
'द केरल स्टोरी' की कहानी में एक पॉइंट आता है, जब नर्स बनने आई लड़कियों को आतंकवाद की तरफ धकेलने में लगे लोग एक दवा खिलाने लगते हैं. ये दवा ब्रेनवाश करने में मदद करती है. फिल्म देखने के बाद थिएटर से निकलते हुए दिमाग में पहली बात यही आई कि ये दवा हमें भी मिलनी चाहिए ताकि थिएटर में बैठकर, बिल्कुल अंत तक 'द केरल स्टोरी' देखी जा सके. अगर ये कहा जाए कि ये फिल्म भी एक वर्ग के लिए उस दवा का ही काम करेगी, तो गलत नहीं होगा!
तीन लड़कियों की कहानी को, '32 हजार' लड़कियों की कहानी बताने को लेकर पहले ही 'द केरल स्टोरी' पर काफी विवाद हो चुका है. लेकिन मेकर्स ने खुद अपनी ही फिल्म पर सबसे बड़ा व्यंग्य ये किया है कि टीजर से लेकर प्रमोशन तक '32 हजार लड़कियों' की कहानी बताने के बाद 'द केरल स्टोरी' के अंत में स्क्रीन पर एक लाइन लिख दी. वो ये कि 30 हजार का आंकड़ा मेकर्स को एक वेबसाइट से मिला था. अब ये वेबसाइट इंटरनेट से लापता है. इससे 'द केरल स्टोरी' के मेकर्स के लिए इंटरनेट की दुनिया का एक बहुत पॉपुलर मीम समर्पित करने को जी चाहता है- 'आपके साथ एक छोटा सा प्रैंक हुआ है'!
नर्स बनने आई एक लड़की का बहकावे में आकर अपना धर्म बदलना, ISIS जैसे दुर्दांत आतंकी संगठन के चंगुल में फंस जाना और आतंकी घटनाओं में समर्थन देने के लिए तैयार हो जाना, एक बेहद भयानक घटना है. जिस भी लड़की के साथ ऐसा हुआ हो, सबसे पहले उसे संवेदना से ट्रीट किए जाने की जरूरत होती है क्योंकि उसे खुद एक व्यवस्थित तरीके से ठगा गया है. लेकिन 'द केरल स्टोरी' सबसे पहले यहीं चूकती दिखती है.
डायरेक्टर सुदिप्तो सेन ने अपनी कहानी के लीड किरदार को जिस तरह से ट्रीट किया है उसमें संवेदना और सेंसिटिविटी नजर नहीं आती. बल्कि जिस तरह वो इस धार्मिक कन्वर्जन और आतंकी चंगुल में फंसती है, उससे आपको लीड किरदार स्टुपिड लगने लगता है. शालिनी उर्फ फातिमा बा, एक ऐसी लड़की का कैरेक्टर स्केच लगती है जिसे आज के भारत में भी, जब टीनेजर बच्चे सोशल मीडिया पर धर्म की बात कर रहे हैं, अपने या दूसरे धर्मों की रत्ती भर जानकारी नहीं है. न ही उसके अंदर किसी भी तरह का कोई सोशल अवेयरनेस है. 'द केरल स्टोरी' देखते हुए एक समय ऐसा आता है जब शालिनी का किरदार धार्मिक नफरत फैला रही अपनी सहेली की ऐसी बातों को मानने लगती है कि उससे पूछने को जी चाहता है- 'कौन गोला से आई हो?'
कहानी
'द केरल स्टोरी' तीन लड़कियों शालिनी, नीमा और गीतांजलि की कहानी कहती है, जो नर्स बनने अपने घर से दूर एक कॉलेज में आई हैं. यहां उसकी मुलाकात आसिफा से होती है जो फंडामेंटलिस्ट है और धीरे-धीरे सामने आता है कि ISIS के लिए लड़कियों को रिक्रूट करने का काम भी करती है. वो अपने साथियों की मदद से तीनों को धर्म बदलने के लिए उकसाने लगती है. तीनों लड़कियों में से शालिनी सबसे पहले आसिफा से प्रभावित होने लगती है. उसे आसिफा के एक दोस्त से प्यार भी हो जाता है और आगे की कहानी इस तरफ घूमती है कि दोनों धर्म बदलकर शादी करने को तैयार हो जाते हैं. शालिनी अब फातिमा बा बन जाती है. लेकिन कहानी में एक ट्विस्ट आता है और फिर फातिमा बन चुकी शालिनी, अपने बच्चे के साथ इराक-सीरिया बॉर्डर पर पहुंची नजर आती है. ऐसा क्या हुआ और कैसे हुआ, 'द केरल स्टोरी' इसी की कहानी है. नीमा और गीतांजलि, शालिनी की तरह सीधा ISIS तो नहीं पहुंचते, लेकिन उन्हें इसके नतीजे यहीं भारत में बहुत दुखद तरीके से भुगतने पड़ते हैं.
परफॉरमेंस
फिल्म में लीड रोल कर रहीं अदा शर्मा का काम बिल्कुल भी इम्प्रेस नहीं करता. उनके किरदार की राइटिंग में तो कमी है ही, लेकिन अदा के एक्सप्रेशन और उनके रिएक्शन कुछ देर बाद इरिटेटिंग लगने लगते हैं. वो स्क्रीन पर अटेंशन नहीं पकड़ पातीं. आसिफा के रोल में सोनिया बालानी के चेहरे पर एक टिपिकल शैतानी लुक नजर आता है, जबकि एक नेगेटिव रोल में उनके पास करने को बहुत कुछ था. सपोर्टिंग कास्ट में आसिफा के दोस्त बने तीनों लड़के भी असर छोड़ने में नाकाम रहते हैं.
डायरेक्शन
सुदिप्तो सेन ने कहानी को जिस तरह डायरेक्ट किया है, उसमें एक लड़की के साथ घटी दुखद घटनाओं को सॉलिड तरीके से दिखाने से ज्यादा जोर एक धर्म विशेष को आपराधिक बताने पर लगता है. ईराक, सीरिया और अफगानिस्तान जैसी जगहों पर इस धर्म के जिस रूढ़ और कट्टरपंथी तौर-तरीकों को 'द केरल स्टोरी', इंडियन कॉन्टेक्स्ट पर अप्लाई करने की कोशिश करती है. फिल्म के एक सीन में आसिफा, शालिनी से कहती है कि जिस मॉल में उसके साथ बदतमीजी हुई, वहां उसे छोड़कर सभी महिलाओं ने खुद को पूरी तरह ढंका हुआ था. यहां असीफा का लॉजिक है कि शालिनी, नीमा और गीतांजलि के साथ मॉल में छेड़छाड़ इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने एक नॉर्मल जीन्स-टॉप पहना था. ध्यान देने वाली बात ये है कि ये मॉल केरल का है, ईराक या सीरिया का नहीं. जिस तरह मॉल में सभी औरतों के बुर्के या हिजाब में होने की बात आसिफा कह रही है, वैसा भारत में तो यकीनन किसी ने नहीं देखा होगा.
इस तरह का ट्रीटमेंट फिल्म को सिर्फ एक एजेंडा बेस्ड कहानी बना देता है. जबकि मेकर्स ने 'द केरल स्टोरी' के पूरे प्रमोशन में ये कहना जारी रखा कि ये तीन लड़कियों के साथ हुई घटना की कहानी है. ऐसे में कहानी का फोकस लड़कियों की कहानी से ज्यादा धार्मिक नफरत को बढ़ावा देना दिखता है. और यही 'द केरल स्टोरी' की सबसे बड़ी चूक है.
'द केरल स्टोरी' नर्सिंग कॉलेज आई लड़कियों की कहानी है, मगर इन किरदारों को पूरी फिल्म में बस एक बार क्लास में दिखाया गया है. तीनों को किसी किस्म की मेडिकल प्रैक्टिस में नहीं दिखाया गया, बल्कि इसके उलट अपने होस्टल के रूम में बैठीं वे सारा वक्त धर्म पर बात करती रहती हैं. इस तरह के ट्रीटमेंट से मेकर्स का झुकाव साफ नजर आता है कि वो एक सॉलिड कहानी पर फिल्म बनाने की बजाय उसे एजेंडाबाजी को प्रमोट करने या फिर विवाद के जरिए फिल्म के लिए ऑडियंस बटोरने पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं.
'द केरल स्टोरी' किसी भी तरह से स्क्रीन पर दर्शक का ध्यान बांध पाने में नाकाम रहती है फिल्म में हिंसा और महिलाओं के शोषण के सीन्स को अटेंशन सीकिंग के तरीके से फिल्माया गया है. ऐसे सी किरदारों के साथ दर्शक के इमोशन कनेक्ट करने से ज्यादा, ग्लोरिफाई करने के अंदाज में दिखते हैं. एजेंडा बेस्ड फिल्में आना सिनेमा के लिए कोई नई बात नहीं है. मगर सबसे बेसिक चीज है कि फिल्म जिसकी कहानी कहती है उसके साथ सिम्पथी दिखाए और कहानी को एंगेजिंग अंदाज में दर्शक के सामने रखे. 'द केरल स्टोरी' इस काम में पूरी तरह फेल होती है.