. यहां संवाद कम और एक्सप्रेशन से ज्यादा कहा जा रहा है. सेट भव्य हैं, फिलमांकन जोरदार. दोनों नायकों के मिलने का सीन यादगार बन पड़ा है. बुलेट और घोड़े की सवारी, मालगाड़ी के डिब्बों में लगी आग और नदी में फंसा बच्चा, ऐसे सीन बार-बार नहीं रचे जाते यह तकनीक का कमाल कहें कुछ और लेकिन इतना तय है कि फिल्म देखने के बाद यह सीन भूल नहीं पाता. ऐसा सीन नकली नहीं लगता, रोमांच से भर देता है. 

इसके बाद दोस्ती परवान चढ़ती है. दोनों के लक्ष्य अलग हैं, दोनों एकदूसरे से अनजान हैं, एक को वहां पहुंचना है जहां की रक्षा का वीणा दूसरे ने उठाया है. फिल्म में प्रेम की हल्की सी छौंक है जिसमें एक गोरी मैम माध्यम भर बनती है. फिल्म में भाई का प्रेम है, पत्नी का प्रेम है लेकिन आम फिल्मों में जो प्रेम दिखाया जाता है वह कहीं नहीं है. फिर भी उसकी कमी नहीं खलती, क्योंकि फिल्म सोचने का मौका ही नहीं देती.  

Advertisement

बड़े फलक पर उठता है राज से पर्दा 

मल्ली की आजादी भीमा का लक्ष्य है. वह जिसे जहर से बचाता है वही उसके रास्ते में जहर बोने को तैयार है. दिल्ली में गवर्नर हाउस की भव्यता, पार्टी की रौनक पर एक अलग तरीके के आक्रमण से राजामौली नया मायाजाल रचते हैं. यहां कई आंखों से पर्दा हटता है. दुश्मन और दोस्त की रेखा एकदम साफ हो जाती है. दोनों दोस्त एकदूसरे से रूबरू होकर भी सवाल छोड़ जाते हैं. गलत और सही का निर्णय नहीं हो पाता. एक पश्चाताप की आग में जलता है तो दूसरा दुश्मनी की लौ में. मल्ली आजाद हो पाएगी या नहीं यह सवाल कौंधता रहता है. दर्शकों ने दो नायकों की दोस्ती देखी है लेकिन यहां दुश्मनी देखते हैं. फिर भी तय करना मुश्किल हो जाता है कि एक कितना सही है और दूसरा किस हद तक गलत. क्योंकि जबान कुछ कहती है, चेहरा कुछ, आंखें कुछ और बयां करती हैं. 

बड़े लक्ष्य के लिए बड़ी कुर्बानी 

फिल्म एकबार फिर बैक जाती है, यहां पता चलती है राम की असलियत कि वह ऐसा क्यों है? अंग्रेजों के साथ क्यों है? अपनों पर सितम क्यों कर रहा है? सवाल घूमते रहते हैं कि वह मकसद में सफल होगा या नहीं? पिता को दिए वचन पूरे कर पाएगा या नहीं? अपनी आंखों के सामने अपनों को खोने की दृश्य, अपने पिता का अनुचित आदेश मानने का दृश्य गजब बन पड़ा है. बदले की आग में जल रहे राम को बाद में मल्ली की आजादी भी बड़ी लगने लगती है. कहानी पलटती है और राम कालकोठरी में पहुंच जाता है. भीमा नफरत का गुबार लिए निकल पड़ता है.   

Advertisement

भीमा ने मिट्टी को आजाद करा लिया है लेकिन राम को रावण का संघार करना है. सीता राम के इंतजार में है. घटनाक्रम तेजी से बदलता है. राम और भीमा का पीछा कर रही अग्रेंजी फौज का सामना आखिर में तीर धनुष लिए राम से होता है. राम के विराट व्यक्तित्व में सब फीके पड़ जाते हैं. भीमा के लिए बुलेट ही गदा बन जाती है. ...और यहीं पर हॉल में जय श्रीराम के नारे लगने लगते हैं. हॉल तालियों से गूंज उठता है. कश्मीर फाइल्स में भी कुछ ऐसे पल आए थे जहां जय श्रीराम के नारे लगे थे. कुछ ऐसा ही माहौल यहां भी क्रियेट हो जाता है.  

Attack Movie Review: सुपर सोल्जर का तो पता नहीं, रोमांच से भरपूर दिखी जॉन अब्राहम की फिल्म

कुल मिलाकर राजामौली ने एक मायाजाल रचा है जिसमें आप बंधे रह जाते हैं. रामचरण और जूनियर एनटीआर ने अपने अभिनय से फिल्म में जान फूंक दी है. दोनों एकदूसरे पर बीस पड़े हैं. अजय देवगन जितनी देर रहे प्रभावित किया है. सीता के रोल में आलिया भट्ट के पास करने के लिए कुछ था नहीं. बस उन्होंने आंखों में आंसू लिए कड़ियां जोड़ दी हैं.

इससे पहले राजामौली ने जो फिल्में बनाई थीं उसमें भारत की संस्कृति और सभ्यता, भारत का गौरव अपने चरमोत्कर्ष पर दिखा था. नायक रजवाड़े का होता था लेकिन RRR में ऐसा नहीं है. कहानी अंग्रेजों के अत्याचार की है, क्रांतिकारी आम हैं जिन्हें खास बनाया गया है. लेकिन आखिर में नायक का राम रूप इस लड़ाई को बड़े फलक पर ले जाता है. कुछ लोग आरोप भी लगाते हैं कि ऐसा लहर को देखते हुए किया गया है क्योंकि इस बार नॉर्थ ऑडियंस को फोकस करके फिल्म बनाई गई है. इसीलिए अजय देवगन और आलिया भट्ट को भी इसमें जगह दी गई है. इसमें कितना सच है कितना फसाना यह तो राजामौली ही बता पाएंगे लेकिन उनका यह प्रयोग हिट रहा है. जिस तरह उन्होंने एक-सीन पर परफेक्शन की लड़ाई लड़ी है वह काबिले तारीफ है.  

Advertisement

RRR एक ऐसी फिल्म है जिसमें रोमांस नहीं है, प्यार नहीं है, एक में स्वार्थ छिपा है दूसरे में जवाबदेही लेकिन एक्शन और सस्पेंस, सेट की भव्यता ने किसी चीज की कमी नहीं खलने दी है. खलता तो सिर्फ ये है कि बॉलीवुड में ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनतीं. क्या बॉलीवुड के सितारे साउथ की फिल्मों में केवल गेस्ट रोल में ही नजर आएंगे. जिस तरह केजीएफ 2 की चर्चा हो रही है उससे तो ऐसा है लगता है कि धीरे-धीरे नॉर्थ के लोगों को भी साउथ की फिल्मों की इंतजार रहेगा.

 

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement